कस्तूरी बाई पुण्यतिथि: कलम और चरखे से आज़ादी लड़ने वाली कवयित्री, 1932 में हुई थीं गिरफ्तार
सारांश
मुख्य बातें
स्वतंत्रता संग्राम की निडर कवयित्री कस्तूरी बाई की आज, 4 अक्टूबर को पुण्यतिथि है। 1892 में एक देशभक्त परिवार में जन्मी कस्तूरी बाई ने घर की दहलीज लांघकर राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और अपनी कविताओं के माध्यम से स्वतंत्रता की चाह को शब्द दिए। 4 अक्टूबर 1979 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी नारी शक्ति और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा बनी हुई है।
प्रेरणादायी पारिवारिक पृष्ठभूमि
कस्तूरी बाई के पिता पंडित नंदलाल चतुर्वेदी, माता सुंदर बाई और बड़े भाई माखनलाल चतुर्वेदी — तीनों स्वतंत्रता आंदोलन के अहम स्तंभ थे। ऐसे राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत परिवेश में कस्तूरी बाई ने बचपन से ही देशसेवा का पाठ पढ़ा। बाल्यकाल में ही उनका विवाह किशोरी लाल उपाध्याय से हुआ, किंतु मात्र 21 वर्ष की आयु में वे विधवा हो गईं।
उसी कठिन दौर में उनके भाई माखनलाल चतुर्वेदी भी अस्वस्थ थे और उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था। दोनों भाई-बहन एक-दूसरे का सहारा बने और खंडवा में साथ रहने लगे। विपरीत परिस्थितियों ने उनके संकल्प को और दृढ़ किया।
असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका
1920 के दशक में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो कस्तूरी बाई स्वयं को रोक नहीं सकीं। उन्होंने घर की चौखट पार कर महिलाओं को संगठित किया, चरखा चलाने की कक्षाएँ शुरू कीं और शराब एवं विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धरना दिया। उस युग में किसी महिला का इस तरह आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़े होना असाधारण साहस का प्रतीक था।
गौरतलब है कि यह वह दौर था जब अधिकांश महिलाएँ सार्वजनिक जीवन से दूर रहती थीं। कस्तूरी बाई ने महिला संगठन बनाकर न केवल राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित की, बल्कि स्वदेशी भावना को जन-जन तक पहुँचाया।
गिरफ्तारी और जेल का अनुभव
1932 में खंडवा में एक जुलूस का नेतृत्व करने पर अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। पहले चार महीने की सजा हुई और तत्पश्चात उन्हें नागपुर जेल भेज दिया गया। जेल में स्वतंत्रता सेनानी जानकी देवी बजाज से उनकी मुलाकात हुई, जिसने उनके वैचारिक दृष्टिकोण को और पुख्ता किया।
यह ऐसे समय में आया जब देशभर में सविनय अवज्ञा आंदोलन अपने चरम पर था और हज़ारों स्वतंत्रता सेनानी जेलों में बंद थे। कस्तूरी बाई की गिरफ्तारी ने मध्य भारत की महिला सहभागिता को एक नई पहचान दी।
कवयित्री के रूप में योगदान
कस्तूरी बाई केवल एक आंदोलनकारी ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कवयित्री भी थीं। उनकी कविताओं में स्वतंत्रता संग्राम की पीड़ा, संघर्ष और उम्मीद साफ झलकती थी। कलम और चरखा — दोनों उनके प्रतिरोध के हथियार थे।
जेल से रिहाई के बाद जब उनके भाई माखनलाल चतुर्वेदी कारावास में थे, तब वे कुछ समय के लिए अपनी ससुराल होशंगाबाद चली गईं, लेकिन समाज सेवा का कार्य उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। जब तक स्वास्थ्य ने साथ दिया, वे समाज के उत्थान में जुटी रहीं।
विरासत और स्मृति
4 अक्टूबर 1979 को कस्तूरी बाई का निधन हुआ। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल शस्त्र से नहीं, बल्कि विचार, शब्द और सामाजिक संगठन की शक्ति से भी लड़ी जाती है। भाई माखनलाल चतुर्वेदी के प्रसिद्ध परिवार से आई इस महिला योद्धा की गाथा स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण और प्रायः अनदेखा अध्याय है। उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन से प्रेरणा लेना, आने वाली पीढ़ियों का दायित्व है।