दिल्ली में पंडित देबोज्योति बोस की प्रस्तुति ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को नया जीवन दिया
सारांश
Key Takeaways
- पंडित देबोज्योति बोस का संगीत परंपरा और नवाचार का अद्भुत मिश्रण है।
- उस्ताद अमजद अली खान की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष बना दिया।
- हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत ने फिर से अपनी महत्ता साबित की।
- बोस परिवार की लयात्मकता ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
- यह आयोजन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
नई दिल्ली, 19 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की एक विशेष संध्या का आयोजन किया गया। टीम गुरुग्राम फेस्टिवल द्वारा आयोजित आईएचएफएफआई 'रूट चेतना' की इस पहल में सरोद के मास्टर कलाकार पंडित देबोज्योति बोस ने अपने 'गुरु' पद्म विभूषण उस्ताद अमजद अली खान की उपस्थिति में पंडित कुमार बोस और रोहेन बोस के साथ तबले पर अद्भुत प्रस्तुति दी।
पंडित देबोज्योति बोस ने मंच पर 'सेनिया बंगश घराना' की गहराई को दर्शाया। यह परंपरा अपनी सुरीली धुनों और गहन दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध है। उस्ताद अमजद अली खान से शिक्षा प्राप्त करने वाले बोस के संगीत में सटीकता, भावना, परंपरा और नवाचार का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। पंडित कुमार बोस और रोहेन बोस के साथ, तबले की यह प्रस्तुति सुर-ताल और मौन नाद के बीच एक अद्वितीय तालमेल प्रस्तुत करती है।
शाम की शुरुआत 'दीपचंदी ताल' में आकर्षक 'राग झिला काफी' से हुई, इसके बाद शुद्ध बसंत आलाप, जोड़ और एक 'झपताल बंदिश' प्रस्तुत की गई। यह उनके गुरु उस्ताद अमजद अली खान की एक अद्भुत 'द्रुत बंदिश' थी, जिसने परंपरा और भावनात्मक कहानी का सुंदर संयोजन पेश किया। इसके पश्चात पंडित देबोज्योति बोस ने 'राग खंबज' में अपनी रचनाएं 'विलंबित तीन ताल' और 'एक द्रुत तीन ताल' पेश की। यह प्रस्तुति पूरी तरह से पारंपरिक और मनोरंजक थी, और इसका हर सुर उनकी विरासत को उजागर कर रहा था।
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की इस विशेष संध्या में, सरोद की उपस्थिति श्रोताओं के लिए विशेष आकर्षण बनी, यह ऐसे क्षेत्र में जहाँ इस वाद्य का जीवंत प्रदर्शन दुर्लभ होता है। मंच पर इसकी उपस्थिति अत्यधिक प्रभावशाली रही। लय की गतिशीलता 'बोस परिवार' की एक विशेषता है, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
पंडित देबोज्योति बोस की वापसी और उनकी मनमोहक प्रस्तुति पर बात करते हुए उस्ताद अमजद अली खान ने कहा, "इतने मनमोहक संगीत का साक्षी बनना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। इस संगीत को सुनकर ऐसा लगता है जैसे खेतों में अपने हाथों से बोए पौधे खिलने और महकने लगे हैं। आज मैं कुछ वैसी ही खुशी महसूस कर रहा हूँ। जब एक रचना आकार लेती है, तब वह कविता का रूप ले लेती है। बचपन से ही मेरे मन में इसके प्रति एक गहरा जुनून रहा है, और देबोज्योति ने इसे पहचाना और समझा। मुझे पूरी उम्मीद है कि देबोज्योति इसी तरह आगे बढ़ते रहेंगे और सफलता की नई ऊंचाइयों पर पहुंचेंगे।