क्या रेलवे ने बताया कि ट्रेनों में नॉनवेज खाने के लिए हलाल सर्टिफिकेशन की बाध्यता नहीं है?
सारांश
Key Takeaways
- रेलवे में नॉनवेज भोजन के लिए हलाल सर्टिफिकेशन की कोई बाध्यता नहीं है।
- खाद्य सुरक्षा सभी समुदायों के लिए आवश्यक है।
- सभी प्रकार के मांस की बिक्री से सभी वर्गों के जीविका के अधिकार को सुनिश्चित किया जा सकता है।
- धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करना आवश्यक है।
- एफएसएसएआई को भी इस विषय पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।
नई दिल्ली, 12 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने बताया कि हमें एक शिकायत प्राप्त हुई थी जिसमें कहा गया था कि भारतीय रेलवे में परोसा या बेचा जाने वाला नॉन-वेज खाना केवल हलाल तरीके से काटे गए जानवरों से तैयार किया जाता है।
प्रियंक कानूनगो ने कहा कि हमने यह मुद्दा रेलवे के समक्ष उठाया और उनसे स्पष्टीकरण मांगा। रेलवे ने स्पष्ट किया कि उनके यहाँ हलाल सर्टिफिकेशन की कोई अनिवार्यता नहीं है। हम उनकी इस सकारात्मक प्रतिक्रिया की सराहना करते हैं कि उन्होंने तत्परता से जवाब दिया। यह उनकी जिम्मेदारी को दर्शाता है।
नई दिल्ली में राष्ट्र प्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा कि हमने उन्हें एक नोटिस के माध्यम से पूछा है कि रेलवे में जो ठेकेदार भोजन बेचते हैं या मांस की आपूर्ति करते हैं, वह हलाल पद्धति से है या झटका पद्धति से। यह जानकारी आवश्यक है क्योंकि दारुल उलूम देवबंद के अनुसार हलाल पद्धति से जानवर का वध केवल मुसलमान कर सकते हैं।
सरकारी एजेंसी होने के नाते, रेलवे द्वारा बेचा जाने वाला खाना किस पद्धति से तैयार किया जा रहा है, यह स्पष्ट होना चाहिए। झटका पद्धति से मांस का वध हिंदू एवं अन्य दलित समुदाय करते हैं। सभी वर्गों के लोगों के जीविका के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रकार के मांस की बिक्री होनी चाहिए।
प्रियंक कानूनगो ने कहा कि रेलवे के साथ-साथ एफएसएसएआई को भी नोटिस जारी कर पूछा गया है कि ऐसी संभावनाओं पर विचार किया जाए, जहां भारत में बिकने वाली मांसाहारी सामग्री पर स्पष्ट जानकारी हो कि यह सभी धर्मों के लोग खा सकते हैं या नहीं। यदि किसी के लिए प्रतिबंध है तो उसे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि भारत में एक अन्य अल्पसंख्यक समुदाय सिख समुदाय है। सिख धर्म की नियम पुस्तिका में स्पष्ट लिखा है कि सिखों को इस्लामी हलाल पद्धति से तैयार किया गया मांस नहीं खाना चाहिए। यदि एक विशेष पद्धति से तैयार मांस सिख समुदाय के लिए प्रतिबंधित है, तो अंजाने में उन्हें वही भोजन देना धार्मिक आस्था का उल्लंघन है और मानवाधिकार का हनन है।