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पुण्यतिथि विशेष: राष्ट्रकवि दिनकर — जिनके शब्द आज भी राष्ट्र की नसों में आग की तरह दौड़ते हैं

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पुण्यतिथि विशेष: राष्ट्रकवि दिनकर — जिनके शब्द आज भी राष्ट्र की नसों में आग की तरह दौड़ते हैं

सारांश

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 24 अप्रैल को पुण्यतिथि पर विशेष स्मरण। बिहार के एक गरीब किसान परिवार से उठकर ज्ञानपीठ पुरस्कार तक की यात्रा, और शब्दों से ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाने वाले इस महाकवि की रचनाएं आज भी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक हैं।

मुख्य बातें

24 अप्रैल 1974 को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का निधन हुआ था — आज उनकी पुण्यतिथि है।
23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में जन्मे दिनकर के पिता का निधन महज दो वर्ष की आयु में हो गया था।
1952 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और दो कार्यकाल तक संसद में रहे।
' उर्वशी ' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार और ' संस्कृति के चार अध्याय ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किए गए।
अंग्रेज सरकार के युद्ध-प्रचार विभाग में नौकरी करते हुए भी उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ओजस्वी कविताएं लिखीं।
1928 में प्रकाशित ' बारदोली-विजय ' उनका पहला काव्य-संग्रह था, जिसके बाद उनकी लेखनी ने कभी विराम नहीं लिया।

नई दिल्ली, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की पुण्यतिथि पर आज पूरा देश उस महान साहित्यकार को नमन कर रहा है, जिन्होंने 24 अप्रैल 1974 को इस दुनिया से विदा ली थी। बिहार के बेगूसराय के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे दिनकर ने अपनी लेखनी से न केवल हिंदी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि गुलामी के दौर में राष्ट्रीय चेतना की अलख भी जगाई। उनकी कविताएं आज भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में ओज और उत्साह का संचार करती हैं।

शब्दों से बनाया शस्त्र — दिनकर का साहित्यिक व्यक्तित्व

'याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा' — यह पंक्तियां केवल काव्य-पंक्तियां नहीं थीं, ये एक युग की पुकार थीं। दिनकर की रचनाओं में देशभक्ति की गूंज, वीरता की ललकार और मानवीय संवेदना की गहराई एक साथ मिलती थी। उनकी कविता 'रश्मिरथी' में कर्ण के माध्यम से उन्होंने सामाजिक विषमता और जाति-भेद पर जो प्रहार किया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

उनकी एक और अमर रचना में पांडवों के संघर्ष का वर्णन है — 'वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आए कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है।' यह पंक्तियां आज भी संकट में डूबे हर इंसान को नई ऊर्जा देती हैं।

संघर्षों की भट्टी में तपा बचपन

23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे दिनकर का जीवन शुरुआत से ही कठिनाइयों से भरा था। मात्र दो वर्ष की आयु में उनके पिता का निधन हो गया और विधवा माँ ने अत्यंत विषम परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया।

स्कूल जाने के लिए गंगा नदी पार करना, पैदल लंबी दूरियां तय करना और आर्थिक तंगी — ये सब उनके बचपन के साथी थे। लेकिन इन्हीं संघर्षों ने उनकी कविताओं में वह ओज, विद्रोह और आक्रोश भरा, जो बाद में राष्ट्रीय चेतना की आवाज बना। पटना विश्वविद्यालय से इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई के बाद उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का भी गहन अध्ययन किया।

साहित्यिक यात्रा — एक अनवरत सृजन-प्रवाह

दिनकर की साहित्यिक यात्रा स्कूल के दिनों में ही आरंभ हो गई थी। 1928 में प्रकाशित 'बारदोली-विजय' उनका पहला काव्य-संग्रह था। इसके बाद 'रश्मिरथी', 'कुरुक्षेत्र' और 'उर्वशी' जैसे महाकाव्य तथा 'हुंकार', 'रेणुका', 'रसवंती' और 'द्वंद्वगीत' जैसे मुक्तक-काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर बने।

