पंडित छन्नूलाल मिश्र: काशी की सुर-साधना के महानायक, 2014 में PM मोदी के प्रस्तावक बनने की अनकही कहानी
सारांश
मुख्य बातें
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के स्तंभ पंडित छन्नूलाल मिश्र का नाम काशी की सांस्कृतिक विरासत में सोने के अक्षरों में दर्ज है। खयाल, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और भजन — संगीत की हर विधा को उन्होंने अपनी अनूठी आवाज से नई ऊँचाई दी। 2 अक्टूबर 2025 को उनके निधन के साथ बनारस घराने की वह सुर-परंपरा मौन हो गई, जिसे उन्होंने दशकों तक जीवंत रखा।
संगीत-संस्कारों की विरासत
पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म 3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर गाँव में हुआ था। संगीत उन्हें जन्मजात विरासत में मिला — उनके दादा गुदई महाराज और शांता प्रसाद अपने समय के प्रसिद्ध तबला वादक थे। ऐसे संगीतमय परिवेश में पले-बढ़े छन्नूलाल जी ने मात्र छह वर्ष की आयु में अपने पिता बद्री प्रसाद मिश्र से स्वर-शिक्षा का पहला पाठ लिया।
जिस उम्र में अधिकांश बच्चे खेल-कूद में मगन रहते हैं, उस उम्र में छन्नूलाल जी रियाज़ की दुनिया में डूब चुके थे। लगभग नौ वर्ष की अवस्था में उन्होंने उस्ताद गनी अली साहब से खयाल की बारीकियाँ सीखीं। आगे चलकर किराना घराने के उस्ताद अब्दुल गनी खान और ठाकुर जयदेव सिंह ने भी उनकी गायकी को नई गहराई दी।
मुजफ्फरपुर से काशी तक की साधना-यात्रा
उनकी संगीत-साधना का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय मुजफ्फरपुर में लिखा गया। बताया जाता है कि चतुर्भुज स्थान की एक छोटी-सी कोठरी में रहकर उन्होंने वर्षों तक अनवरत साधना की। यही तपस्या आगे चलकर उनकी गायकी की अमिट पहचान बनी। इसके बाद वाराणसी उनकी कर्मभूमि बनी और उन्होंने बनारस घराने की समृद्ध परंपरा को अपनी आवाज में आगे बढ़ाया।
उनकी विशिष्टता यह थी कि वे केवल शास्त्रीय मंचों तक सीमित नहीं रहे। उनकी आवाज में खयाल की गंभीरता थी, तो ठुमरी में बनारस की ठेठ मिठास भी। दादरा, चैती, कजरी और भजन जैसी लोक-शास्त्रीय विधाओं को उन्होंने इतनी आत्मीयता से गाया कि शास्त्रीय संगीत के पारखियों के साथ-साथ सामान्य श्रोता भी उनसे जुड़ते चले गए।
2014 में PM मोदी के प्रस्तावक बनने की दिलचस्प कहानी
उनके जीवन का एक अत्यंत चर्चित अध्याय 2014 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। जब नरेंद्र मोदी वाराणसी सीट से चुनाव लड़ने उतरे, तो नामांकन के लिए उनके प्रस्तावक के रूप में पंडित छन्नूलाल मिश्र से संपर्क किया गया। बताया जाता है कि शुरुआत में उन्होंने इस प्रस्ताव में विशेष रुचि नहीं दिखाई। इसके बाद अमित शाह ने उनसे व्यक्तिगत मुलाकात की और उन्हें प्रस्तावक बनने के लिए राजी किया।
प्रस्ताव स्वीकार करते हुए पंडित जी ने स्पष्ट किया था कि उनका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। उनकी प्राथमिकताएँ सदैव काशी, गंगा और यहाँ की संगीत परंपरा से जुड़ी रहीं। उन्होंने आशा व्यक्त की थी कि आने वाली सरकार गंगा की स्वच्छता और काशी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाएगी। गौरतलब है कि उनके लिए काशी केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि संगीत, संस्कृति और आध्यात्मिकता की एक समग्र दुनिया थी।
सम्मान और विरासत
पंडित छन्नूलाल मिश्र को वर्ष 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2010 में पद्म भूषण और 2020 में पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। अपनी लंबी संगीत-यात्रा में उन्होंने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और शास्त्रीय संगीत को आम जनमानस के निकट लाने में अप्रतिम भूमिका निभाई। उनके जाने से काशी का एक युग समाप्त हुआ — किंतु बनारस घराने की वह सुर-धारा, जिसे उन्होंने सींचा, आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती रहेगी।