सावित्रीबाई फुले: अपशब्दों और गुलामी की बाधाओं को पार करके बनीं नारी शिक्षा की ध्वजवाहक
सारांश
Key Takeaways
नई दिल्ली, 9 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उस समय जब लड़कियों की शिक्षा को एक अपराध माना जाता था, और समाज ने उनके शिक्षा के मार्ग में हर संभव बाधाएं उत्पन्न की थीं, एक साहसी महिला ने अपशब्दों की बौछार, समाज की तानों और गुलामी की जंजीरों को चुनौती दी। हर रोज अपमान और हमलों का सामना करते हुए भी उन्होंने हार नहीं मानी। अडिग संकल्प के साथ आगे बढ़ते हुए, वह भारत की 'नारी शिक्षा की अग्रदूत' बन गईं।
सावित्रीबाई ने अपने संघर्षों के बावजूद कभी हार नहीं मानी। उनका साहस केवल लड़कियों की शिक्षा की शुरुआत नहीं था, बल्कि इसने महिलाओं के सशक्तिकरण की बुनियाद भी रखी। 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में जन्मी सावित्रीबाई का बचपन एक ऐसे समय में बीता, जब लड़कियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना असंभव सा था। केवल 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह 13 वर्ष
ज्योतिराव का लक्ष्य समाज में शिक्षा के माध्यम से जागरूकता फैलाना था, विशेषकर नारी शिक्षा में। लेकिन कट्टरपंथी समाज का विरोध इतना प्रबल था कि उनके प्रयास सफल नहीं हो पा रहे थे। इस विषय को उन्होंने अपनी मौसी सगुणाबाई और पत्नी सावित्रीबाई के सामने रखा। सगुणाबाई ने कहा, “समाज को बदलना है तो पहले महिलाओं को शिक्षित करना होगा।” यहीं से परिवर्तन की अलख जगी।
1 जनवरी 1848 को, सावित्रीबाई ने पुणे के भिडे वाडा में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला। शुरुआत में केवल छह छात्राएं थीं। यह कदम उस समय के रूढ़िवादी समाज के लिए एक बड़ा सदमा था। रास्ते में लोग उन पर पत्थर फेंकते, कीचड़ डालते और अपशब्द कहते। सावित्रीबाई हमेशा एक अतिरिक्त साड़ी साथ रखतीं, विद्यालय पहुंचकर वे कपड़े बदलतीं और पढ़ाना जारी रखतीं। उनका मानना था कि शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि बौद्धिक मुक्ति है।
वे एक क्रांतिकारी कवयित्री भी थीं। उनकी रचना 'काव्य फुले' में वे लिखती हैं, “शिक्षा ग्रहण करो, स्वावलंबी बनो।” उन्होंने अंग्रेजी को 'अंग्रेजी माता' कहा और इसे वैश्विक ज्ञान की खिड़की माना। उनका उद्देश्य था कि बहुजन समाज आधुनिक विचारों से जुड़े। सावित्रीबाई का संघर्ष केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने विधवाओं के शोषण को देखा और अपने घर में 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' खोला। दीवारों पर पोस्टर लगवाए, “गर्भवती विधवाएं, यहां सम्मान से बच्चे को जन्म दो।”
1897 में पुणे में प्लेग महामारी फैल गई। सवर्ण डॉक्टर दलित बस्तियों में जाने से कतराते थे। 66 वर्ष10 वर्षीय10 मार्च 1897 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
आज भी उनका योगदान जीवित है। 2 जुलाई 2025'सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास संस्थान' किया गया। 4 जुलाई