उन्होंने केवल कविता ही नहीं, बल्कि निबंध, संस्मरण, आलोचना, डायरी और इतिहास जैसे गद्य साहित्य में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी बहुआयामी प्रतिभा इस बात की गवाह है कि वे एक साथ कवि, विचारक, इतिहासकार और समाज-सुधारक थे।

ब्रिटिश हुकूमत को भी असहज करने वाली लेखनी

आजीविका के लिए दिनकर ने पहले अध्यापन किया, फिर बिहार सरकार में सब-रजिस्ट्रार बने। विडंबना यह थी कि वे अंग्रेज सरकार के युद्ध-प्रचार विभाग में नौकरी करते हुए भी उसी सत्ता के विरुद्ध ओजस्वी कविताएं लिखते रहे। यह वह दौर था जब उनकी कलम ने उपनिवेशवाद की जड़ें हिला दीं।

स्वतंत्रता के बाद मुजफ्फरपुर कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष बने और 1952 में राज्यसभा के सदस्य के रूप में संसद पहुंचे, जहां उन्होंने दो कार्यकाल तक देश की सेवा की। बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति और फिर भारत सरकार के हिंदी सलाहकार के रूप में उन्होंने राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सम्मान और विरासत — राष्ट्र की अमर धरोहर

दिनकर की प्रतिभा को राष्ट्र ने पूरे गौरव के साथ स्वीकार किया। 'संस्कृति के चार अध्याय' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 'उर्वशी' के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया — हिंदी साहित्य का सर्वोच्च सम्मान। भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया और उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया।

यह उल्लेखनीय है कि दिनकर का साहित्य आज भी पाठ्यक्रमों में शामिल है और उनकी पंक्तियां राजनीतिक मंचों से लेकर सामाजिक आंदोलनों तक में उद्धृत होती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक — सभी ने दिनकर की कविताओं की शक्ति को स्वीकार किया था। आने वाली पीढ़ियां भी दिनकर की रचनाओं से प्रेरणा लेती रहेंगी — यही उनकी सच्ची अमरता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह आज की राजनीतिक बिरादरी के लिए एक आईना है जहां सत्ता और सिद्धांत का टकराव आज भी जारी है। मुख्यधारा की मीडिया दिनकर को केवल 'वीर रस के कवि' तक सीमित करती है, लेकिन उनकी 'उर्वशी' और 'संस्कृति के चार अध्याय' बताते हैं कि वे भारत की सांस्कृतिक आत्मा के गहनतम विश्लेषक थे। आज जब हिंदी साहित्य को लेकर उदासीनता बढ़ रही है, दिनकर की पुण्यतिथि यह याद दिलाने का अवसर है कि भाषा और साहित्य ही किसी राष्ट्र की असली शक्ति होते हैं।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का निधन कब और कहां हुआ था?
रामधारी सिंह दिनकर का निधन 24 अप्रैल 1974 को हुआ था। उनकी पुण्यतिथि हर वर्ष हिंदी साहित्य जगत में श्रद्धांजलि के रूप में मनाई जाती है।
दिनकर को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले थे?
दिनकर को ' उर्वशी ' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार , ' संस्कृति के चार अध्याय ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और भारत सरकार द्वारा ' पद्म भूषण ' से सम्मानित किया गया। उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया गया।
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म कहां और कब हुआ था?
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया था।
दिनकर की सबसे प्रसिद्ध रचनाएं कौन सी हैं?
दिनकर की प्रमुख रचनाओं में ' रश्मिरथी ', ' कुरुक्षेत्र ', ' उर्वशी ', ' हुंकार ', ' रेणुका ' और ' संस्कृति के चार अध्याय ' शामिल हैं। इनमें वीर रस, श्रृंगार और राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत संगम है।
दिनकर को 'राष्ट्रकवि' क्यों कहा जाता है?
दिनकर को 'राष्ट्रकवि' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनकी कविताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय चेतना जगाई और आजादी के बाद भी आत्मसम्मान व सांस्कृतिक गौरव का संदेश दिया। उनके शब्द केवल साहित्य नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आंदोलन थे।
राष्ट्र प्रेस
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