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पंडित किशन महाराज: श्मशान में ४० दिनों की तबला साधना और बनारस घराने की अमर विरासत

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पंडित किशन महाराज: श्मशान में ४० दिनों की तबला साधना और बनारस घराने की अमर विरासत

सारांश

तबले की पूर्ण सिद्धि के लिए एक महात्मा की सलाह पर मुंबई के श्मशान में ४० रातें बिताना — यही थी पंडित किशन महाराज की साधना। बनारस घराने के इस पद्म विभूषण विभूषित वादक ने अपनी उंगलियों से तबले को ज़ुबान दी और भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक अमर विरासत सौंपी।

मुख्य बातें

पंडित किशन महाराज का जन्म ३ सितंबर १९२३ को बनारस घराने के संगीतज्ञ परिवार में हुआ था।
पिता हरि महाराज ने मात्र ५ वर्ष की आयु में तालीम शुरू की — पहले एक वर्ष तक केवल विषम मात्राओं का अभ्यास कराया।
मुंबई में एक महात्मा की सलाह पर शिवाजी पार्क के श्मशान में ४० रातों तक प्रतिरात्रि ११ माला पाठ के साथ साधना की।
बनारस लौटने के बाद संकट मोचन मंदिर में २ वर्षों तक रियाज़ जारी रखा।
विलायत खाँ, पंडित रवि शंकर, पंडित भीमसेन जोशी सहित दर्जनों दिग्गजों के साथ मंच साझा किया।
भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

पंडित किशन महाराजबनारस घराने के वह तबला वादक जिन्होंने अपने वाद्ययंत्र को महज एक ताल-यंत्र नहीं, बल्कि एक जीवंत भाषा बना दिया। उनकी साधना की कहानी उतनी ही असाधारण है जितनी उनकी कला — एक महात्मा की सलाह पर मुंबई के शिवाजी पार्क के श्मशान में ४० रातों तक रियाज़, और फिर बनारस लौटकर संकट मोचन मंदिर में दो वर्षों की निरंतर अभ्यास-यात्रा। इस असाधारण समर्पण ने उन्हें पद्मश्री और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों तक पहुँचाया।

बचपन की बुनियाद: पाँच वर्ष की उम्र में असाधारण तालीम

३ सितंबर १९२३ को बनारस घराने के एक प्रशिक्षित संगीतज्ञ परिवार में जन्मे किशन महाराज को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की पहली दीक्षा उनके पिता हरि महाराज ने दी। पिता की शिक्षण-पद्धति अपने आप में अनूठी थी — शुरुआत के पूरे एक वर्ष तक उन्होंने बालक किशन को कोई सीधी ताल नहीं बजाने दी।

जब भी तबला बजवाया, तो केवल १९ मात्रा, १७ मात्रा, १५ मात्रा, १३ मात्रा, ११ मात्रा और ९ मात्रा ही बजवाई। झपताल, त्रिताल या एकताल — कोई भी प्रचलित ताल उस दौर में वर्जित था। उस समय किशन महाराज की आयु मात्र ५ वर्ष थी। यह कठोर अनुशासन ही आगे चलकर उनकी विलक्षण लयकारी का आधार बना।

चाचा कांठे महाराज की छत्रछाया में निखरी कला

पिता के निधन के बाद किशन महाराज के संगीत-सफर की बागडोर उनके चाचा कांठे महाराज ने थामी। उनकी कड़ी देखरेख में किशन महाराज उस युग के सबसे असाधारण तबला वादकों में गिने जाने लगे। उनकी प्रस्तुतियों में 'बोल' और 'ताल' का ऐसा जादू था कि श्रोता सम्पूर्ण रूप से सम्मोहित हो जाते थे।

गौरतलब है कि बनारस घराने की विशिष्ट शैली — जिसमें एकल वादन और संगतकारी दोनों में घराने की परम्परागत खूबियाँ समाहित हैं — को पंडित किशन महाराज ने नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। वे आम तबला वादकों की भाँति नहीं, बल्कि घुटनों के बल एक विशेष मुद्रा में बैठकर वादन करते थे, और उनके माथे पर बड़ा लाल टीका बनारस घराने की पहचान का प्रतीक था।

श्मशान में साधना: एक महात्मा की सलाह और ४० रातों का रियाज़

पंडित किशन महाराज के जीवन का सबसे चर्चित प्रसंग उनकी मुंबई-यात्रा से जुड़ा है। मुंबई में एक महात्मा से भेंट हुई जिन्होंने उनसे कहा कि तबले की पूर्ण सिद्धि प्राप्त करनी है तो श्मशान में जाकर साधना करो। इस सलाह को पंडित किशन ने शिरोधार्य किया।

