27 अगस्त 2026
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वन नेशन, वन इलेक्शन: JPC चेयरमैन पीपी चौधरी बोले — बार-बार चुनाव से सरकारी स्कूलों की पढ़ाई बाधित, 85% शिक्षक ड्यूटी पर

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वन नेशन, वन इलेक्शन: JPC चेयरमैन पीपी चौधरी बोले — बार-बार चुनाव से सरकारी स्कूलों की पढ़ाई बाधित, 85% शिक्षक ड्यूटी पर

सारांश

JPC चेयरमैन पीपी चौधरी का तर्क सिर्फ राजनीतिक नहीं — उन्होंने बार-बार चुनावों की एक अनदेखी सामाजिक कीमत उजागर की: गुजरात में 85% शिक्षक चुनाव ड्यूटी पर, सरकारी स्कूलों में पढ़ाई ठप। साथ ही संवैधानिक ढाँचे पर सर्वोच्च न्यायालय के छह पूर्व न्यायाधीशों की मुहर।

मुख्य बातें

JPC चेयरमैन पीपी चौधरी ने 27 अगस्त को वन नेशन, वन इलेक्शन के पक्ष में कई तर्क रखे।
अविश्वास प्रस्ताव से सरकार गिरने पर मध्यावधि चुनाव केवल बचे हुए कार्यकाल के लिए होंगे, पूरे पाँच साल के लिए नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय के 6 पूर्व न्यायाधीशों और दिल्ली उच्च न्यायालय के 3 पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने माना कि एक साथ चुनाव से संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन नहीं होता।
गुजरात में करीब 3 लाख शिक्षकों में से लगभग 85% को चुनाव ड्यूटी पर लगाया गया — सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बाधित।
एक साथ चुनाव होने पर राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार फ्रीबीज घोषणाओं की गुंजाइश सीमित होगी — चुनाव आयोग (ECI) से भी चर्चा हुई।
संविधान के अनुच्छेद 174(2) के तहत मुख्यमंत्री राज्यपाल को विधानसभा भंग कर लोकसभा के साथ चुनाव कराने की सिफारिश कर सकते हैं।

जोधपुर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद और 'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के चेयरमैन पीपी चौधरी ने 27 अगस्त को एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था के पक्ष में कई महत्वपूर्ण तर्क रखे। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों से सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और यह एक बड़ी सामाजिक कीमत है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

मध्यावधि चुनाव और सरकार गिरने की स्थिति

पीपी चौधरी ने स्पष्ट किया कि यदि अविश्वास प्रस्ताव के कारण कोई सरकार गिर जाती है और नई सरकार नहीं बन पाती, तो मध्यावधि चुनाव कराए जा सकते हैं। हालाँकि, ऐसे चुनाव पूरे पाँच वर्ष के लिए नहीं, बल्कि केवल बचे हुए कार्यकाल के लिए होंगे। उन्होंने कहा कि संसद या विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव पर एक साथ चर्चा हो सकती है — यदि अविश्वास प्रस्ताव सफल होता है और दूसरी सरकार बन जाती है, तो नए चुनाव की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

चौधरी के अनुसार, इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य सरकार गिरने के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट को सदन के भीतर ही सुलझाना है, न कि हर बार चुनाव का सहारा लेना।

संवैधानिक प्रावधान और राज्यों की स्वायत्तता

पीपी चौधरी ने संविधान के अनुच्छेद 174(2) का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई मुख्यमंत्री बहुमत में रहते हुए भी विधानसभा को समय से पहले भंग कराना चाहता है, तो वह राज्यपाल को इसकी सिफारिश कर सकता है। राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों के तहत विधानसभा भंग कर सकते हैं और उस राज्य में लोकसभा के साथ चुनाव कराया जा सकता है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि JPC किसी राज्य सरकार की संवैधानिक शक्तियों को सीमित नहीं कर रही है और यह निर्णय पूरी तरह राज्यों के विवेक पर निर्भर करता है।

कानून विशेषज्ञों और पूर्व न्यायाधीशों की राय

चौधरी ने बताया कि समिति में छह著名 कानून विशेषज्ञ शामिल हैं। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय के छह पूर्व न्यायाधीशों और दिल्ली उच्च न्यायालय के तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने समिति के समक्ष अपनी राय रखी है। इन विशेषज्ञों का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से संविधान के मूल ढाँचे या संघीय ढाँचे का उल्लंघन नहीं होता। उनके अनुसार, यह व्यवस्था चुनाव प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र और निष्पक्ष बना सकती है।

