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प्रयागराज संगम पर 'झंडा पहचान' परंपरा: सदियों बाद भी यजमान ढूंढते हैं अपने पंडे को

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प्रयागराज संगम पर 'झंडा पहचान' परंपरा: सदियों बाद भी यजमान ढूंढते हैं अपने पंडे को

सारांश

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर पितृ पक्ष में लाखों यजमान सदियों पुरानी 'झंडा पहचान' परंपरा के सहारे भीड़ में भी अपने पारंपरिक पुरोहित को ढूंढ लेते हैं। घोड़ा, हाथी, केसरिया झंडा — हर पंडे का अपना निशान, और उसके पास सात पीढ़ियों का बही-खाता। यह परंपरा डिजिटल युग में भी अटूट है।

मुख्य बातें

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर पितृ पक्ष के दौरान देशभर से श्रद्धालु पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध के लिए पहुँचते हैं।
तीर्थ पुरोहित (पंडे) अपने वंश और क्षेत्र के अनुसार विशेष झंडों और प्रतीक चिह्नों — जैसे घोड़ा, हाथी, ऊंट, कटार, मछली — से पहचाने जाते हैं।
पंडों के पास सात पीढ़ियों तक के यजमानों का पिंडदान-विवरण दर्ज पीढ़ियों पुराने बही-खाते सुरक्षित हैं।
तीर्थ पुरोहित प्रदीप पांडेय के अनुसार उनके परिवार की पहचान 'राम सहाय पंडा केसरिया झंडा' है।
डिजिटल दौर में भी यह परंपरा पूरी तरह जीवित है और यजमानों के लिए भीड़ में पुरोहित ढूंढने का सबसे विश्वसनीय माध्यम बनी हुई है।

पितृ पक्ष के दौरान प्रयागराज के पवित्र त्रिवेणी संगम पर देश के हर कोने से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध करने उमड़ रहे हैं। इस भीड़ में भी यजमान बिना भटके अपने पारंपरिक पुरोहित तक पहुँच जाते हैं — और यह संभव होता है सदियों पुरानी 'झंडा पहचान' परंपरा के बल पर, जो आज के डिजिटल युग में भी उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है।

झंडा पहचान परंपरा क्या है

प्रयागराज के संगम तट पर तीर्थ-पुरोहितों (पंडों) की पहचान उनके वंश, क्षेत्र और जाति के अनुसार तय किए गए विशेष झंडों और प्रतीक चिह्नों से होती है। ये प्रतीक घोड़ा, हाथी, ऊंट, कटार, तबलिया, मछली या अन्य धार्मिक चिह्न हो सकते हैं। प्रत्येक पुरोहित परिवार का एक निश्चित निशान होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपरिवर्तित चला आ रहा है।

संगम तट पर पंडे के तख्त या बैठने के स्थान पर यही झंडा लहराता रहता है। यजमान इसी झंडे को देखकर अपने परिवार के पारंपरिक पुरोहित तक सीधे पहुँच जाते हैं। गौरतलब है कि यह व्यवस्था सैकड़ों वर्ष पहले स्थापित हुई थी, जब पढ़ना-लिखना सर्वसुलभ नहीं था और दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं के लिए एक दृश्य पहचान ही एकमात्र सहारा होती थी।

पीढ़ियों पुराने बही-खाते: सात पुश्तों का लेखा

इन पंडों की एक और अनूठी विशेषता उनके पास सुरक्षित पीढ़ियों पुराने बही-खाते हैं। इन दस्तावेज़ों में यजमानों के पूर्वजों की सात पीढ़ियों तक का इतिहास और पिंडदान का पूरा विवरण दर्ज होता है। यही कारण है कि जब कोई यजमान पहली बार या वर्षों बाद संगम पहुँचता है, तो पंडा उसके परिवार की पूरी श्राद्ध-परंपरा का लेखा-जोखा सामने रख देता है।

यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब संयुक्त परिवारों के बिखरने और पुरानी पीढ़ियों के गुज़र जाने के बाद यजमानों के पास अपने पूर्वजों की जानकारी का कोई अन्य स्रोत नहीं बचता।

तीर्थ पुरोहित की ज़ुबानी

तीर्थ पुरोहित प्रदीप पांडेय ने बताया, 'संगम क्षेत्र में तीर्थ पुरोहितों का निशान झंडा होता है। पंडा का झंडा ही निशान होता है और यजमान झंडे के निशान को देखकर आते हैं। झंडे से ही पंडों की पहचान होती है। तीर्थ पुरोहित यजमान के सात पीढ़ियों का विवरण भी दिखाते हैं। पहले जब हमारे पूर्वज यजमानों के घर जाते थे तो हमेशा झंडे के बारे में बताया जाता था। हमारे यहाँ की पहचान 'राम सहाय पंडा केसरिया झंडा' है।'

