2 अगस्त 2026
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राम प्रसाद बिस्मिल: काकोरी के नायक जिन्होंने 30 वर्ष की आयु में हंसते-हंसते फांसी को गले लगाया

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राम प्रसाद बिस्मिल: काकोरी के नायक जिन्होंने 30 वर्ष की आयु में हंसते-हंसते फांसी को गले लगाया

सारांश

30 वर्ष की आयु में फांसी के फंदे पर मुस्कुराते हुए चढ़ने वाले राम प्रसाद बिस्मिल सिर्फ क्रांतिकारी नहीं थे — वे कवि, लेखक और विचारक भी थे। काकोरी कांड से लेकर 'सरफरोशी की तमन्ना' तक, उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कलम और बंदूक दोनों से आजादी की लड़ाई लड़ी जा सकती है।

मुख्य बातें

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था।
9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड में बिस्मिल ने चंद्रशेखर आजाद , अशफाक उल्ला खान समेत साथियों के साथ ब्रिटिश सरकारी खजाना लूटा।
26 सितंबर 1925 को बिस्मिल समेत लगभग 40 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया।
बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।
19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में मात्र 30 वर्ष की आयु में बिस्मिल को फांसी दी गई।
'सरफरोशी की तमन्ना' और 'मैनपुरी की प्रतिज्ञा' जैसी रचनाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी।

क्रांतिकारी कवि और स्वतंत्रता सेनानी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने भारत की आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया — न केवल हथियार उठाकर, बल्कि अपनी लेखनी से युवाओं की रगों में देशभक्ति का लहू दौड़ाकर। 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में मात्र 30 वर्ष की आयु में फांसी के फंदे पर झूलते हुए भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी। उनकी अमर पंक्ति — 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' — आज भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में देशप्रेम की ज्वाला प्रज्वलित करती है।

प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व निर्माण

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित मुरलीधर नगरपालिका में कर्मचारी थे और माता का नाम मूलमती (मूलारानी) था। सीमित आर्थिक संसाधनों के बीच पले-बढ़े बिस्मिल की बचपन में पढ़ाई से अधिक रुचि खेल-कूद में थी, और किशोरावस्था में कुछ गलत आदतें भी उनमें आ गई थीं।

महज सात वर्ष की आयु से पिता ने घर पर हिंदी की शिक्षा दी, साथ ही उर्दू सीखने के लिए मौलवी के पास भेजा। जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया जब नौवीं कक्षा में पढ़ते हुए वे आर्य समाज के संपर्क में आए। शाहजहांपुर स्थित आर्य समाज मंदिर में स्वामी सोमदेव से हुई मुलाकात ने उनके व्यक्तित्व को नई दिशा दी और राष्ट्रभक्ति के विचार उनमें गहरे उतर गए।

क्रांति की राह पर पहला कदम

जब बिस्मिल लगभग 18 वर्ष के थे, तब स्वतंत्रता सेनानी भाई परमानंद को ब्रिटिश सरकार ने गदर षड्यंत्र मामले में फांसी की सजा सुनाई — जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। इस घटना ने युवा बिस्मिल को भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने 'मेरा जन्म' शीर्षक कविता लिखी, जिसमें देश को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने का संकल्प स्पष्ट था, और पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए।

कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में उन्होंने नरम दल के विरोध के बावजूद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की भव्य शोभायात्रा निकाली। इसी दौरान केशव बलिराम हेडगेवार, सोमदेव शर्मा और मुकुंदीलाल जैसे राष्ट्रवादियों से उनका परिचय हुआ। उन्होंने 'अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास' पुस्तक प्रकाशित की, जिस पर ब्रिटिश सरकार ने तत्काल प्रतिबंध लगा दिया।

