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'एक देश-एक चुनाव' से लोकतंत्र होगा मजबूत, संविधान के मूल ढांचे को कोई खतरा नहीं: जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी

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'एक देश-एक चुनाव' से लोकतंत्र होगा मजबूत, संविधान के मूल ढांचे को कोई खतरा नहीं: जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी

सारांश

'एक देश-एक चुनाव' पर जेपीसी की लखनऊ बैठक सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी — यह संवैधानिक और राजनीतिक वैधता की तलाश थी। ₹7 लाख करोड़ की संभावित बचत और 2029 से चरणबद्ध क्रियान्वयन की रूपरेखा के साथ, यह प्रस्ताव भारत की चुनावी व्यवस्था का सबसे बड़ा पुनर्गठन साबित हो सकता है।

मुख्य बातें

जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी ने 15 जुलाई 2026 को लखनऊ में कहा कि 'एक देश-एक चुनाव' संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध नहीं है।
इस व्यवस्था से देश को लगभग ₹7 लाख करोड़ तक का आर्थिक लाभ हो सकता है।
1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे; आपातकाल के बाद यह क्रम टूटा।
1983 से 2023 तक पाँच प्रमुख संस्थाओं — निर्वाचन आयोग, नीति आयोग और कोविंद समिति सहित — ने एक साथ चुनाव की सिफारिश की है।
विधेयक पारित होने पर 2029 से चरणबद्ध क्रियान्वयन संभव; 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' जैसे स्थिरता प्रावधानों पर विचार जारी।
बैठक में लखनऊ विश्वविद्यालय , BHU , IIM और इलाहाबाद विश्वविद्यालय सहित सात प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञों ने सुझाव दिए।

संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष एवं सांसद पीपी चौधरी ने 15 जुलाई 2026 को लखनऊ में स्पष्ट किया कि 'एक देश-एक चुनाव' की प्रस्तावित व्यवस्था संविधान के मूल ढांचे अथवा संघीय व्यवस्था के विरुद्ध नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने का माध्यम है। 'एक देश-एक चुनाव' से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों पर विचार कर रही जेपीसी की तीन दिवसीय बैठक बुधवार को लखनऊ में संपन्न हुई।

बैठक में क्या हुआ

बैठक के समापन पर आयोजित प्रेसवार्ता में पीपी चौधरी ने बताया कि 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे। 1968 में कुछ राज्यों में राष्ट्रपति शासन और राज्यों के पुनर्गठन के कारण यह चुनावी चक्र टूट गया। इसके बाद आपातकाल के दौरान लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाए जाने से दोनों चुनावों की समानांतर प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त हो गई।

ऐतिहासिक सिफारिशें और संस्थागत समर्थन

चौधरी ने बताया कि एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश कोई नई नहीं है। 1983 में निर्वाचन आयोग, 2002 की एक संसदीय समिति, 2015 की संसदीय समिति, 2018 में नीति आयोग और 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति — सभी ने इस व्यवस्था का समर्थन किया है। यह तथ्य इस प्रस्ताव की दीर्घकालिक संस्थागत स्वीकार्यता को रेखांकित करता है।

आर्थिक और प्रशासनिक लाभ

जेपीसी अध्यक्ष के अनुसार, इस व्यवस्था से देश की अर्थव्यवस्था को लगभग ₹7 लाख करोड़ तक का लाभ हो सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि बार-बार चुनाव होने से प्रशासनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है, विकास कार्य बाधित होते हैं और बड़ी संख्या में श्रमिकों के गृह राज्यों में लौटने के कारण औद्योगिक गतिविधियाँ भी प्रभावित होती हैं।

2029 से चरणबद्ध क्रियान्वयन की योजना

चौधरी ने बताया कि यदि संसद से संबंधित विधेयक पारित हो जाता है, तो 2029 से चरणबद्ध तरीके से कई राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराए जा सकते हैं। सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' (कंस्ट्रक्टिव वोट ऑफ कॉन्फिडेंस) जैसे प्रावधानों पर भी विचार किया जा रहा है।

विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से संवाद

तीन दिवसीय बैठक के अंतिम दिन समिति ने डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपतियों, निदेशकों, विधि एवं राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से विस्तृत चर्चा की। केंद्र-राज्य संबंध, मध्यावधि चुनाव, शेष कार्यकाल, निर्वाचन आयोग की भूमिका और प्रस्तावित संवैधानिक संशोधनों के कानूनी पहलुओं पर गहन विमर्श हुआ। कुछ विशेषज्ञों को बाद में लिखित सुझाव देने की अनुमति भी दी गई। समिति ने पद्म पुरस्कार विजेताओं, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और मीडिया जगत के सदस्यों से भी संवाद किया। प्राप्त सभी सुझावों के आधार पर समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि विशेषज्ञों की राय केवल रिकॉर्ड के लिए ली जा रही है या वास्तव में विधेयक के मसौदे में परिलक्षित होगी। ₹7 लाख करोड़ की बचत का आँकड़ा आकर्षक है, परंतु इसका कोई स्वतंत्र सत्यापन सार्वजनिक नहीं हुआ है। सबसे जटिल प्रश्न — मध्यावधि चुनाव की स्थिति में शेष कार्यकाल का क्या होगा — अभी भी अनुत्तरित है, और 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' का प्रावधान संसदीय लोकतंत्र की जवाबदेही की परंपरा को किस हद तक प्रभावित करेगा, यह गहन बहस का विषय बना रहेगा।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'एक देश-एक चुनाव' क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
'एक देश-एक चुनाव' का अर्थ है लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना। इसका उद्देश्य बार-बार होने वाले चुनावों से प्रशासनिक व आर्थिक बोझ कम करना और विकास कार्यों की निरंतरता सुनिश्चित करना है।
जेपीसी की लखनऊ बैठक में क्या निष्कर्ष निकला?
जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी ने 15 जुलाई 2026 को स्पष्ट किया कि 'एक देश-एक चुनाव' संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध नहीं है। समिति ने सात प्रमुख विश्वविद्यालयों और संस्थानों के विशेषज्ञों से सुझाव लिए और प्राप्त अभिमतों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी।
'एक देश-एक चुनाव' कब से लागू हो सकता है?
जेपीसी अध्यक्ष के अनुसार, यदि संसद से संबंधित विधेयक पारित हो जाता है तो 2029 से चरणबद्ध तरीके से कई राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराए जा सकते हैं। यह क्रियान्वयन एकसाथ नहीं, बल्कि चरणों में होगा।
क्या 'एक देश-एक चुनाव' से सरकारी स्थिरता खतरे में पड़ेगी?
इस चिंता को दूर करने के लिए 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' (कंस्ट्रक्टिव वोट ऑफ कॉन्फिडेंस) जैसे प्रावधानों पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत सरकार को तभी हटाया जा सकेगा जब विकल्प के रूप में नई सरकार का बहुमत भी साबित हो।
पहले किन संस्थाओं ने एक साथ चुनाव की सिफारिश की है?
1983 में निर्वाचन आयोग, 2002 और 2015 की संसदीय समितियों, 2018 में नीति आयोग और 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति — इन पाँच प्रमुख संस्थाओं ने एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश की है।
राष्ट्र प्रेस
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