यजमानों की राय: भीड़ में भी नहीं होता भटकाव

पिंडदान करने आए दीपक ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, 'झंडे की वजह से तीर्थ पुरोहितों की तलाश करने में आसानी होती है। निशान नहीं होने पर किससे बात की जाए, यह बड़ी समस्या होती है।'

यह टिप्पणी इस परंपरा की व्यावहारिक उपयोगिता को रेखांकित करती है। पितृ पक्ष जैसे अवसरों पर जब संगम तट पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं, तब यह सरल किंतु प्रभावशाली व्यवस्था अव्यवस्था को रोकती है।

आधुनिक दौर में परंपरा की प्रासंगिकता

डिजिटल युग में जब अधिकांश सेवाएँ ऐप और QR कोड पर निर्भर हो चुकी हैं, यह 'झंडा पहचान' व्यवस्था अपनी मौलिकता में अनूठी है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत उदाहरण भी है — जो पीढ़ियों को आपस में जोड़ती है। आने वाले वर्षों में इस विरासत को दस्तावेज़ीकृत और संरक्षित करने की आवश्यकता और भी बढ़ती जाएगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सुचिंतित सूचना-प्रबंधन प्रणाली है जो सैकड़ों वर्षों से बिना किसी तकनीकी सहारे के लाखों श्रद्धालुओं को सही पुरोहित तक पहुँचाती रही है। विचारणीय यह है कि जब सरकारें और स्टार्टअप भीड़-प्रबंधन के लिए करोड़ों खर्च करते हैं, तब यह परंपरागत व्यवस्था शून्य लागत पर वही काम कर रही है। हालाँकि, पीढ़ियों पुराने इन बही-खातों का कोई केंद्रीकृत डिजिटल संरक्षण नहीं है — यदि किसी पुरोहित परिवार की वंश-परंपरा टूटी, तो उस क्षेत्र के यजमानों का सात पीढ़ियों का इतिहास हमेशा के लिए खो सकता है। यह अमूर्त सांस्कृतिक विरासत दस्तावेज़ीकरण की प्रतीक्षा में है।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रयागराज संगम पर 'झंडा पहचान' परंपरा क्या है?
यह सदियों पुरानी व्यवस्था है जिसमें त्रिवेणी संगम तट पर तीर्थ पुरोहितों (पंडों) की पहचान उनके वंश और क्षेत्र के अनुसार तय विशेष झंडों और प्रतीक चिह्नों — जैसे घोड़ा, हाथी, ऊंट, कटार या मछली — से होती है। यजमान इन्हीं निशानों को देखकर भीड़ में भी अपने पारंपरिक पुरोहित को आसानी से ढूंढ लेते हैं।
पंडों के बही-खाते में क्या दर्ज होता है?
पंडों के पास पीढ़ियों पुराने बही-खाते होते हैं जिनमें यजमानों के पूर्वजों की सात पीढ़ियों तक का इतिहास और हर बार किए गए पिंडदान का पूरा विवरण लिखा रहता है। यह दस्तावेज़ यजमानों के लिए अपने पारिवारिक इतिहास का एकमात्र अभिलेख बन जाते हैं।
पितृ पक्ष में प्रयागराज संगम पर कौन-कौन से अनुष्ठान होते हैं?
पितृ पक्ष के दौरान प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर देशभर से श्रद्धालु पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध के लिए आते हैं। इन अनुष्ठानों का उद्देश्य पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष-प्राप्ति माना जाता है।
डिजिटल युग में यह परंपरा कितनी प्रासंगिक है?
आधुनिक तकनीक के बावजूद यह परंपरा पूरी तरह जीवित है। पिंडदान करने आए यजमान दीपक के अनुसार, 'झंडे की वजह से तीर्थ पुरोहितों की तलाश में आसानी होती है — निशान नहीं होने पर किससे बात की जाए, यह बड़ी समस्या होती।' लाखों की भीड़ में यह दृश्य-पहचान व्यवस्था किसी ऐप से कम उपयोगी नहीं।
प्रयागराज के पंडे क्षेत्र के अनुसार किस आधार पर बंटे हैं?
प्रयागराज के तीर्थ पुरोहित सैकड़ों वर्षों से क्षेत्रों, जिलों और जातियों के आधार पर विभाजित हैं और हर पुरोहित परिवार का एक निश्चित प्रतीक चिह्न होता है। तीर्थ पुरोहित प्रदीप पांडेय के उदाहरण से यह स्पष्ट है कि उनके परिवार की पहचान 'राम सहाय पंडा केसरिया झंडा' के रूप में है।
राष्ट्र प्रेस
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