पितृपक्ष 2026: प्रयागराज के पंडा समाज के बही-खाते — 1823 संवत से सुरक्षित लाखों परिवारों की वंशावली
सारांश
मुख्य बातें
प्रयागराज में पितृपक्ष 26 सितंबर 2026 से शुरू हो रहा है और तीर्थ पुरोहित (पंडा) समाज अभी से अपने सदियों पुराने बही-खातों को संरक्षित करने और अद्यतन करने में जुट गया है। इन हस्तलिखित रजिस्टरों में देशभर के लाखों परिवारों की पीढ़ियों की वंशावली दर्ज है, जो डिजिटल युग में भी श्रद्धालुओं के पूर्वजों की पहचान का सबसे भरोसेमंद स्रोत बनी हुई है।
बही-खाते: सदियों का जीवंत इतिहास
प्रयागराज के तीर्थ पुरोहितों के पास मौजूद ये विशाल हस्तलिखित रजिस्टर देश के कोने-कोने से आने वाले परिवारों का सदियों पुराना रिकॉर्ड संजोए हुए हैं। जब भी कोई श्रद्धालु अपने पितरों के श्राद्ध या तर्पण के लिए यहाँ पहुँचता है, तो पंडा उनके नाम, मूल निवास (गाँव-शहर) और जाति-गोत्र के आधार पर कुछ ही मिनटों में उनके दादा, परदादा या उनसे भी पुराने पूर्वजों के हस्ताक्षर और अनुष्ठानों का पूरा ब्यौरा खोज निकालते हैं।
इन बही-खातों में इस्तेमाल होने वाला विशेष कागज और स्याही दशकों तक खराब नहीं होती। इनकी सुरक्षा के लिए पंडा समाज विशेष दवाओं का प्रयोग करता है और हर महीने इन्हें धूप में सुखाता है, ताकि नमी और कीड़ों से बचाया जा सके।
1823 संवत से चला आ रहा रिकॉर्ड
पंडा राजेश कुमार तिवारी ने बताया, 'पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू हो रहा है। लोग श्राद्ध कार्यक्रम के लिए एक दिन पहले ही प्रयागराज पहुँचने लगते हैं। हम लोग बही यात्रियों के लिए मेंटेन करते हैं। 70 फीसदी लोगों को अपने पूर्वजों का पता नहीं होता है। ऐसे में पुराने रिकॉर्ड को नए वर्जन में तैयार करते हैं। हमारे पास 1823 संवत से लोगों के रिकॉर्ड मौजूद हैं।'
ध्रुव तिवारी के अनुसार, 'दक्षिण राज्यों समेत पूरे भारत के लोग यहाँ अपने पितरों का तर्पण करने के लिए आते हैं। क्षेत्र के अनुसार हम बही-खाते को मेंटेन करते हैं। करीब 300 पुरानी वंशावलियाँ हमारे बही-खाते में हैं। यह रिकॉर्ड तहसील और सरकारी कार्यालयों में नहीं मिलते।'
कानूनी साक्ष्य के रूप में भी मान्यता
ध्रुव तिवारी के अनुसार, इन बही-खातों में कई पीढ़ियों का रिकॉर्ड होने के कारण इन्हें कानूनी तौर पर भी एक पुख्ता पारिवारिक साक्ष्य माना जाता है। पारिवारिक संपत्ति विवादों या वंशावली सिद्ध करने जैसे मामलों में भी ये खाते सहायक सिद्ध होते हैं — यह ऐसा दस्तावेज़ है जो तहसील या सरकारी कार्यालयों के अभिलेखों में नहीं मिलता।
गौरतलब है कि आधुनिक तकनीक और कंप्यूटर के इस युग में भी प्रयागराज के तीर्थ पुरोहित इन पारंपरिक बही-खातों पर सर्वाधिक भरोसा करते हैं, जो डिजिटल अभिलेखीकरण की सीमाओं और इन दस्तावेज़ों की अद्वितीय विश्वसनीयता को रेखांकित करता है।
आम जनता पर असर
देवरिया से आए विजय साहू ने बताया, 'प्रयागराज में पंडों द्वारा पूर्वजों का डेटा उपलब्ध करा दिया जाता है। पूर्वजों के नाम पता चलने के बाद उनका श्राद्ध कर्म करते हैं।' यह उदाहरण बताता है कि बही-खाते केवल धार्मिक परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के लिए सांस्कृतिक पहचान का आधार भी हैं।
यह ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब पितृपक्ष के दौरान देशभर से भारी संख्या में श्रद्धालु प्रयागराज पहुँचते हैं और अपने पितरों की पहचान के लिए इन्हीं बही-खातों पर निर्भर रहते हैं। आने वाले दिनों में संगम तट पर श्राद्ध और तर्पण का सिलसिला शुरू होगा, और पंडा समाज की यह तैयारी लाखों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था को सहारा देगी।