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पंडित छन्नूलाल मिश्र: काशी की सुर-साधना के महानायक, 2014 में PM मोदी के प्रस्तावक बनने की अनकही कहानी

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पंडित छन्नूलाल मिश्र: काशी की सुर-साधना के महानायक, 2014 में PM मोदी के प्रस्तावक बनने की अनकही कहानी

सारांश

पंडित छन्नूलाल मिश्र सिर्फ शास्त्रीय गायक नहीं थे — वे काशी की आत्मा की आवाज थे। खयाल से भजन तक, मुजफ्फरपुर की कोठरी से पद्म विभूषण तक, और 2014 में PM मोदी के प्रस्तावक बनने की अनकही कहानी तक — उनका जीवन संगीत और संस्कृति का अनूठा संगम था।

मुख्य बातें

पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म 3 अगस्त 1936 को आजमगढ़, उत्तर प्रदेश के हरिहरपुर में हुआ था।
उनका निधन 2 अक्टूबर 2025 को हुआ, जिससे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत जगत में अपूरणीय क्षति हुई।
उन्हें 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2010 में पद्म भूषण और 2020 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
2014 के लोकसभा चुनाव में अमित शाह के अनुरोध पर उन्होंने वाराणसी में नरेंद्र मोदी के नामांकन के प्रस्तावक की भूमिका स्वीकार की।
उन्होंने स्पष्ट किया था कि वे किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं — उनकी प्राथमिकता काशी, गंगा और संगीत परंपरा थी।
बनारस घराने की परंपरा को आगे बढ़ाने में उनका योगदान अतुलनीय रहा — खयाल, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और भजन सभी विधाओं में।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के स्तंभ पंडित छन्नूलाल मिश्र का नाम काशी की सांस्कृतिक विरासत में सोने के अक्षरों में दर्ज है। खयाल, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और भजन — संगीत की हर विधा को उन्होंने अपनी अनूठी आवाज से नई ऊँचाई दी। 2 अक्टूबर 2025 को उनके निधन के साथ बनारस घराने की वह सुर-परंपरा मौन हो गई, जिसे उन्होंने दशकों तक जीवंत रखा।

संगीत-संस्कारों की विरासत

पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म 3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर गाँव में हुआ था। संगीत उन्हें जन्मजात विरासत में मिला — उनके दादा गुदई महाराज और शांता प्रसाद अपने समय के प्रसिद्ध तबला वादक थे। ऐसे संगीतमय परिवेश में पले-बढ़े छन्नूलाल जी ने मात्र छह वर्ष की आयु में अपने पिता बद्री प्रसाद मिश्र से स्वर-शिक्षा का पहला पाठ लिया।

जिस उम्र में अधिकांश बच्चे खेल-कूद में मगन रहते हैं, उस उम्र में छन्नूलाल जी रियाज़ की दुनिया में डूब चुके थे। लगभग नौ वर्ष की अवस्था में उन्होंने उस्ताद गनी अली साहब से खयाल की बारीकियाँ सीखीं। आगे चलकर किराना घराने के उस्ताद अब्दुल गनी खान और ठाकुर जयदेव सिंह ने भी उनकी गायकी को नई गहराई दी।

मुजफ्फरपुर से काशी तक की साधना-यात्रा

उनकी संगीत-साधना का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय मुजफ्फरपुर में लिखा गया। बताया जाता है कि चतुर्भुज स्थान की एक छोटी-सी कोठरी में रहकर उन्होंने वर्षों तक अनवरत साधना की। यही तपस्या आगे चलकर उनकी गायकी की अमिट पहचान बनी। इसके बाद वाराणसी उनकी कर्मभूमि बनी और उन्होंने बनारस घराने की समृद्ध परंपरा को अपनी आवाज में आगे बढ़ाया।

उनकी विशिष्टता यह थी कि वे केवल शास्त्रीय मंचों तक सीमित नहीं रहे। उनकी आवाज में खयाल की गंभीरता थी, तो ठुमरी में बनारस की ठेठ मिठास भी। दादरा, चैती, कजरी और भजन जैसी लोक-शास्त्रीय विधाओं को उन्होंने इतनी आत्मीयता से गाया कि शास्त्रीय संगीत के पारखियों के साथ-साथ सामान्य श्रोता भी उनसे जुड़ते चले गए।

