रामभद्राचार्य विवाद: महंत सीताराम दास बोले — कोर्ट नहीं, मध्यस्थता से निकले हल
सारांश
मुख्य बातें
अयोध्या के साकेत भवन मंदिर के महंत सीताराम दास जी महाराज ने 2 अक्टूबर 2026 को जगद्गुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ दर्ज मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस विवाद को न्यायालय की बजाय आपसी बातचीत और मध्यस्थता के ज़रिए सुलझाया जाना चाहिए। ब्राह्मणों की उपजातियों को लेकर जगद्गुरु के एक वक्तव्य के बाद तीर्थराज प्रयाग के सत्र न्यायालय में परिवाद दाखिल किया गया है, जिसे लेकर धार्मिक और सामाजिक हलकों में तनाव उत्पन्न हुआ है।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला जगद्गुरु रामभद्राचार्य के उस वक्तव्य से जुड़ा है, जिसे ब्राह्मण समाज के कुछ वर्गों ने अपमानजनक माना। इसके बाद तीर्थराज प्रयाग की सत्र न्यायालय में एक परिवाद दाखिल किया गया। कथित तौर पर यह वक्तव्य ब्राह्मणों की उपजातियों के संदर्भ में दिया गया था, जिससे समाज के एक हिस्से की भावनाएँ आहत हुईं।
महंत सीताराम दास की अपील
महंत सीताराम दास जी महाराज ने कहा कि यदि जगद्गुरु रामभद्राचार्य के वक्तव्य से ब्राह्मण समाज की भावनाएँ आहत हुई हैं, तो उन्हें समाज के प्रति खेद व्यक्त करना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी वक्तव्य में चूक या त्रुटि हो जाना संभव है और ऐसी स्थिति में कानूनी प्रक्रिया की राह पकड़ने से समाज को कोई सकारात्मक लाभ नहीं मिलता।
महंत ने परिवाद दाखिल करने वाले पक्षों से भी अपील की कि नोटिस जारी कराने या मामले को आगे बढ़ाने के बजाय सभी पक्ष बैठकर सहमति से समाधान निकालें। उनके अनुसार, धार्मिक और सामाजिक मामलों में विवाद को हवा देने से समाज के भीतर विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
रामभद्राचार्य के योगदान का उल्लेख
महंत सीताराम दास ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य के दीर्घकालिक सामाजिक और धार्मिक योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि वे लंबे समय से सनातन संस्कृति, राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए समर्पित भाव से कार्य करते रहे हैं। उन्होंने इस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए विवाद के शांतिपूर्ण समाधान पर बल दिया। यह ऐसे समय में आया है जब धार्मिक नेताओं के बयानों को लेकर सामाजिक संवेदनशीलता बढ़ी हुई है।
सौहार्द बनाए रखने पर ज़ोर
महंत ने कहा कि ब्राह्मण समाज हमेशा सभी के कल्याण की कामना करता है और समाज में आपसी सौहार्द बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने दोनों पक्षों से अनुरोध किया कि मध्यस्थता के माध्यम से इस विवाद को जल्द से जल्द समाप्त किया जाए, ताकि समाज में किसी प्रकार का विभेद न उत्पन्न हो।
आगे की राह
गौरतलब है कि इस मामले में अभी तक किसी आधिकारिक मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। महंत सीताराम दास की यह अपील ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है जब अयोध्या धार्मिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में राष्ट्रीय ध्यान के केंद्र में है। अब देखना होगा कि दोनों पक्ष इस अपील पर किस रूप में प्रतिक्रिया देते हैं।