22 सितंबर 2026
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पितृपक्ष 2026: प्रयागराज के पंडा समाज के बही-खाते — 1823 संवत से सुरक्षित लाखों परिवारों की वंशावली

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पितृपक्ष 2026: प्रयागराज के पंडा समाज के बही-खाते — 1823 संवत से सुरक्षित लाखों परिवारों की वंशावली

सारांश

प्रयागराज के पंडा समाज के बही-खाते महज धार्मिक रजिस्टर नहीं — ये लाखों भारतीय परिवारों की जीवंत वंशावली हैं। 1823 संवत से दर्ज इन हस्तलिखित अभिलेखों में वो इतिहास है जो न तहसील में मिलता है, न सरकारी दफ्तरों में — और पितृपक्ष से पहले इन्हें सहेजने की परंपरा हर साल नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ती है।

मुख्य बातें

प्रयागराज में पितृपक्ष 26 सितंबर 2026 से शुरू हो रहा है; पंडा समाज बही-खातों को अद्यतन करने में जुटा है।
बही-खातों में 1823 संवत से लाखों परिवारों की वंशावलियाँ दर्ज हैं — करीब 300 पुरानी वंशावलियाँ उपलब्ध।
पंडा राजेश कुमार तिवारी के अनुसार लगभग 70% श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के नाम ज्ञात नहीं होते।
इन अभिलेखों को कानूनी तौर पर भी वंशावली का पुख्ता साक्ष्य माना जाता है।
विशेष कागज-स्याही और मासिक धूप में सुखाने की प्रक्रिया से इन्हें दशकों तक सुरक्षित रखा जाता है।

प्रयागराज में पितृपक्ष 26 सितंबर 2026 से शुरू हो रहा है और तीर्थ पुरोहित (पंडा) समाज अभी से अपने सदियों पुराने बही-खातों को संरक्षित करने और अद्यतन करने में जुट गया है। इन हस्तलिखित रजिस्टरों में देशभर के लाखों परिवारों की पीढ़ियों की वंशावली दर्ज है, जो डिजिटल युग में भी श्रद्धालुओं के पूर्वजों की पहचान का सबसे भरोसेमंद स्रोत बनी हुई है।

बही-खाते: सदियों का जीवंत इतिहास

प्रयागराज के तीर्थ पुरोहितों के पास मौजूद ये विशाल हस्तलिखित रजिस्टर देश के कोने-कोने से आने वाले परिवारों का सदियों पुराना रिकॉर्ड संजोए हुए हैं। जब भी कोई श्रद्धालु अपने पितरों के श्राद्ध या तर्पण के लिए यहाँ पहुँचता है, तो पंडा उनके नाम, मूल निवास (गाँव-शहर) और जाति-गोत्र के आधार पर कुछ ही मिनटों में उनके दादा, परदादा या उनसे भी पुराने पूर्वजों के हस्ताक्षर और अनुष्ठानों का पूरा ब्यौरा खोज निकालते हैं।

इन बही-खातों में इस्तेमाल होने वाला विशेष कागज और स्याही दशकों तक खराब नहीं होती। इनकी सुरक्षा के लिए पंडा समाज विशेष दवाओं का प्रयोग करता है और हर महीने इन्हें धूप में सुखाता है, ताकि नमी और कीड़ों से बचाया जा सके।

1823 संवत से चला आ रहा रिकॉर्ड

पंडा राजेश कुमार तिवारी ने बताया, 'पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू हो रहा है। लोग श्राद्ध कार्यक्रम के लिए एक दिन पहले ही प्रयागराज पहुँचने लगते हैं। हम लोग बही यात्रियों के लिए मेंटेन करते हैं। 70 फीसदी लोगों को अपने पूर्वजों का पता नहीं होता है। ऐसे में पुराने रिकॉर्ड को नए वर्जन में तैयार करते हैं। हमारे पास 1823 संवत से लोगों के रिकॉर्ड मौजूद हैं।'

ध्रुव तिवारी के अनुसार, 'दक्षिण राज्यों समेत पूरे भारत के लोग यहाँ अपने पितरों का तर्पण करने के लिए आते हैं। क्षेत्र के अनुसार हम बही-खाते को मेंटेन करते हैं। करीब 300 पुरानी वंशावलियाँ हमारे बही-खाते में हैं। यह रिकॉर्ड तहसील और सरकारी कार्यालयों में नहीं मिलते।'

कानूनी साक्ष्य के रूप में भी मान्यता

ध्रुव तिवारी के अनुसार, इन बही-खातों में कई पीढ़ियों का रिकॉर्ड होने के कारण इन्हें कानूनी तौर पर भी एक पुख्ता पारिवारिक साक्ष्य माना जाता है। पारिवारिक संपत्ति विवादों या वंशावली सिद्ध करने जैसे मामलों में भी ये खाते सहायक सिद्ध होते हैं — यह ऐसा दस्तावेज़ है जो तहसील या सरकारी कार्यालयों के अभिलेखों में नहीं मिलता।

