15 जुलाई 2026
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दिल्ली हाईकोर्ट ने चार भारतीय मिशनों की पासपोर्ट-वीजा सेवाओं का टेंडर रद्द किया, एक महीने में नया RFP जारी करने का आदेश

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दिल्ली हाईकोर्ट ने चार भारतीय मिशनों की पासपोर्ट-वीजा सेवाओं का टेंडर रद्द किया, एक महीने में नया RFP जारी करने का आदेश

सारांश

दिल्ली हाईकोर्ट ने चार देशों के भारतीय मिशनों में पासपोर्ट-वीजा सेवाओं की आउटसोर्सिंग का टेंडर मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने विदेश मंत्रालय को एक महीने में नया RFP जारी करने का आदेश दिया है — सरकारी टेंडर पारदर्शिता पर यह एक कड़ा न्यायिक संदेश है।

मुख्य बातें

दिल्ली हाईकोर्ट ने 15 जुलाई 2026 को अबू धाबी, कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा स्थित भारतीय मिशनों की सीपीवी सेवाओं का तकनीकी मूल्यांकन रद्द किया।
अदालत ने पाया कि मूल्यांकन मनमाना, अतार्किक और अपारदर्शी था — संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन।
समान प्रस्तावों को अलग-अलग मिशनों में अलग-अलग अंक दिए गए, बिना किसी दर्ज कारण के।
विदेश मंत्रालय को एक महीने के भीतर नया RFP जारी करने और शीघ्र नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश।
नई प्रक्रिया पूरी होने तक वर्तमान सेवा प्रदाता कार्यरत रहेंगे ताकि नागरिक सेवाएँ बाधित न हों।
GFR 2017 और निष्पक्ष प्रशासन के सिद्धांतों का उल्लंघन भी अदालत ने दर्ज किया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 15 जुलाई 2026 को विदेश मंत्रालय द्वारा अबू धाबी (यूएई), कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) स्थित भारतीय मिशनों में कांसुलर, पासपोर्ट और वीजा (सीपीवी) सेवाओं की आउटसोर्सिंग के लिए अपनाई गई तकनीकी मूल्यांकन प्रक्रिया को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि बोलीदाताओं का मूल्यांकन मनमाने, अतार्किक और अपारदर्शी तरीके से किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन है।

मामले की पृष्ठभूमि

न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति शैल जैन की खंडपीठ ने यह फैसला ई ट्रैव टेक लिमिटेड और वेरासिस लिमिटेड की याचिकाओं पर सुनाया। दोनों कंपनियों को तकनीकी बोली के चरण में अयोग्य घोषित कर दिया गया था, जिसे उन्होंने अदालत में चुनौती दी। यह ऐसे समय में आया है जब सरकारी टेंडर प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर देशभर में बहस तेज है।

अदालत की मुख्य आपत्तियाँ

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि मूल्यांकन पत्रकों में न तो याचिकाकर्ताओं के प्रस्तावों की कमियाँ दर्ज हैं और न ही यह स्पष्ट किया गया कि प्रतिस्पर्धी कंपनियों की तुलना में उन्हें कम अंक क्यों दिए गए। अदालत ने यह भी नोट किया कि अलग-अलग भारतीय मिशनों में लगभग समान प्रस्तावों और दस्तावेजों को अलग-अलग अंक दिए गए, जबकि इसका कोई कारण रिकॉर्ड में दर्ज नहीं था।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सरकार ने पैरामीटर-वार अंक तो उपलब्ध कराए, लेकिन यह नहीं बताया कि अंक किस आधार पर दिए गए या किन कारणों से काटे गए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मौखिक दलीलें लिखित कारणों का विकल्प नहीं हो सकतीं — यदि मूल्यांकन का आधार मौखिक प्रस्तुति थी, तो उसकी वजहें रिकॉर्ड में अनिवार्य रूप से दर्ज होनी चाहिए थीं।