2014 में PM मोदी के प्रस्तावक बनने की दिलचस्प कहानी

उनके जीवन का एक अत्यंत चर्चित अध्याय 2014 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। जब नरेंद्र मोदी वाराणसी सीट से चुनाव लड़ने उतरे, तो नामांकन के लिए उनके प्रस्तावक के रूप में पंडित छन्नूलाल मिश्र से संपर्क किया गया। बताया जाता है कि शुरुआत में उन्होंने इस प्रस्ताव में विशेष रुचि नहीं दिखाई। इसके बाद अमित शाह ने उनसे व्यक्तिगत मुलाकात की और उन्हें प्रस्तावक बनने के लिए राजी किया।

प्रस्ताव स्वीकार करते हुए पंडित जी ने स्पष्ट किया था कि उनका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। उनकी प्राथमिकताएँ सदैव काशी, गंगा और यहाँ की संगीत परंपरा से जुड़ी रहीं। उन्होंने आशा व्यक्त की थी कि आने वाली सरकार गंगा की स्वच्छता और काशी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाएगी। गौरतलब है कि उनके लिए काशी केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि संगीत, संस्कृति और आध्यात्मिकता की एक समग्र दुनिया थी।

सम्मान और विरासत

पंडित छन्नूलाल मिश्र को वर्ष 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2010 में पद्म भूषण और 2020 में पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। अपनी लंबी संगीत-यात्रा में उन्होंने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और शास्त्रीय संगीत को आम जनमानस के निकट लाने में अप्रतिम भूमिका निभाई। उनके जाने से काशी का एक युग समाप्त हुआ — किंतु बनारस घराने की वह सुर-धारा, जिसे उन्होंने सींचा, आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे किसी भी राष्ट्रीय नेता को वाराणसी की मिट्टी से जुड़ने के लिए चाहिए थी। उनका यह स्पष्ट करना कि वे किसी दल से नहीं, बल्कि गंगा और संगीत से बँधे हैं — यह बेबाकी ही उन्हें महज एक कलाकार से परे, एक सांस्कृतिक प्रहरी बनाती है। दुर्भाग्य से शास्त्रीय संगीत की यह पीढ़ी तेज़ी से विदा हो रही है, और उनके जाने के बाद यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है कि बनारस घराने की अगली कड़ी को संस्थागत समर्थन मिल रहा है या नहीं।
RashtraPress
1 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित छन्नूलाल मिश्र कौन थे?
पंडित छन्नूलाल मिश्र हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के बनारस घराने के महान गायक थे, जिन्होंने खयाल, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और भजन जैसी विधाओं को अपनी आवाज से समृद्ध किया। उनका जन्म 3 अगस्त 1936 को आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ था और उन्हें पद्म विभूषण सहित कई राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त थे।
पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन कब हुआ?
पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन 2 अक्टूबर 2025 को हुआ। उनके जाने से बनारस घराने और समग्र हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत जगत में एक अपूरणीय रिक्तता आ गई।
2014 में पंडित छन्नूलाल मिश्र PM मोदी के प्रस्तावक कैसे बने?
2014 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी से नरेंद्र मोदी के नामांकन के लिए पंडित छन्नूलाल मिश्र से प्रस्तावक बनने का अनुरोध किया गया था। बताया जाता है कि शुरुआत में उन्होंने विशेष रुचि नहीं दिखाई, जिसके बाद अमित शाह ने उनसे व्यक्तिगत मुलाकात कर उन्हें राजी किया।
पंडित छन्नूलाल मिश्र को कौन-कौन से सम्मान मिले?
उन्हें वर्ष 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2010 में पद्म भूषण और 2020 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। ये सम्मान शास्त्रीय संगीत में उनके अप्रतिम योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति थे।
पंडित छन्नूलाल मिश्र का बनारस घराने से क्या संबंध था?
पंडित छन्नूलाल मिश्र ने वाराणसी को अपनी कर्मभूमि बनाया और बनारस घराने की समृद्ध संगीत परंपरा को दशकों तक आगे बढ़ाया। उन्होंने उस्ताद गनी अली साहब, उस्ताद अब्दुल गनी खान और ठाकुर जयदेव सिंह से संगीत की बारीकियाँ सीखीं और इस घराने की पहचान को देश-दुनिया तक पहुँचाया।
राष्ट्र प्रेस
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