मातृवेदी और भूमिगत संघर्ष

औरैया के क्रांतिकारी पंडित गेंदालाल दीक्षित के साथ मिलकर बिस्मिल ने मातृवेदी संगठन के माध्यम से अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया। उनकी कविता 'मैनपुरी की प्रतिज्ञा' उस दौर में व्यापक रूप से लोकप्रिय हुई। एक मुखबिर की गद्दारी के कारण कई साथी शहीद हो गए और बिस्मिल को लगभग दो वर्षों तक भूमिगत रहना पड़ा — परंतु अंग्रेज उन्हें पकड़ नहीं सके। इस अवधि में भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएं और पुस्तकें लिखीं।

काकोरी कांड: ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में काकोरी कांड एक अमिट अध्याय है। क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए संसाधन जुटाने और ब्रिटिश सत्ता को ललकारने के उद्देश्य से 9 अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल ने चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बक्शी तथा अन्य साथियों के साथ लखनऊ के निकट काकोरी स्टेशन के पास चलती ट्रेन को रोककर सरकारी खजाना अपने कब्जे में ले लिया। इस साहसिक घटना ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।

काकोरी कांड के बाद अंग्रेजी सरकार ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते हुए 26 सितंबर 1925 को बिस्मिल समेत लगभग 40 लोगों को गिरफ्तार किया। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।

बलिदान और अमर विरासत

19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दी गई। फांसी के फंदे तक पहुंचते समय भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी और वे ईश्वर का स्मरण कर रहे थे। उनके अंतिम शब्दों में यही भावना थी —

'मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे, बाकी न मैं रहूं न मेरी आरजू रहे। जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे, तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे।'

उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हो और भारत स्वतंत्र बने। बिस्मिल का बलिदान व्यर्थ नहीं गया — उनकी कविताओं और विचारों ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बन गए।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि कविता और विचार से भी संभव है। गौरतलब है कि बिस्मिल ने हिंदू-मुस्लिम एकता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया — अशफाक उल्ला खान के साथ उनकी मित्रता और साझा बलिदान आज की विभाजनकारी राजनीति के सामने एक दर्पण है। काकोरी कांड को अक्सर केवल 'ट्रेन डकैती' के रूप में सरल बना दिया जाता है, जबकि यह एक सुचिंतित राजनीतिक कार्रवाई थी जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की अजेयता के मिथक को तोड़ा। बिस्मिल की विरासत का सही मूल्यांकन तभी होगा जब हम उनके लेखन को उतनी ही गंभीरता से पढ़ें जितनी उनके बलिदान को याद करते हैं।
RashtraPress
2 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राम प्रसाद बिस्मिल कौन थे?
राम प्रसाद बिस्मिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी, कवि और लेखक थे, जिनका जन्म 11 जून 1897 को शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे काकोरी कांड के प्रमुख नायक थे और 'सरफरोशी की तमन्ना' जैसी देशभक्ति कविताओं के लिए अमर हैं।
काकोरी कांड क्या था और इसमें बिस्मिल की क्या भूमिका थी?
9 अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के निकट काकोरी स्टेशन के पास चलती ट्रेन रोककर ब्रिटिश सरकारी खजाना लूटा था। इस कार्रवाई का उद्देश्य क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए संसाधन जुटाना और ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती देना था।
राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी कब और कहाँ दी गई?
19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दी गई। उस समय उनकी आयु मात्र 30 वर्ष थी। फांसी के फंदे तक पहुंचते समय भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी।
'सरफरोशी की तमन्ना' का बिस्मिल से क्या संबंध है?
'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' — यह पंक्ति स्वतंत्रता सेनानियों के बीच बिस्मिल ने लोकप्रिय बनाई और यह उनकी क्रांतिकारी भावना का प्रतीक बन गई। यह गीत आज भी भारतीयों में देशभक्ति की भावना जगाता है।
बिस्मिल के साथ काकोरी कांड में और कौन-से क्रांतिकारी शामिल थे?
काकोरी कांड में बिस्मिल के साथ चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बक्शी और अन्य क्रांतिकारी शामिल थे। बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मृत्युदंड की सजा दी गई।
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