पंडित देवब्रत चौधरी: चार साल में सितार, 18 में आकाशवाणी — भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक अद्वितीय सफर
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय शास्त्रीय संगीत के शिखर पुरुषों में गिने जाने वाले पंडित देवब्रत चौधरी — जिन्हें संगीत जगत में देबू चौधरी के नाम से जाना जाता था — ने महज चार साल की आयु में सितार थाम लिया था और 18 साल की उम्र में आकाशवाणी पर अपनी पहली प्रस्तुति दी। उनका यह सफर भारतीय संगीत इतिहास में बाल-प्रतिभा और आजीवन साधना का एक दुर्लभ उदाहरण है।
बचपन और संगीत की शुरुआत
पंडित देवब्रत चौधरी का जन्म 30 मई 1935 को रामगोपालपुर में हुआ था, जो वर्तमान में बांग्लादेश का हिस्सा है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों की दुनिया में मगन रहते हैं, उस उम्र में देबू चौधरी सुरों की गहराई में उतर चुके थे। चार साल की आयु में सितार से उनका नाता जुड़ा और फिर पूरा जीवन इसी वाद्य को समर्पित हो गया।
भारत विभाजन के बाद उनका परिवार कोलकाता आ बसा — वह शहर जिसे उस दौर में देश की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता था। यहाँ उन्हें उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और उस्ताद मुश्ताक अली खान जैसे दिग्गजों को सुनने और समझने का अवसर मिला। बाद में उन्होंने उस्ताद मुश्ताक अली खान से विधिवत सितार की शिक्षा ग्रहण की और करीब 38 वर्षों तक गुरु-शिष्य परंपरा में रहकर संगीत को आत्मसात किया।
आकाशवाणी से अंतरराष्ट्रीय मंच तक
18 साल की उम्र में आकाशवाणी पर उनका पहला कार्यक्रम प्रसारित हुआ — उस युग में यह उपलब्धि किसी बड़े राष्ट्रीय सम्मान से कम नहीं मानी जाती थी। यहीं से उनकी पहचान देश भर में फैलने लगी। आगे चलकर उन्होंने अमेरिका में दिन के अलग-अलग पहरों के अनुसार 24 रागों की रिकॉर्डिंग की, जिसे संगीत विशेषज्ञों ने एक अभूतपूर्व प्रयोग बताया।
उनका नाम पंडित रविशंकर, उस्ताद विलायत खान और पंडित निखिल बनर्जी जैसे महान कलाकारों के साथ लिया जाता था — यह तथ्य अपने आप में उनकी कद-काठी को रेखांकित करता है।
सेनिया घराना और अनूठी वादन शैली
पंडित देवब्रत चौधरी सेनिया घराने से जुड़े थे — वह परंपरा जो तानसेन की विरासत से उद्भूत मानी जाती है और रागों की शुद्धता के लिए विख्यात है। उनकी वादन शैली को समकालीन कलाकारों से विशिष्ट माना जाता था। वह 17 फ्रेट वाला सितार बजाते थे, जिसे वादकों के बीच अत्यंत कठिन माना जाता है। उनके सितार की मधुरता ऐसी थी कि श्रोता उसे 'गाने वाला सितार' कहते थे।
शिक्षा, लेखन और नए रागों की रचना
संगीत साधना के साथ-साथ पंडित देवब्रत चौधरी ने शिक्षा के क्षेत्र में भी अमिट छाप छोड़ी। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के संगीत विभाग में प्रोफेसर और बाद में डीन के पद पर रहे, जहाँ उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को संगीत की दीक्षा दी। उनका मत था कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि मनुष्य को परिष्कृत करने का माध्यम है।
उन्होंने भारतीय संगीत पर कई पुस्तकें लिखीं और आठ नए रागों की रचना की — एक ऐसा योगदान जो शास्त्रीय संगीत की जीवंत परंपरा को आगे बढ़ाता है।
सम्मान और विदाई
भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके बहुआयामी योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पहले पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए।
वर्ष 2021 में कोरोना महामारी के संक्रमण के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ा और उन्हें नई दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में भर्ती कराया गया। 1 मई 2021 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके जाने से भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक पूरी पीढ़ी का अध्याय बंद हो गया — किंतु उनके रागों की गूँज और उनके हजारों शिष्य उनकी विरासत को जीवित रखे हुए हैं।