पंडित लालमणि मिश्र: 7 साल में सुरों की पहचान, 1,500 बंदिशें कंठस्थ और 'मिश्रवाणी' की अमर विरासत
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में पंडित लालमणि मिश्र का नाम उन विरल संगीतज्ञों में आता है जिन्होंने महज 7 वर्ष की आयु में सुरों पर असाधारण अधिकार प्रदर्शित किया और जीवनपर्यंत 1,500 से अधिक ध्रुपद व बंदिशें कंठस्थ कर भारतीय संगीत परंपरा को समृद्ध किया। उन्होंने अपनी अनूठी साधना से 'मिश्रवाणी' शैली का सृजन किया, जो आज भी संगीत जगत में उनकी पहचान बनी हुई है।
बचपन और प्रारंभिक जीवन
पंडित लालमणि मिश्र का जन्म 11 अगस्त 1924 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता रघुवंशी लाल मिश्र कानपुर के चौक इलाके में मिठाई की दुकान चलाते थे और माता का नाम रानी देवी था। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी, परंतु घर में संगीत के प्रति अनुराग था — और यही अनुराग बालक लालमणि की नींव बना।
जब वे लगभग 7 वर्ष के थे, तब कथाकार पंडित गोवर्धन लाल उनकी माता को संगीत सिखाने घर आया करते थे। छोटे लालमणि चुपचाप पास बैठकर हर पाठ को आत्मसात करते रहते। एक दिन उन्होंने 15 दिनों में सिखाए गए संगीत के पाठ को हारमोनियम पर लगभग हूबहू दोहरा दिया। यह देख पंडित गोवर्धन लाल चकित रह गए और उन्होंने बालक के माता-पिता को सलाह दी कि इस असाधारण प्रतिभा को विधिवत संगीत शिक्षा अवश्य दिलाई जाए।
गुरुओं से सीखी संगीत की बहुविध विधाएँ
इसके बाद लालमणि मिश्र ने अनेक गुरुओं से संगीत की विभिन्न विधाएँ सीखीं। उस्ताद मेहंदी हुसैन खाँ और रामकृष्ण मिश्र से ख्याल गायन की शिक्षा ली, श्याम बाबू से तबला सीखा और बालकृष्ण मिश्र व शुकदेव राय से सितार की बारीकियाँ आत्मसात कीं। ध्रुपद-धमार जैसी गंभीर गायन शैलियों में भी उन्होंने वरिष्ठ गुरुओं से दीक्षा ली।
महज 10 वर्ष की आयु में उन्हें संगीत महफिलों में आमंत्रित किया जाने लगा। ध्रुपद गाते समय उनकी लय और गणितीय संरचना इतनी सुदृढ़ होती थी कि मृदंग और तबला वादक भी अचंभित हो जाते थे। 16 वर्ष की आयु में वे बिहार के मुंगेर जिले में एक रईस परिवार के बच्चों को संगीत सिखाने लगे थे।
शिक्षण, विचित्र वीणा और अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ
1944 में उन्हें कानपुर के कान्यकुब्ज कॉलेज में संगीत शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। इसी दौर में उनकी रुचि दुर्लभ वाद्ययंत्र विचित्र वीणा की ओर मुड़ी। पटियाला के प्रसिद्ध विचित्र वीणा वादक उस्ताद अब्दुल अजीज खाँ से प्रेरणा लेकर उन्होंने इस वाद्य की विधिवत शिक्षा ग्रहण की। 1950 में लखनऊ में आयोजित भातखंडे जयंती समारोह में उनके वीणा वादन ने संगीत विद्वानों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
1951 में महान नृत्य निर्देशक उदय शंकर के दल के संगीत निर्देशक बनने के बाद उन्होंने श्रीलंका, इंग्लैंड, फ्रांस, बेल्जियम, अमेरिका और कनाडा की यात्राएँ कीं। इन यात्राओं के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय संगीत की सुगंध विश्व के अनेक देशों तक पहुँची — यह ऐसे समय में आया जब भारतीय संगीत को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की आवश्यकता थी।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय और शैक्षणिक योगदान
कानपुर के गांधी संगीत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य रहने के बाद 1958 में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर के आमंत्रण पर वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के संगीत संकाय से जुड़े। यहाँ उन्होंने वाद्य संगीत विभाग में अध्यापन किया और कालांतर में विभागाध्यक्ष तथा डीन के पद तक पहुँचे। गौरतलब है कि BHU में उनके कार्यकाल ने पीढ़ियों के संगीतकारों को प्रशिक्षित किया और संस्थागत स्तर पर शास्त्रीय संगीत को नई ऊँचाई दी।
विरासत और निधन
17 जुलाई 1979 को मात्र 55 वर्ष की आयु में पंडित लालमणि मिश्र का निधन हो गया। परंतु उनकी 'मिश्रवाणी' शैली, उनके द्वारा कंठस्थ की गई 1,500 से अधिक बंदिशें और उनके अनगिनत शिष्य आज भी उनकी सुरमयी विरासत को जीवंत रखे हुए हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत की यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।