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पंडित लच्छू महाराज: बनारस घराने की तबला विरासत, जिनकी थाप 'मुगल-ए-आजम' से 'पाकीजा' तक गूंजी

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पंडित लच्छू महाराज: बनारस घराने की तबला विरासत, जिनकी थाप 'मुगल-ए-आजम' से 'पाकीजा' तक गूंजी

सारांश

बनारस घराने की तबला परंपरा को 'मुगल-ए-आजम' से 'पाकीजा' तक पहुँचाने वाले पंडित लच्छू महाराज ने 1972 में पद्मश्री तक ठुकरा दी — क्योंकि उनके लिए श्रोताओं की तालियां ही सबसे बड़ा पुरस्कार थीं। 27 जुलाई 2016 को उनके जाने के बाद भी उनकी थाप अमर है।

मुख्य बातें

पंडित लच्छू महाराज का जन्म 16 अक्टूबर 1944 को वाराणसी में हुआ; असली नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था।
उन्होंने पिता वासुदेव महाराज और चाचा पंडित बिंदादीन महाराज से बनारस घराने की तबला विद्या सीखी।
1949 में फिल्म 'महल' से शुरू हुआ फिल्मी सफर 'मुगल-ए-आजम' , 'पाकीजा' और 'छोटी-छोटी बातें' तक फैला।
1972 में पद्मश्री पुरस्कार के लिए नामांकित हुए, लेकिन उन्होंने स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
उनकी बहन निर्मला देवी अभिनेता गोविंदा की माँ थीं।
27 जुलाई 2016 को हृदयाघात से निधन; उनके कई शिष्य आज संगीत जगत में सक्रिय हैं।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश में पंडित लच्छू महाराज एक ऐसा नाम हैं, जिनकी तबले की थाप आज भी संगीत प्रेमियों के कानों में गूंजती है। 16 अक्टूबर 1944 को वाराणसी में जन्मे इस महान तबला वादक ने 27 जुलाई 2016 को इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन बनारस घराने की परंपरा को उन्होंने जो ऊंचाई दी, वह अमर है। उनका असली नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था।

बनारस घराने की जड़ें और संगीत की साधना

पंडित लच्छू महाराज का पालन-पोषण बनारस घराने की समृद्ध संगीत परंपरा में हुआ। बचपन से ही तबले के प्रति गहरा अनुराग रखने वाले लच्छू महाराज ने अपने पिता वासुदेव महाराज और चाचा पंडित बिंदादीन महाराज से तबला वादन की बारीकियां सीखीं। गुरु-शिष्य परंपरा के इस कठोर अनुशासन और निरंतर साधना ने उन्हें घराने का प्रमुख स्तंभ बना दिया।

उनकी वादन शैली में लय की शुद्धता, भाव की गहराई और बनारस घराने की विशिष्ट ठेका-परंपरा का अनूठा संगम था। यही कारण था कि शास्त्रीय मंचों पर उनकी उपस्थिति मात्र से माहौल बदल जाता था।

फिल्मी संगीत में अमिट छाप

लच्छू महाराज ने 1949 में फिल्म 'महल' से बॉलीवुड में कदम रखा। इसके बाद 'मुगल-ए-आजम' (1960), 'पाकीजा' (1972) और 'छोटी-छोटी बातें' (1965) जैसी कालजयी फिल्मों में उनकी तबले की थाप ने धुनों में जान फूंक दी। इन फिल्मों का संगीत आज भी उतना ही ताज़ा लगता है, जितना उस दौर में था — और इसका एक बड़ा श्रेय लच्छू महाराज की तबला वादन कला को जाता है।

हालांकि फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में भी उन्होंने खुद को कभी 'फिल्मी कलाकार' नहीं माना। उनका मानना था कि संगीत आत्मा की आवाज़ है, मनोरंजन का महज़ एक साधन नहीं। इस दर्शन ने उनकी कला को एक अलग आयाम दिया।