गौरतलब है कि आधुनिक तकनीक और कंप्यूटर के इस युग में भी प्रयागराज के तीर्थ पुरोहित इन पारंपरिक बही-खातों पर सर्वाधिक भरोसा करते हैं, जो डिजिटल अभिलेखीकरण की सीमाओं और इन दस्तावेज़ों की अद्वितीय विश्वसनीयता को रेखांकित करता है।

आम जनता पर असर

देवरिया से आए विजय साहू ने बताया, 'प्रयागराज में पंडों द्वारा पूर्वजों का डेटा उपलब्ध करा दिया जाता है। पूर्वजों के नाम पता चलने के बाद उनका श्राद्ध कर्म करते हैं।' यह उदाहरण बताता है कि बही-खाते केवल धार्मिक परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के लिए सांस्कृतिक पहचान का आधार भी हैं।

यह ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब पितृपक्ष के दौरान देशभर से भारी संख्या में श्रद्धालु प्रयागराज पहुँचते हैं और अपने पितरों की पहचान के लिए इन्हीं बही-खातों पर निर्भर रहते हैं। आने वाले दिनों में संगम तट पर श्राद्ध और तर्पण का सिलसिला शुरू होगा, और पंडा समाज की यह तैयारी लाखों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था को सहारा देगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत के उस विशाल पारिवारिक अभिलेखागार का हिस्सा हैं जिसे राज्य या डिजिटल प्रणाली आज भी प्रतिस्थापित नहीं कर सकी। यह विडंबना ही है कि जिस देश में आधार, डिजिलॉकर और सेंट्रलाइज्ड रजिस्ट्री की बात होती है, वहाँ लाखों नागरिकों की वंशावली का एकमात्र भरोसेमंद स्रोत एक पंडे के हस्तलिखित रजिस्टर में है। इन खातों का कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्य होना सरकारी अभिलेखीकरण की गंभीर खामियों को उजागर करता है। यदि इन बही-खातों का व्यवस्थित डिजिटलीकरण नहीं हुआ, तो यह अमूल्य सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत एक पीढ़ी के बाद अपूरणीय क्षति उठा सकती है।
RashtraPress
22 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रयागराज के पंडा समाज के बही-खाते क्या हैं?
ये हस्तलिखित रजिस्टर हैं जिनमें देशभर से आने वाले लाखों परिवारों की पीढ़ियों की वंशावली, पूर्वजों के नाम और अनुष्ठानों का विस्तृत रिकॉर्ड दर्ज है। इनमें 1823 संवत से परिवारों के अभिलेख उपलब्ध हैं और इन्हें कानूनी साक्ष्य के रूप में भी मान्यता प्राप्त है।
पितृपक्ष 2026 में प्रयागराज आने वाले श्रद्धालुओं को बही-खातों से क्या सहायता मिलती है?
पंडा समाज नाम, मूल निवास और जाति-गोत्र के आधार पर कुछ ही मिनटों में श्रद्धालुओं के पूर्वजों के हस्ताक्षर और पूर्व में कराए गए अनुष्ठानों का पूरा ब्यौरा खोज निकालता है। लगभग 70% श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के नाम ज्ञात नहीं होते, जिनके लिए यह सेवा विशेष रूप से उपयोगी है।
पितृपक्ष 2026 कब से शुरू हो रहा है?
पितृपक्ष 2026 का आरंभ 26 सितंबर से हो रहा है। श्रद्धालु श्राद्ध कार्यक्रम के लिए एक दिन पूर्व ही प्रयागराज पहुँचने लगते हैं।
बही-खातों को इतने वर्षों तक सुरक्षित कैसे रखा जाता है?
इन बही-खातों में विशेष कागज और स्याही का उपयोग किया जाता है जो दशकों तक खराब नहीं होती। इनकी सुरक्षा के लिए विशेष दवाएँ रखी जाती हैं और हर महीने इन्हें धूप में सुखाया जाता है।
क्या बही-खाते कानूनी दस्तावेज़ के तौर पर मान्य हैं?
हाँ, पंडा ध्रुव तिवारी के अनुसार इन बही-खातों को कानूनी तौर पर पुख्ता पारिवारिक साक्ष्य माना जाता है। पारिवारिक विवादों या वंशावली सिद्ध करने में भी ये सहायक होते हैं और तहसील व सरकारी कार्यालयों में उपलब्ध न होने वाला रिकॉर्ड इनमें मिल जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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