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पांगी बना हिमाचल का पहला प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल, ₹5 करोड़ रिवॉल्विंग फंड और जौ का MSP तय

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पांगी बना हिमाचल का पहला प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल, ₹5 करोड़ रिवॉल्विंग फंड और जौ का MSP तय

सारांश

पांगी घाटी को हिमाचल का पहला प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल घोषित किया गया है — ₹5 करोड़ के रिवॉल्विंग फंड और जौ के लिए ₹60/किग्रा MSP के साथ। सुक्खू सरकार इसे जनजातीय क्षेत्रों में सतत आजीविका और जलवायु अनुकूल कृषि की नई इबारत बता रही है।

मुख्य बातें

पांगी घाटी हिमाचल प्रदेश का पहला प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल घोषित हुई।
सरकार ने ₹5 करोड़ का रिवॉल्विंग फंड और प्राकृतिक जौ के लिए ₹60 प्रति किलोग्राम MSP तय किया।
जनजातीय उपयोजना के तहत 2024-25 में ₹890.28 करोड़ और 2025-26 में ₹638.73 करोड़ का प्रावधान।
जनजातीय क्षेत्रों में 3,234 महिलाएँ 'लखपति दीदी' बनीं; पात्र महिलाओं को ₹1,500 प्रतिमाह सहायता।
होमस्टे निवेश पर ₹5 करोड़ तक के लिए 5% ब्याज सब्सिडी; काजा में पहली बार हिमाचल दिवस मनाने का निर्णय।

हिमाचल प्रदेश की दुर्गम पांगी घाटी राज्य का पहला प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल घोषित हो गई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार ने 19 जुलाई 2026 को यह जानकारी देते हुए कहा कि यह कदम सतत विकास, रसायन मुक्त कृषि और जलवायु अनुकूल खेती को प्रोत्साहन देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। इस पहल के साथ सरकार ने ₹5 करोड़ का रिवॉल्विंग फंड और प्राकृतिक तरीके से उगाई गई जौ (बार्ले) के लिए ₹60 प्रति किलोग्राम का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी तय किया है।

मुख्य घटनाक्रम

पांगी को मॉडल उपमंडल का दर्जा देने के साथ सरकार ने किसानों को रासायनिक खाद छोड़ने के लिए ठोस आर्थिक प्रोत्साहन दिया है। ₹60 प्रति किलोग्राम का MSP बाज़ार दर से ऊपर रखा गया है, ताकि प्राकृतिक खेती को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाया जा सके। सरकार का कहना है कि लाहौल-स्पीति, किन्नौर, पांगी और भरमौर जैसे ऊँचाई वाले जनजातीय क्षेत्रों में कम जनसंख्या, दुर्गम भूगोल और लंबी सर्दियाँ रासायनिक खेती को वैसे भी सीमित करती हैं — इसलिए इन्हें प्राकृतिक खेती के लिए आदर्श माना जा रहा है।

जनजातीय क्षेत्रों की विशेष स्थिति

सरकार के आँकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जनजाति क्षेत्र हिमाचल के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 42.49 प्रतिशत हैं, जबकि यहाँ केवल 3.92 लाख लोग निवास करते हैं — राज्य की कुल आबादी का मात्र 5.71 प्रतिशत। जनसंख्या घनत्व महज 7 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि राज्य का औसत 123 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। यह असमानता ही इन इलाकों में विशेष नीतिगत ध्यान की ज़रूरत को रेखांकित करती है।

बजट और विकास निवेश

जनजातीय उपयोजना (STP) के तहत हर वर्ष कुल विकास बजट का 9 प्रतिशत इन क्षेत्रों के लिए आरक्षित किया जाता है। वर्ष 2024-25 में इस मद में ₹890.28 करोड़ और 2025-26 के लिए अनुसूचित जनजाति घटक के तहत ₹638.73 करोड़ का प्रावधान किया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में 2025-26 के दौरान 3,361 छात्रों को प्री-मैट्रिक, 5,693 को पोस्ट-मैट्रिक और 304 को मेधावी छात्रवृत्ति दी गई है।

