मिजोरम में नशा तस्करी पर बड़ी कार्रवाई: NCORD बैठक में 15 सूत्रीय रणनीति तय
सारांश
Key Takeaways
- 12वीं राज्य-स्तरीय NCORD बैठक बुधवार को आइजोल में मुख्य सचिव खिली राम मीणा की अध्यक्षता में आयोजित हुई।
- बैठक में 11 जिलों के उपायुक्त, पुलिस महानिदेशक शरद अग्रवाल, NCB, BSF, असम राइफल्स और चर्च परिषद के प्रतिनिधि शामिल हुए।
- मिजोरम म्यांमार के साथ 510 किमी और बांग्लादेश के साथ 318 किमी की खुली सीमा साझा करता है, जो तस्करी को आसान बनाती है।
- तस्करी का मुख्य रास्ता मिजोरम के 6 जिले — चम्फाई, सियाहा, लॉंगतलाई, ह्नाहथियाल, सैतुअल और सेरछिप हैं।
- नशामुक्त गांव SOP पेश की गई और केंद्र के 15 कार्य बिंदुओं पर राज्य-स्तरीय अमल की रणनीति तय हुई।
- तस्करी में सबसे आम वस्तु 'याबा' (मेथामफेटामाइन) है, जो 'गोल्डन ट्राएंगल' से आती है।
आइजोल, 23 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। मिजोरम सरकार ने म्यांमार और बांग्लादेश सीमा से हो रही नशीले पदार्थों की तस्करी पर लगाम कसने के लिए अपने प्रयास कई गुना तेज कर दिए हैं। बुधवार, 23 अप्रैल 2025 को नए राजधानी परिसर स्थित सचिवालय सम्मेलन कक्ष में 12वीं राज्य-स्तरीय एनसीओआरडी (नार्को समन्वय केंद्र) बैठक आयोजित की गई, जिसमें सीमा पार नशीले पदार्थों के नेटवर्क को नष्ट करने की व्यापक कार्ययोजना बनाई गई।
बैठक में कौन-कौन शामिल हुए
मुख्य सचिव खिली राम मीणा की अध्यक्षता में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में पुलिस महानिदेशक शरद अग्रवाल, राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, सभी 11 जिलों के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक उपस्थित रहे। इसके अलावा नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), असम राइफल्स, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), सहायक खुफिया ब्यूरो (एसआईबी) और मिजोरम में चर्चों की परिषद के प्रतिनिधियों ने भी इस बैठक में सक्रिय भागीदारी की।
बैठक में नागरिक समाज संगठनों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि मिजोरम सरकार इस लड़ाई को केवल पुलिस और प्रशासन तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि समुदाय आधारित हस्तक्षेप को भी प्राथमिकता दे रही है।
मुख्य घटनाक्रम और निर्णय
मुख्य सचिव खिली राम मीणा ने 11वीं राज्य-स्तरीय एनसीओआरडी बैठक की 'की गई कार्रवाई रिपोर्ट' की विस्तृत समीक्षा की। उन्होंने प्रवर्तन और समन्वय में मौजूद कमियों की पहचान करते हुए उन्हें दूर करने के निर्देश दिए।
बैठक में पूरे मिजोरम में नशामुक्त गांवों की पहचान और घोषणा के लिए एक 'मानक संचालन प्रक्रिया (SOP)' पेश की गई और उस पर विस्तृत चर्चा हुई। यह पहल राज्य की जमीनी स्तर पर हस्तक्षेप की नीति को मूर्त रूप देती है।
प्रतिभागियों ने नई दिल्ली में आयोजित 9वीं शीर्ष-स्तरीय एनसीओआरडी बैठक के दौरान जारी 15 कार्य बिंदुओं पर भी विचार-विमर्श किया, ताकि राज्य-स्तरीय रणनीतियों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ पूरी तरह समन्वित किया जा सके।
केंद्रीय गृह मंत्री की भूमिका और राष्ट्रीय संदर्भ
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इससे पहले नई दिल्ली में 9वीं शीर्ष-स्तरीय एनसीओआरडी बैठक की अध्यक्षता की थी, जिसमें देश भर में नशीले पदार्थों की तस्करी से निपटने की रणनीति पर समीक्षा की गई थी। उस बैठक में विभिन्न मंत्रालयों, राज्य सरकारों और राष्ट्रीय नशा कानून प्रवर्तन एजेंसियों के प्रतिनिधि एक मंच पर आए थे।
यह ध्यान देने योग्य है कि अमित शाह ने पिछले दो वर्षों में नशा तस्करी के विरुद्ध 'जीरो टॉलरेंस' नीति का बार-बार आह्वान किया है, और पूर्वोत्तर राज्यों को इस अभियान की धुरी बताया है।
मिजोरम की भौगोलिक संवेदनशीलता और तस्करी के रास्ते
मिजोरम की भौगोलिक स्थिति इसे नशा तस्करी के लिए विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है। राज्य म्यांमार के साथ 510 किलोमीटर लंबी बिना बाड़ वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा और बांग्लादेश के साथ 318 किलोमीटर लंबी खुली व पहाड़ी सीमा साझा करता है।
म्यांमार से सटा चिन राज्य नशीले पदार्थों, हथियारों एवं गोला-बारूद, दुर्लभ वन्यजीवों, औषधीय पौधों, विदेशी सिगरेट और म्यांमार की सुपारी (कत्था) सहित अन्य प्रतिबंधित सामानों की तस्करी का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
यह तस्करी मुख्यतः मिजोरम के छह जिलों — चम्फाई, सियाहा, लॉंगतलाई, ह्नाहथियाल, सैतुअल और सेरछिप के रास्ते होती है। इन जिलों की दुर्गम पहाड़ी भूगोल और सीमित सड़क संपर्क कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती पेश करते हैं।
तस्करी की जाने वाली सबसे आम वस्तुओं में मेथामफेटामाइन की गोलियां शामिल हैं, जिन्हें 'याबा' या 'पार्टी टैबलेट' के नाम से जाना जाता है। ये गोलियां मुख्यतः 'गोल्डन ट्राएंगल' क्षेत्र (म्यांमार, थाईलैंड, लाओस) में निर्मित होती हैं और पूर्वोत्तर भारत के रास्ते देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचती हैं।
व्यापक संदर्भ: पूर्वोत्तर में नशा संकट की गहराती जड़ें
गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र ड्रग्स एवं अपराध कार्यालय (UNODC) की रिपोर्टों के अनुसार म्यांमार अफगानिस्तान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा अफीम उत्पादक देश बन चुका है, और वहां की राजनीतिक अस्थिरता ने तस्करी नेटवर्क को और मजबूत किया है। इस पृष्ठभूमि में मिजोरम की सीमा की संवेदनशीलता कई गुना बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सीमा पर स्मार्ट फेंसिंग और तकनीक-आधारित निगरानी प्रणाली पूरी तरह लागू नहीं होती, तब तक केवल बैठकों और एसओपी से सीमित परिणाम ही मिलेंगे। मणिपुर और नागालैंड में भी इसी तरह के नेटवर्क सक्रिय हैं, जो दर्शाता है कि यह समस्या अकेले मिजोरम की नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर की साझा चुनौती है।
आने वाले हफ्तों में नशामुक्त गांव एसओपी के क्रियान्वयन और 15 कार्य बिंदुओं पर प्रगति की निगरानी यह तय करेगी कि यह बैठक केवल कागजी कवायद रही या वास्तविक बदलाव की शुरुआत।