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पं. समता प्रसाद: बनारस घराने के तबला महारथी जिन्होंने 'झनक झनक पायल बाजे' से दुनिया मोह ली

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पं. समता प्रसाद: बनारस घराने के तबला महारथी जिन्होंने 'झनक झनक पायल बाजे' से दुनिया मोह ली

सारांश

20 जुलाई 1921 को वाराणसी में जन्मे पंडित समता प्रसाद ने बनारस घराने की तबला परंपरा को वैश्विक मंच तक पहुँचाया। 'झनक झनक पायल बाजे' से 'शोले' तक उनका तबला गूँजा। पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित इस महान कलाकार का निधन 31 मई 1994 को पुणे में हुआ।

मुख्य बातें

पंडित समता प्रसाद का जन्म 20 जुलाई 1921 को कबीर चौरा, वाराणसी में हुआ; वे बनारस घराने (पूरब बाज) के सर्वोच्च तबला वादकों में गिने जाते हैं।
मात्र सात वर्ष की आयु में पिता के निधन के बाद उन्होंने भिक्कू महाराज से तालीम ली।
1942 में इलाहाबाद संगीत सम्मेलन में पहले बड़े प्रदर्शन से राष्ट्रीय पहचान मिली।
'झनक झनक पायल बाजे', 'बसंत बहार', 'शोले' सहित कई हिंदी फिल्मों में तबला वादन किया।
1979 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1991 में पद्म भूषण से सम्मानित।
31 मई 1994 को पुणे में हृदयाघात से निधन; नाद रूप की कार्यशाला के दौरान।

बनारस घराने के सर्वोच्च तबला वादकों में शुमार पंडित समता प्रसाद का जन्म 20 जुलाई 1921 को कबीर चौरा, वाराणसी में हुआ था। भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में उनका नाम उस दुर्लभ श्रेणी में आता है जहाँ शक्ति, लयकारी की गहराई और सौंदर्यबोध एक साथ एक वादक में समाहित हों। उन्होंने तबले को महज संगत-वाद्य की सीमा से बाहर निकालकर एकल मंच पर प्रतिष्ठित किया और 'झनक झनक पायल बाजे' जैसी फिल्मों के ज़रिए इस वाद्य को करोड़ों श्रोताओं तक पहुँचाया।

संगीत परिवार और बचपन की विपदा

पंडित समता प्रसाद का परिवार पूरब बाज (बनारस घराने) की तबला और पखावज परंपरा में रचा-बसा था। उनके पिता हरि सुंदर, जिन्हें बच्चा मिश्रा के नाम से भी जाना जाता था, इसी घराने के वाहक थे। समता प्रसाद की संगीत-यात्रा पिता के सान्निध्य में शुरू हुई, किंतु जब वे मात्र सात वर्ष के थे, पिता का निधन हो गया। इस आघात के बाद उन्होंने भिक्कू महाराज का शिष्यत्व ग्रहण किया और प्रतिदिन घंटों के अभ्यास को अपनी दिनचर्या का केंद्र बना लिया।

पहला बड़ा मंच और राष्ट्रीय पहचान

1942 में इलाहाबाद संगीत सम्मेलन में दिए गए पहले बड़े प्रदर्शन ने उन्हें संगीत-जगत में एक अलग पहचान दिलाई। उपस्थित संगीतकारों और श्रोताओं ने उनकी वादन-शैली की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। इसके बाद वे न केवल संगत-वादक के रूप में, बल्कि एकल कलाकार के रूप में भी स्थापित हुए। कोलकाता, मुंबई, चेन्नई और लखनऊ के प्रमुख मंचों पर उनकी प्रस्तुतियाँ हुईं।