फ्रीबीज पर अंकुश और चुनाव आयोग से चर्चा

चौधरी ने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों के कारण राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार मुफ्त उपहारों यानी 'फ्रीबीज' की घोषणा करने की प्रवृत्ति बढ़ती है। एक साथ चुनाव होने पर इस तरह की घोषणाओं की गुंजाइश सीमित हो सकती है। JPC ने इस विषय पर चुनाव आयोग (ECI) से भी विस्तृत चर्चा की है।

सरकारी स्कूलों की शिक्षा पर असर

सबसे चर्चित तर्क के रूप में पीपी चौधरी ने सरकारी स्कूलों पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा, विधानसभा, नगर पालिका और पंचायत चुनावों के दौरान स्कूलों और कॉलेजों की इमारतों को मतदान केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और बड़ी संख्या में शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी पर तैनात किया जाता है।

चौधरी ने गुजरात का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहाँ करीब 3 लाख शिक्षकों में से लगभग 85 प्रतिशत शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी में लगाया गया था। उनके अनुसार, शिक्षकों की लंबे समय तक गैर-मौजूदगी से सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बाधित होती है, जिसके चलते अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं और सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या घट रही है।

यह ऐसे समय में आया है जब देश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की माँग लगातार उठ रही है। वन नेशन, वन इलेक्शन पर JPC की रिपोर्ट संसद में पेश होने के बाद इस पर व्यापक राजनीतिक बहस अपेक्षित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और इसे बिना जाँचे स्वीकार करना पत्रकारिता की चूक होगी। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि JPC के समक्ष केवल उन विशेषज्ञों की राय सार्वजनिक की जा रही है जो एक साथ चुनाव के पक्ष में हैं — विपक्षी दलों और संघवाद के पैरोकारों की आपत्तियाँ अभी भी हाशिये पर हैं। संसदीय लोकतंत्र में 'बचे हुए कार्यकाल' वाला चुनाव-मॉडल व्यवहार में कितना जटिल होगा, यह अभी अनुत्तरित है।
RashtraPress
27 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वन नेशन, वन इलेक्शन क्या है और JPC की भूमिका क्या है?
वन नेशन, वन इलेक्शन का अर्थ है लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना। इस प्रस्ताव की समीक्षा के लिए संसद ने एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) गठित की है, जिसके चेयरमैन BJP सांसद पीपी चौधरी हैं।
यदि सरकार अविश्वास प्रस्ताव से गिर जाए तो क्या होगा?
JPC चेयरमैन पीपी चौधरी के अनुसार, ऐसी स्थिति में सदन के भीतर नई सरकार बनाने का प्रयास पहले होगा। यदि नई सरकार नहीं बन पाती, तो मध्यावधि चुनाव कराए जा सकते हैं — लेकिन ये चुनाव केवल बचे हुए कार्यकाल के लिए होंगे, पूरे पाँच साल के लिए नहीं।
क्या एक साथ चुनाव कराना संवैधानिक रूप से वैध है?
JPC के समक्ष सर्वोच्च न्यायालय के छह पूर्व न्यायाधीशों और दिल्ली उच्च न्यायालय के तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने राय दी है कि एक साथ चुनाव से संविधान के मूल ढाँचे या संघीय ढाँचे का उल्लंघन नहीं होता। संविधान के अनुच्छेद 174(2) के तहत राज्यपाल विधानसभा भंग कर सकते हैं।
बार-बार चुनाव से सरकारी स्कूलों की पढ़ाई कैसे प्रभावित होती है?
पीपी चौधरी के अनुसार, चुनावों के दौरान स्कूल भवनों को मतदान केंद्र बनाया जाता है और शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी पर तैनात किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि गुजरात में करीब 3 लाख शिक्षकों में से लगभग 85 प्रतिशत को चुनाव ड्यूटी में लगाया गया था, जिससे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बाधित हुई।
क्या राज्य सरकारें अपनी विधानसभा को लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ सकती हैं?
हाँ, पीपी चौधरी के अनुसार संविधान के प्रावधानों के तहत कोई मुख्यमंत्री राज्यपाल को विधानसभा भंग कर लोकसभा के साथ चुनाव कराने की सिफारिश कर सकता है। JPC किसी राज्य की इस संवैधानिक शक्ति को सीमित नहीं कर रही है।
राष्ट्र प्रेस
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