जन्माष्टमी 2025: मथुरा से दिल्ली-NCR तक 'जय कन्हैया लाल की' की गूंज, रात 12 बजे हुआ भव्य जन्मोत्सव
सारांश
मुख्य बातें
रात ठीक 12 बजे जैसे ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन क्षण आया, मथुरा से लेकर दिल्ली-एनसीआर, द्वारका और बेंगलुरु तक पूरे देश में 'हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की' के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा। 5 सितंबर की मध्यरात्रि को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की इस बेला में देश-विदेश में विशेष आयोजन किए गए और मंदिरों में आरती व उत्सव की अभूतपूर्व छटा देखने को मिली।
मथुरा में जन्मभूमि पर उमड़ा आस्था का सैलाब
भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा में जन्माष्टमी का उत्सव अपने चरम पर रहा। शुक्रवार की सुबह से ही कृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर में देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं की अटूट कतारें लगी रहीं। मंगला आरती के उपरांत मंदिर प्रांगण उत्सव के रंग में पूरी तरह रंग गया — ढोल, ताशे और नगाड़ों की थाप पर भक्त झूमते-नाचते नजर आए। रात 12 बजते ही मंदिरों में जयकारों की ऐसी लहर उठी कि पूरा परिसर कन्हैया लाल की भक्ति में डूब गया।
प्रशासन की व्यापक तैयारी, भक्तों को राहत
भारी भीड़ को देखते हुए मथुरा प्रशासन ने सुरक्षा और सुविधा के लिए व्यापक प्रबंध किए। अधिकारियों के अनुसार, इस बार दर्शन व्यवस्था पहले से बेहतर रही और श्रद्धालुओं को किसी विशेष असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा। मंदिर परिसर में आवागमन सुचारु रखने के लिए विशेष मार्ग-व्यवस्था लागू की गई थी।
भक्तों की जुबानी — आस्था और अनुभव
मंदिर में दर्शन के लिए आई एक महिला भक्त ने कहा, 'सब कुछ कान्हा जी की कृपा से हो रहा है। यह उनकी लीला और उनकी माया है, वही जानते हैं। पूरी दुनिया उनकी धुन पर नाच रही है। जब से हमने कान्हा की शरण ली है, तब से जीवन में चमत्कार ही चमत्कार हो रहा है।'
एक अन्य भक्त मोहन सिंह ने उत्साह के साथ बताया, 'हम यहाँ लगभग 15 सालों से त्योहार मना रहे हैं। इससे हमें बहुत खुशी मिलती है। मैं खुद नहीं नाचता, बल्कि कान्हा खुद नचाते हैं।'
एक अन्य महिला भक्त — जिनका ससुराल मथुरा में है — ने बताया कि यह उनकी पहली जन्माष्टमी दर्शन थी और अनुभव बेहद सुखद रहा। वहीं, एक और श्रद्धालु महिला ने जानकारी दी कि वे पिछले 20 वर्षों से इस मंदिर में आ रही हैं और इस बार की व्यवस्था पहले से कहीं बेहतर पाई।
दिल्ली-NCR, द्वारका और बेंगलुरु में भी उत्सव की धूम
जन्माष्टमी का उल्लास केवल मथुरा तक सीमित नहीं रहा। दिल्ली-एनसीआर, नोएडा, द्वारका और बेंगलुरु समेत देश के तमाम शहरों में मंदिरों और सामुदायिक केंद्रों पर भव्य आयोजन हुए। रात 12 बजे के बाद मटकी-फोड़ प्रतियोगिताएँ, झाँकियाँ और भजन-कीर्तन के कार्यक्रम देर रात तक जारी रहे। यह उत्सव इस वर्ष भी भारत की सांस्कृतिक एकता और सामूहिक आस्था का जीवंत प्रमाण बना।
आगे का उत्सव
जन्माष्टमी के अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाएगा, जिसमें मंदिरों में विशेष भोग और झाँकी के आयोजन होंगे। मथुरा-वृंदावन में यह उत्सव परंपरागत रूप से कई दिनों तक चलता है, और श्रद्धालुओं का आना-जाना अगले कुछ दिनों तक जारी रहने की संभावना है।