चैत्र नवरात्रि पर संभल के चामुंडा देवी मंदिर में भक्तों की अपार भीड़
सारांश
Key Takeaways
- चामुंडा देवी मंदिर की स्थापना लगभग 300-350 वर्ष पूर्व हुई।
- यह मंदिर राजा पृथ्वीराज चौहान की कुलदेवी का स्थान है।
- नवरात्रि के दौरान यहाँ भक्तों की भीड़ लगती है।
- मंदिर में दिव्य ज्योति हर साल लाई जाती है।
- यह मंदिर पुरानी परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
संभल, २५ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन संभल के प्राचीन सिद्धपीठ श्री चामुंडा देवी मंदिर में भक्तों का एक विशाल जमावड़ा देखने को मिला। अनेक श्रद्धालु माता रानी की आराधना के लिए मंदिर में पहुंचे। यहाँ मंगला आरती के बाद बुधवार सुबह से दर्शन का सिलसिला शुरू हुआ और भक्तों की कतार लगी रही।
मंदिर के महंत मुरली सिंह ने कहा, "संभल की स्थापना के समय से यह मंदिर देवी का पूजनीय स्थान रहा है। यहाँ मां को चामुंडा के रूप में पूजा जाता है, जो राजा पृथ्वीराज चौहान की कुलदेवी मानी जाती हैं। राजा के काल में यह मंदिर उनकी आराध्या देवी के रूप में प्रसिद्ध था। आज भी भक्त यहाँ अपनी मनोकामनाएँ मांगते हैं और मां अपनी कृपा बरसाती हैं।"
उत्तर प्रदेश के संभल शहर के कोतवाली कस्बा क्षेत्र में स्थित यह मंदिर नवरात्रि के समय भक्तों की अपार भीड़ को आकर्षित करता है, और यहाँ नौ दिन मेला लगा रहता है। यह मंदिर पुरानी परंपराओं और स्थानीय श्रद्धालुओं की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहाँ माता चामुंडा की पूजा प्रमुखता से की जाती है, जिन्हें दुर्गा के उग्र रूप के रूप में देखा जाता है (चण्ड और मुण्ड राक्षसों का नाश करने वाली)।
माना जाता है कि यह मंदिर लगभग ३०० से ३५० वर्ष पुराना है और पीढ़ियों से यहाँ पूजा होती आ रही है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। एक प्रचलित कहानी के अनुसार, घने जंगल के बीच माता की मूर्ति प्रकट हुई थी। यहाँ पर मां दुर्गा की सात बहनों के भी थान हैं। मान्यता है कि यहाँ पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और रोगों से छुटकारा मिलता है।
इस मंदिर में दिव्य ज्योति हमेशा जलती रहती है। यह ज्योति हर साल चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान हिमाचल प्रदेश में स्थित मां ज्वाला देवी के मंदिर से यहाँ लाई जाती है। यह मंदिर सनातन परंपराओं को सहेजे हुए है और स्थानीय समुदाय के लिए अत्यधिक पूजनीय है।