पद्मश्री का अस्वीकार — एक अनूठा निर्णय

1972 में पंडित लच्छू महाराज को पद्मश्री पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि श्रोताओं की तालियां और उनका प्यार ही उनके लिए सर्वोच्च सम्मान है। यह निर्णय उनके उस स्वाभिमान और कला के प्रति निष्ठा का प्रतीक था, जो उन्हें अपने समकालीनों से अलग करता था।

गौरतलब है कि राजकीय पुरस्कार ठुकराने वाले कलाकार भारतीय संगीत इतिहास में विरले ही मिलते हैं — लच्छू महाराज का यह कदम उनकी बेबाक शख्सियत का आईना है।

परिवार और व्यक्तिगत जीवन

पंडित लच्छू महाराज का परिवार भी कला और फिल्म जगत से गहरे जुड़ा था। उनकी बहन निर्मला देवी अभिनेता गोविंदा की माँ थीं। उन्होंने फ्रांस की महिला टीना से विवाह किया और उनकी एक पुत्री नारायणी हैं।

विरासत और आगे की राह

पंडित लच्छू महाराज ने अपने जीवनकाल में अनेक शिष्यों को तबला वादन की शिक्षा दी, जिनमें से कई आज संगीत जगत में अपनी पहचान बना चुके हैं। देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर उन्होंने बनारस घराने का परचम लहराया।

27 जुलाई 2016 को हृदयाघात से उनका निधन हो गया। लेकिन जब भी 'पाकीजा' या 'मुगल-ए-आजम' की धुनें बजती हैं, संगीत प्रेमी उनकी थाप को महसूस करते हैं। आज के युवा संगीतकारों के लिए पंडित लच्छू महाराज साधना, समर्पण और कला की शुद्धता का जीवंत प्रतीक बने हुए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

श्रोता तय करते हैं। आज जब शास्त्रीय संगीत को लेकर युवा पीढ़ी की उदासीनता चर्चा में है, लच्छू महाराज का जीवन यह सवाल उठाता है कि क्या हम उन घरानों की विरासत को संस्थागत रूप से संरक्षित कर पा रहे हैं जिन्होंने 'मुगल-ए-आजम' जैसी कृतियों को अमर बनाया।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित लच्छू महाराज कौन थे?
पंडित लच्छू महाराज बनारस घराने के प्रमुख तबला वादक थे, जिनका असली नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था। 16 अक्टूबर 1944 को वाराणसी में जन्मे इस महान कलाकार ने शास्त्रीय मंचों के साथ-साथ 'मुगल-ए-आजम' और 'पाकीजा' जैसी फिल्मों में भी तबला वादन किया।
लच्छू महाराज ने पद्मश्री क्यों अस्वीकार किया?
1972 में पद्मश्री के लिए नामांकित होने के बावजूद लच्छू महाराज ने इसे स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि श्रोताओं की तालियां और प्यार ही उनके लिए सर्वोच्च सम्मान है — सरकारी पुरस्कार नहीं।
लच्छू महाराज का गोविंदा से क्या संबंध था?
पंडित लच्छू महाराज की बहन निर्मला देवी बॉलीवुड अभिनेता गोविंदा की माँ थीं। इस प्रकार लच्छू महाराज गोविंदा के मामा थे।
लच्छू महाराज ने किन प्रमुख फिल्मों में तबला वादन किया?
उन्होंने 1949 में 'महल' से फिल्मी सफर शुरू किया और 'मुगल-ए-आजम' (1960), 'छोटी-छोटी बातें' (1965) तथा 'पाकीजा' (1972) जैसी कालजयी फिल्मों में तबला वादन किया। इन फिल्मों का संगीत आज भी उनकी थाप के कारण विशेष माना जाता है।
पंडित लच्छू महाराज का निधन कब और कैसे हुआ?
27 जुलाई 2016 को हृदयाघात के कारण पंडित लच्छू महाराज का निधन हो गया। वे 71 वर्ष के थे और अपने पीछे बनारस घराने की एक समृद्ध विरासत और अनेक प्रशिक्षित शिष्य छोड़ गए।
राष्ट्र प्रेस
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