इसके बाद ४० रातों तक वे शिवाजी पार्क के श्मशान में जाते रहे और प्रतिरात्रि कम से कम ११ माला पाठ करते थे, जिसमें दो से तीन घंटे का समय लगता था। यह ऐसे समय में आया जब वे अपनी कला को उसकी परम सीमा तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध थे। मुंबई में साधना पूरी होने के बाद बनारस लौटे और संकट मोचन मंदिर में दो वर्षों तक रहकर रियाज़ जारी रखा।

दिग्गजों के साथ मंच और संगीत की विरासत

पंडित किशन महाराज की प्रतिभा ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के महारथियों को उनका मुरीद बना दिया। विलायत खाँ, पंडित रवि शंकर, अली अकबर खाँ, अमजद अली खाँ और निखिल बनर्जी जैसे वाद्य-संगीत के दिग्गजों ने उनके साथ मंच साझा किया। गायन के क्षेत्र में पंडित भीमसेन जोशी, राजन मिश्रा और शराफत खाँ जैसी विभूतियों ने भी उनके साथ प्रस्तुतियाँ दीं।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य कलाकार डागर ब्रदर्स — जब इलाहाबाद रेडियो में कार्यक्रम करते थे — मृदंग की उपस्थिति के बावजूद कहते थे: 'हम पंडित किशन के साथ जाएंगे।' यह वाक्य ही उनकी श्रेष्ठता का प्रमाण-पत्र था।

तबले की ज़ुबान और जीवन के अन्य रंग

प्रसार भारती आर्काइव्ज़ पर दिए एक इंटरव्यू में पंडित किशन महाराज ने अपने जीवन के विविध पहलुओं पर खुलकर बात की थी। उन्होंने कहा था: 'तबला से जब हमें फुर्सत मिलती थी तब तीन-चार चीजों की शौक और रुचि थी, जिसमें हम घर पर रहकर चित्रकारी करते थे। घर से बाहर निकलने पर उस समय हमें शिकार का बड़ा शौक था। फोटोग्राफी का भी शौक था। अन्य खेलों में रुचि थी, लेकिन वह खेल हमसे खेले ही नहीं गए।'

पंडित किशन महाराज की मान्यता थी कि तबला एक 'गूंगा बाजा' है — उसकी अपनी ज़ुबान नहीं होती — लेकिन एक सच्चे गुरु की शिक्षा से उंगलियाँ ही उसे वाणी दे देती हैं। वे स्वयं तबले से शब्दों का खेल खेलते थे और उनकी उंगलियाँ ताल को भाषा में बदल देती थीं। उनकी यह विरासत आज भी बनारस घराने की पहचान है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या आज का संगीत-शिक्षण ऐसी प्रतिबद्धता की माँग करता है या करने में सक्षम है। बनारस घराने की यह विरासत संस्थागत संगीत-शिक्षा के युग में भी जीवित है — पर उसकी गहराई और कठोरता को संरक्षित करने की ज़िम्मेदारी अब किसके कंधों पर है, यह प्रश्न अनुत्तरित है।
RashtraPress
2 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित किशन महाराज कौन थे?
पंडित किशन महाराज बनारस घराने के विश्वविख्यात तबला वादक थे, जिनका जन्म ३ सितंबर १९२३ को हुआ था। उन्हें एकल वादन और संगतकारी दोनों में महारत के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री और पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।
पंडित किशन महाराज ने श्मशान में रियाज़ क्यों किया?
मुंबई में एक महात्मा ने उन्हें सलाह दी थी कि तबले की पूर्ण सिद्धि के लिए श्मशान में साधना करनी होगी। इस सलाह पर अमल करते हुए उन्होंने शिवाजी पार्क के श्मशान में ४० रातें बिताईं और प्रतिरात्रि कम से कम ११ माला पाठ किया।
पंडित किशन महाराज को तबला किसने सिखाया?
उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके पिता हरि महाराज ने दी, जिन्होंने मात्र ५ वर्ष की आयु से उन्हें विषम मात्राओं का अभ्यास कराया। पिता के निधन के बाद चाचा कांठे महाराज ने उनकी तालीम जारी रखी।
बनारस घराने की तबला शैली में क्या खास है?
बनारस घराना एकल वादन और संगतकारी दोनों में अपनी विशिष्ट परम्परा के लिए जाना जाता है। पंडित किशन महाराज इस घराने की पहचान — माथे पर बड़ा लाल टीका और घुटनों के बल विशेष मुद्रा में बैठकर वादन — के प्रतीक बने।
पंडित किशन महाराज ने किन दिग्गज कलाकारों के साथ मंच साझा किया?
उन्होंने विलायत खाँ, पंडित रवि शंकर, अली अकबर खाँ, अमजद अली खाँ, निखिल बनर्जी, पंडित भीमसेन जोशी, राजन मिश्रा और शराफत खाँ जैसे दिग्गजों के साथ मंच साझा किया। डागर ब्रदर्स विशेष रूप से उनके साथ संगत करने की इच्छा रखते थे।
राष्ट्र प्रेस
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