प्रयागराज संगम पर 'झंडा पहचान' परंपरा: सदियों बाद भी यजमान ढूंढते हैं अपने पंडे को
सारांश
मुख्य बातें
पितृ पक्ष के दौरान प्रयागराज के पवित्र त्रिवेणी संगम पर देश के हर कोने से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध करने उमड़ रहे हैं। इस भीड़ में भी यजमान बिना भटके अपने पारंपरिक पुरोहित तक पहुँच जाते हैं — और यह संभव होता है सदियों पुरानी 'झंडा पहचान' परंपरा के बल पर, जो आज के डिजिटल युग में भी उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है।
झंडा पहचान परंपरा क्या है
प्रयागराज के संगम तट पर तीर्थ-पुरोहितों (पंडों) की पहचान उनके वंश, क्षेत्र और जाति के अनुसार तय किए गए विशेष झंडों और प्रतीक चिह्नों से होती है। ये प्रतीक घोड़ा, हाथी, ऊंट, कटार, तबलिया, मछली या अन्य धार्मिक चिह्न हो सकते हैं। प्रत्येक पुरोहित परिवार का एक निश्चित निशान होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपरिवर्तित चला आ रहा है।
संगम तट पर पंडे के तख्त या बैठने के स्थान पर यही झंडा लहराता रहता है। यजमान इसी झंडे को देखकर अपने परिवार के पारंपरिक पुरोहित तक सीधे पहुँच जाते हैं। गौरतलब है कि यह व्यवस्था सैकड़ों वर्ष पहले स्थापित हुई थी, जब पढ़ना-लिखना सर्वसुलभ नहीं था और दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं के लिए एक दृश्य पहचान ही एकमात्र सहारा होती थी।
पीढ़ियों पुराने बही-खाते: सात पुश्तों का लेखा
इन पंडों की एक और अनूठी विशेषता उनके पास सुरक्षित पीढ़ियों पुराने बही-खाते हैं। इन दस्तावेज़ों में यजमानों के पूर्वजों की सात पीढ़ियों तक का इतिहास और पिंडदान का पूरा विवरण दर्ज होता है। यही कारण है कि जब कोई यजमान पहली बार या वर्षों बाद संगम पहुँचता है, तो पंडा उसके परिवार की पूरी श्राद्ध-परंपरा का लेखा-जोखा सामने रख देता है।
यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब संयुक्त परिवारों के बिखरने और पुरानी पीढ़ियों के गुज़र जाने के बाद यजमानों के पास अपने पूर्वजों की जानकारी का कोई अन्य स्रोत नहीं बचता।
तीर्थ पुरोहित की ज़ुबानी
तीर्थ पुरोहित प्रदीप पांडेय ने बताया, 'संगम क्षेत्र में तीर्थ पुरोहितों का निशान झंडा होता है। पंडा का झंडा ही निशान होता है और यजमान झंडे के निशान को देखकर आते हैं। झंडे से ही पंडों की पहचान होती है। तीर्थ पुरोहित यजमान के सात पीढ़ियों का विवरण भी दिखाते हैं। पहले जब हमारे पूर्वज यजमानों के घर जाते थे तो हमेशा झंडे के बारे में बताया जाता था। हमारे यहाँ की पहचान 'राम सहाय पंडा केसरिया झंडा' है।'
यजमानों की राय: भीड़ में भी नहीं होता भटकाव
पिंडदान करने आए दीपक ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, 'झंडे की वजह से तीर्थ पुरोहितों की तलाश करने में आसानी होती है। निशान नहीं होने पर किससे बात की जाए, यह बड़ी समस्या होती है।'
यह टिप्पणी इस परंपरा की व्यावहारिक उपयोगिता को रेखांकित करती है। पितृ पक्ष जैसे अवसरों पर जब संगम तट पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं, तब यह सरल किंतु प्रभावशाली व्यवस्था अव्यवस्था को रोकती है।
आधुनिक दौर में परंपरा की प्रासंगिकता
डिजिटल युग में जब अधिकांश सेवाएँ ऐप और QR कोड पर निर्भर हो चुकी हैं, यह 'झंडा पहचान' व्यवस्था अपनी मौलिकता में अनूठी है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत उदाहरण भी है — जो पीढ़ियों को आपस में जोड़ती है। आने वाले वर्षों में इस विरासत को दस्तावेज़ीकृत और संरक्षित करने की आवश्यकता और भी बढ़ती जाएगी।