विश्वमंच पर भारतीय तबले का परचम

पंडित समता प्रसाद ने भारतीय सांस्कृतिक दल के प्रतिनिधि के रूप में फ्रांस, रूस और एडिनबर्ग सहित अनेक देशों में प्रदर्शन किए। यह ऐसे समय में था जब भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिमी देशों में पहचान दिलाना एक चुनौती थी। उनकी वादन-शैली ने विदेशी दर्शकों को भी तबले की ताल और भाव से जोड़ा। गौरतलब है कि उन्होंने फिल्म-संगीत में भी अपनी छाप छोड़ी — 'झनक झनक पायल बाजे', 'मेरी सूरत तेरी आँखें', 'बसंत बहार' और 'शोले' जैसी हिंदी फिल्मों में उनका तबला वादन आज भी क्लासिक माना जाता है।

सम्मान और पुरस्कार

1979 में उन्हें भारत की राष्ट्रीय संगीत, नृत्य और नाटक अकादमी — संगीत नाटक अकादमी — ने अपने प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाज़ा। इसके बाद 1991 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत किया। ये पुरस्कार उनके दशकों के समर्पण और भारतीय संगीत को वैश्विक मंच पर ले जाने के योगदान की स्वीकृति थे।

अंतिम विदाई और विरासत

31 मई 1994 को पुणे में हृदयाघात से पंडित समता प्रसाद का निधन हो गया। वे उस समय नाद रूप द्वारा आयोजित एक संगीत कार्यशाला में भाग लेने के लिए पुणे आए हुए थे। उनके जाने के बाद भी बनारस घराने की तबला परंपरा उनके शिष्यों और रिकॉर्डिंग के माध्यम से जीवित है। उनकी जन्म-शताब्दी के अवसर पर संगीत-प्रेमियों ने उन्हें याद किया और उनकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प लिया।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी मुख्यधारा की चर्चा में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जो पंडित रविशंकर या उस्ताद ज़ाकिर हुसैन को मिला। यह विरोधाभास बताता है कि भारत में शास्त्रीय संगीत की विरासत को संरक्षित करने की ज़िम्मेदारी केवल पुरस्कारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए — उनके जैसे उस्तादों की रिकॉर्डिंग, शिक्षण पद्धति और घराना-परंपरा को डिजिटल युग में सहेजना आज की असली ज़रूरत है।
RashtraPress
19 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित समता प्रसाद कौन थे?
पंडित समता प्रसाद भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान तबला वादक थे, जिनका जन्म 20 जुलाई 1921 को वाराणसी के कबीर चौरा में हुआ था। वे बनारस घराने (पूरब बाज) के सबसे प्रतिष्ठित प्रतिनिधियों में गिने जाते हैं और उन्होंने तबले को एकल वाद्य के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया।
पंडित समता प्रसाद ने किन फिल्मों में तबला बजाया?
'झनक झनक पायल बाजे', 'मेरी सूरत तेरी आँखें', 'बसंत बहार' और 'शोले' जैसी प्रमुख हिंदी फिल्मों में उन्होंने तबला वादन किया। इन फिल्मों के संगीत में उनके तबले ने एक विशिष्ट पहचान बनाई जो आज भी क्लासिक मानी जाती है।
पंडित समता प्रसाद को कौन-से पुरस्कार मिले?
उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1991 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण — देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान — से नवाज़ा गया। ये पुरस्कार भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके असाधारण योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति थे।
पंडित समता प्रसाद के गुरु कौन थे?
उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके पिता हरि सुंदर (बच्चा मिश्रा) के साथ हुई। सात वर्ष की आयु में पिता के निधन के बाद उन्होंने भिक्कू महाराज का शिष्यत्व ग्रहण किया और उनके मार्गदर्शन में तबले की गहन साधना की।
पंडित समता प्रसाद का निधन कब और कहाँ हुआ?
31 मई 1994 को पुणे में हृदयाघात के कारण उनका निधन हुआ। वे उस समय नाद रूप संस्था द्वारा आयोजित एक संगीत कोचिंग कार्यशाला में भाग लेने के लिए पुणे गए हुए थे।
राष्ट्र प्रेस
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