संवैधानिक और नियामक उल्लंघन

अदालत ने कहा कि मूल्यांकन प्रक्रिया में कारण दर्ज न करना सामान्य वित्तीय नियम (GFR), 2017, टेंडर की शर्तों और निष्पक्ष प्रशासन के स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन है। खंडपीठ ने यह भी रेखांकित किया कि सामान्यतः न्यायालय विशेषज्ञ समितियों के तकनीकी मूल्यांकन में हस्तक्षेप नहीं करता, परंतु जब निर्णय प्रक्रिया निष्पक्षता, पारदर्शिता और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत हो, तब न्यायिक समीक्षा अपरिहार्य हो जाती है।

सरकार की दलील और अदालत का जवाब

केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि यह मामला पहले ही तय हो चुका है और दोबारा सुनवाई संभव नहीं। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि पैरामीटर-वार अंक सामने आने के बाद एक नया कारण उत्पन्न हुआ, इसलिए याचिकाएँ पूरी तरह सुनवाई योग्य हैं।

आगे क्या होगा

दिल्ली हाईकोर्ट ने तकनीकी मूल्यांकन रद्द करने के साथ-साथ सफल निजी कंपनियों को दिए गए ठेके भी निरस्त कर दिए। विदेश मंत्रालय और संबंधित भारतीय मिशनों को एक महीने के भीतर नए सिरे से रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी करने और जल्द से जल्द नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नई निविदा प्रक्रिया पूरी होने तक वर्तमान सेवा प्रदाता कार्यरत रहेंगे, ताकि पासपोर्ट, वीजा और कांसुलर सेवाओं में आम नागरिकों को किसी तरह का व्यवधान न हो।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो पारदर्शिता महज एक औपचारिकता बन जाती है। यह पहली बार नहीं है कि सरकारी टेंडर में मनमाने मूल्यांकन पर अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा हो — GFR 2017 के बावजूद 'कारण दर्ज करने' की अनिवार्यता को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। असली सवाल यह है कि क्या विदेश मंत्रालय नई RFP में मूल्यांकन ढाँचे को वस्तुनिष्ठ और दस्तावेज़ीकृत बनाएगा, या फिर वही प्रक्रियागत खामियाँ दोहराई जाएँगी जिन्होंने इस बार अदालत तक का रास्ता दिखाया।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली हाईकोर्ट ने पासपोर्ट-वीजा सेवाओं का टेंडर क्यों रद्द किया?
अदालत ने पाया कि बोलीदाताओं का तकनीकी मूल्यांकन मनमाने, अतार्किक और अपारदर्शी तरीके से किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। मूल्यांकन पत्रकों में न कमियाँ दर्ज थीं और न ही कम अंक देने के कारण — जो GFR 2017 और निष्पक्ष प्रशासन के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
किन भारतीय मिशनों की सेवाओं पर यह फैसला लागू होता है?
यह फैसला अबू धाबी (यूएई), कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) स्थित भारतीय मिशनों में कांसुलर, पासपोर्ट और वीजा (सीपीवी) सेवाओं की आउटसोर्सिंग से जुड़े टेंडर पर लागू होता है।
इस मामले में याचिका किसने दायर की थी?
ई ट्रैव टेक लिमिटेड और वेरासिस लिमिटेड ने याचिकाएँ दायर की थीं। दोनों कंपनियों को तकनीकी बोली के चरण में अयोग्य घोषित किया गया था, जिसे उन्होंने न्यायालय में चुनौती दी।
अब पासपोर्ट और वीजा सेवाएँ प्रभावित होंगी क्या?
नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नई टेंडर प्रक्रिया पूरी होने तक वर्तमान सेवा प्रदाता काम जारी रखेंगे, ताकि नागरिकों को किसी तरह का व्यवधान न हो।
विदेश मंत्रालय को अब क्या करना होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेश मंत्रालय और संबंधित भारतीय मिशनों को एक महीने के भीतर नया रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी करने और जल्द से जल्द नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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