स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सेवाएँ

जनजातीय क्षेत्रों में 2 जिला अस्पताल, 6 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 49 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 123 स्वास्थ्य उपकेंद्र संचालित हैं। 568 आंगनबाड़ी केंद्रों के ज़रिए 5,084 अनुसूचित जनजाति लाभार्थियों को पोषण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ दी जा रही हैं। महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर 3,234 महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों और आजीविका कार्यक्रमों के ज़रिए 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं। इंदिरा गांधी प्यारी बहना सुख सम्मान निधि योजना के तहत पात्र महिलाओं को ₹1,500 प्रतिमाह की आर्थिक सहायता दी जा रही है। सरकार के अनुसार, जनजातीय क्षेत्रों में लिंगानुपात 1,000 पुरुषों पर 1,018 महिलाएँ है — राज्य के औसत 972 से बेहतर।

आगे की राह

सरकार ने होमस्टे स्थापित करने, विस्तार और उन्नयन के लिए ₹5 करोड़ तक के निवेश पर 5 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी देने की घोषणा की है, जिससे पर्यटन और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में रोज़गार के नए अवसर बनने की उम्मीद है। उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश के 75 वर्षों के इतिहास में पहली बार काजा में हिमाचल दिवस मनाने का निर्णय लिया गया है, जिसे समावेशी शासन की दिशा में प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह होगी कि ₹60/किग्रा MSP किसानों तक वास्तव में पहुँचता है या केवल काग़ज़ पर रहता है — क्योंकि दूरदराज़ के जनजातीय क्षेत्रों में खरीद तंत्र की कमज़ोरी पुरानी समस्या है। ₹5 करोड़ का रिवॉल्विंग फंड उस इलाके के लिए सीमित लग सकता है जो राज्य के 42.49% भूभाग में फैला है। सरकार के आँकड़े विकास की उत्साहजनक तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन स्वतंत्र सत्यापन के बिना यह नहीं कहा जा सकता कि ये लाभ उन सबसे दुर्गम बस्तियों तक पहुँच रहे हैं जिनकी ज़रूरत सबसे अधिक है।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पांगी को प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल क्यों चुना गया?
पांगी की दुर्गम भौगोलिक स्थिति, लंबी सर्दियाँ और कम जनसंख्या घनत्व इसे रासायनिक खेती के लिए स्वाभाविक रूप से अनुपयुक्त बनाते हैं, जिससे यह प्राकृतिक खेती के लिए आदर्श स्थल बनता है। सरकार इसे लाहौल-स्पीति, किन्नौर और भरमौर जैसे अन्य जनजातीय क्षेत्रों के लिए एक दोहराने योग्य मॉडल के रूप में विकसित करना चाहती है।
प्राकृतिक जौ के लिए तय MSP क्या है और इसका किसानों को क्या फायदा होगा?
सरकार ने प्राकृतिक तरीके से उगाई गई जौ (बार्ले) के लिए ₹60 प्रति किलोग्राम का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है। यह MSP किसानों को रासायनिक खाद छोड़ने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देता है और उनकी आय को एक निश्चित न्यूनतम स्तर पर सुरक्षित रखता है।
हिमाचल के जनजातीय क्षेत्रों के लिए सरकार कितना बजट खर्च कर रही है?
जनजातीय उपयोजना (STP) के तहत कुल विकास बजट का 9 प्रतिशत हर वर्ष जनजातीय क्षेत्रों के लिए आरक्षित है। वर्ष 2024-25 में ₹890.28 करोड़ और 2025-26 के लिए ₹638.73 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
जनजातीय क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण के लिए क्या किया जा रहा है?
3,234 महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों और आजीविका कार्यक्रमों के ज़रिए 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं। इसके अलावा इंदिरा गांधी प्यारी बहना सुख सम्मान निधि योजना के तहत पात्र महिलाओं को ₹1,500 प्रतिमाह की आर्थिक सहायता दी जा रही है।
काजा में हिमाचल दिवस मनाने का क्या महत्व है?
हिमाचल प्रदेश के 75 वर्षों के इतिहास में पहली बार काजा में हिमाचल दिवस मनाने का निर्णय लिया गया है। सरकार इसे जनजातीय क्षेत्रों तक सुशासन पहुँचाने और समावेशी विकास के प्रतीकात्मक संकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
राष्ट्र प्रेस
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