राघव चड्ढा ने संसद में पितृत्व अवकाश की मांग उठाई, कहा- देखभाल पिता की भी जिम्मेदारी है
सारांश
Key Takeaways
- पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाने की मांग बढ़ रही है।
- देखभाल की जिम्मेदारी केवल मां की नहीं, बल्कि पिता की भी है।
- केवल 15 दिन का पितृत्व अवकाश केंद्र सरकार के कर्मचारियों को मिलता है।
- अन्य देशों में पितृत्व अवकाश की व्यवस्था बेहतर है।
- समाज को कानून में बदलाव की आवश्यकता है।
नई दिल्ली, 31 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। देश में पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) को कानूनी अधिकार बनाने की मांग में तेजी आ रही है। आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि भारत में केयरगिविंग की जिम्मेदारी केवल मां पर डालना एक बड़ी सामाजिक और कानूनी कमी है।
राघव चड्ढा ने कहा कि जब किसी बच्चे का जन्म होता है, तो बधाई माता-पिता दोनों को मिलती है, लेकिन बच्चे की देखभाल का बोझ पूरी तरह से मां पर डाल दिया जाता है। उन्होंने इसे समाज की विफलता बताया। उनका कहना है कि हमारा सिस्टम केवल मातृत्व अवकाश (मेटरनिटी लीव) को मान्यता देता है, जबकि पिता की भूमिका को अनदेखा किया जाता है।
संसद में उन्होंने मांग की कि पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाया जाना चाहिए, ताकि पिता को अपने नवजात बच्चे और पत्नी की देखभाल के लिए नौकरी और परिवार के बीच चयन करने की आवश्यकता न पड़े। राघव चड्ढा ने कहा, "एक मां को गर्भावस्था के नौ महीनों के बाद, सामान्य या सिजेरियन डिलीवरी जैसी कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। ऐसे समय में उसे दवाइयों के साथ-साथ अपने पति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सहयोग की बेहद जरूरत होती है।"
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पति की जिम्मेदारी केवल बच्चे की देखभाल तक सीमित नहीं होती, बल्कि पत्नी की देखभाल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस समय पति की मौजूदगी केवल एक लग्जरी नहीं, बल्कि आवश्यक है।
राघव चड्ढा ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्तमान में केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 15 दिन का पितृत्व अवकाश मिलता है, जबकि निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के पास यह अधिकार नहीं है। भारत की लगभग 90 प्रतिशत कार्यबल निजी क्षेत्र में कार्यरत है, जिसका अर्थ है कि अधिकांश पिता इस सुविधा से वंचित हैं।
उदाहरण देते हुए राघव चड्ढा ने कहा कि स्वीडन, आइसलैंड और जापान जैसे देशों में पितृत्व अवकाश 90 दिनों से लेकर 52 हफ्तों तक कानूनी रूप से सुनिश्चित किया गया है।
उन्होंने सरकार से अपील की कि कानून को समाज का आईना होना चाहिए और इसमें यह स्पष्ट दिखना चाहिए कि बच्चे की देखभाल केवल मां की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि माता और पिता दोनों की साझा जिम्मेदारी है।