पंडित किशन महाराज: श्मशान में ४० दिनों की साधना और एक महात्मा की सलाह से मिली तबले की सिद्धि
सारांश
मुख्य बातें
बनारस घराने के महान तबला वादक पंडित किशन महाराज की जीवन-यात्रा केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं है — यह अदम्य साधना, गुरु-शिष्य परंपरा और असाधारण समर्पण की गाथा है। पद्मश्री और पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित किशन महाराज ने एकल वादन और संगतकारी दोनों में बनारस घराने को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और विश्व भर में अपनी पहचान बनाई।
बचपन से ही असाधारण तालीम
३ सितंबर १९२३ को बनारस के एक प्रशिक्षित संगीतकारों के परिवार में जन्मे किशन महाराज को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की पहली दीक्षा उनके पिता हरि महाराज ने दी। पिता की शिक्षण-पद्धति अत्यंत अनूठी थी — उन्होंने आरंभिक एक वर्ष तक किशन को कोई भी सीधा ताल नहीं बजाने दिया।
उस दौर में जब किशन महाराज की आयु मात्र ५ वर्ष थी, पिता उनसे केवल १९ मात्रा, १७ मात्रा, १५ मात्रा, १३ मात्रा, ११ मात्रा और ९ मात्रा के चक्र बजवाते थे। झपताल, त्रिताल या एकताल जैसे प्रचलित तालों से उन्हें जानबूझकर दूर रखा गया। यह असामान्य आधार ही आगे चलकर उनकी विलक्षण लयकारी की नींव बनी।
चाचा कांठे महाराज की छत्रछाया में निखरी कला
पिता के निधन के बाद किशन महाराज के संगीत-जीवन का दायित्व उनके चाचा कांठे महाराज ने संभाला। उनकी कड़ी देखरेख में किशन उस युग के सर्वश्रेष्ठ और असाधारण तबला वादकों में गिने जाने लगे। उनकी प्रस्तुतियों में 'बोल' और 'ताल' का ऐसा जादू था कि सुनने वाले पूरी तरह सम्मोहित हो जाते थे।
गौरतलब है कि बनारस घराने की परंपरा में लयात्मक स्वतंत्रता और स्पष्ट बोलों पर विशेष ज़ोर दिया जाता है — और पंडित किशन महाराज इस परंपरा के सबसे चमकदार प्रतिनिधि बने।
श्मशान में ४० दिनों की साधना — एक महात्मा की सलाह
पंडित किशन महाराज के जीवन का सबसे रहस्यमय और प्रेरणादायक प्रसंग मुंबई से जुड़ा है। वहाँ उनकी मुलाकात एक महात्मा से हुई, जिन्होंने उन्हें सलाह दी कि तबले की पूर्ण सिद्धि प्राप्त करनी है तो श्मशान में साधना करो।
इस सलाह को पंडित किशन महाराज ने अक्षरशः स्वीकार किया। इसके बाद वे लगातार ४० रातों तक शिवाजी पार्क के श्मशान घाट पर जाते रहे। वहाँ वे प्रत्येक रात कम से कम ११ माला का पाठ करते थे, जिसमें दो से तीन घंटे का समय लगता था। यह साधना-क्रम पूरे ४० दिनों तक अनवरत चला।
मुंबई में यह साधना पूरी करने के बाद जब वे बनारस लौटे, तो अगले दो वर्षों तक संकट मोचन मंदिर में रहे और वहाँ भी उनका रियाज निरंतर जारी रहा। यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय शास्त्रीय संगीत की साधना-परंपरा पर चर्चा फिर से प्रासंगिक हो रही है।
तबले को मिली जुबान — विलक्षण वादन-शैली
पंडित किशन महाराज स्वयं कहते थे कि 'तबला एक गूंगा बाजा है' — लेकिन उनकी उँगलियाँ उसे बोलना सिखा देती थीं। वे तबले की भाषा बोलते थे और शब्दों का ऐसा खेल रचते थे कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते।
उनकी एक विशिष्ट मान्यता थी कि एक वादक को गायक से भी अधिक सजग और बुद्धिमान होना पड़ता है। यही विशेषता उन्हें समकालीनों से अलग करती थी। विलायत खाँ, पंडित रवि शंकर, अली अकबर खाँ, अमजद अली खाँ, निखिल बनर्जी जैसे वाद्य-संगीत के दिग्गजों के साथ-साथ पंडित भीमसेन जोशी, राजन मिश्रा और शराफत खाँ जैसे गायकों ने भी पंडित किशन के साथ मंच साझा किया और उन्हें विशेष स्नेह दिया।
डागर ब्रदर्स जैसे भारतीय शास्त्रीय संगीत के दिग्गज जब इलाहाबाद रेडियो में कार्यक्रम करते थे, तब मृदंग के स्थान पर भी वे पंडित किशन के साथ जाने को प्राथमिकता देते थे — यह उनकी संगतकारी की श्रेष्ठता का प्रमाण था।
संगीत से परे — एक बहुमुखी व्यक्तित्व
प्रसार भारती के आर्काइव्ज में दर्ज एक साक्षात्कार में पंडित किशन महाराज ने अपने अन्य शौकों का ज़िक्र किया था। उन्होंने कहा था, 'तबला से जब हमें फुर्सत मिलती थी तब तीन-चार चीजों की शौक और रुचि थी, जिसमें हम घर पर रहकर चित्रकारी करते थे। घर से बाहर निकलने पर उस समय हमें शिकार का बड़ा शौक था। फोटोग्राफी का भी शौक था।'
उनकी मंच-उपस्थिति भी अनोखी थी। अधिकांश प्रस्तुतियों में वे माथे पर एक बड़ा लाल टीका लगाते थे — जो बनारस घराने की विशिष्ट पहचान थी। साथ ही, वे साधारण तबला वादकों की तरह नहीं, बल्कि घुटनों के बल एक विशेष मुद्रा में बैठकर वादन करते थे।
पंडित किशन महाराज का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि महानता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि अटूट साधना और गुरु-परंपरा के प्रति समर्पण से आती है। उनकी विरासत आज भी बनारस घराने के शिष्यों और शास्त्रीय संगीत-प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।