क्या संघर्ष से शिखर तक पहुँच सकते हैं? वकील, नेता और डिजिटल युग के शिल्पकार रवि शंकर प्रसाद की प्रेरक गाथा

Key Takeaways
- संघर्ष और प्रतिबद्धता से सफलता संभव है।
- डिजिटल इंडिया कार्यक्रम में योगदान महत्वपूर्ण है।
- राजनीतिक और सामाजिक चेतना का महत्व।
- कानूनी विशेषज्ञता से सामाजिक न्याय मिल सकता है।
- नेतृत्व क्षमता का विकास आवश्यक है।
नई दिल्ली, 29 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। बिहार की राजधानी पटना ने भारतीय राजनीति और न्यायपालिका को कई महान व्यक्तित्व दिए हैं। इन्हीं में एक नाम है रवि शंकर प्रसाद, जो एक वकील, राजनीतिज्ञ, वक्ता और सुधारक के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं।
30 अगस्त 1954संघर्ष और प्रतिबद्धता से भरी हैं। उनके पिता ठाकुर प्रसाद बिहार के प्रसिद्ध वकील और जनसंघ के संस्थापक नेताओं में से थे। परिवार से मिली राजनीतिक और सामाजिक चेतना ने उन्हें प्रारंभ से ही नेतृत्व और न्याय की लड़ाई के लिए प्रेरित किया।
कॉलेज में रहते हुए, रवि शंकर प्रसाद ने अपनी वाक पटुता और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। वे जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन का हिस्सा बने और आपातकाल के दौरान जेल गए। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े रहकर उन्होंने संगठनात्मक राजनीति की गहराई को समझा। इस दौर ने उन्हें नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए समर्पित कार्यकर्ता बना दिया।
1980 में पटना हाईकोर्ट में वकालत शुरू करने वाले रवि शंकर प्रसाद ने जल्दी ही संवैधानिक और आपराधिक मामलों में अपनी पहचान बनाई। वे पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बने और सुप्रीम कोर्ट में कई महत्वपूर्ण मामलों में पैरवी की। उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई और नागरिक अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाई। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) के बिहार सचिव और पटना हाईकोर्ट अधिवक्ता संघ के सचिव के रूप में, प्रसाद ने अदालत और सड़क दोनों जगह न्याय और सुधार के लिए संघर्ष किया।
उन्होंने राम जन्मभूमि-अयोध्या विवाद में हिंदू महासभा का प्रतिनिधित्व किया, लालकृष्ण आडवाणी को 1990 में रथ यात्रा के दौरान गिरफ्तार होने पर अदालत में बचाव किया, और चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ जनहित याचिका में मुख्य वकील रहे। उनके कानूनी योगदान ने भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाया।
भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहकर, उन्होंने विधिक प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक, अनुशासनात्मक समिति के सदस्य और राष्ट्रीय प्रवक्ता जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उनकी तेजतर्रार बहस और तर्कों ने उन्हें पार्टी का विश्वसनीय चेहरा बना दिया।
मंत्री रहते हुए, उन्होंने आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया, कोयला और खनन मंत्रालय में सुधार की गति तेज की और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति को मजबूती से स्थापित किया। 2002 में, उन्हें दक्षिण अफ्रीका में एनएएम सम्मेलन का नेतृत्व करने और फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात से मुलाकात के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया – यह उनकी कूटनीतिक भूमिका का एक बड़ा प्रमाण था।
कानून, न्याय और आईटी मंत्री के रूप में, रवि शंकर प्रसाद का सबसे बड़ा योगदान डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को गति देना रहा। कॉमन सर्विस सेंटर योजना से लेकर ग्रामीण क्षेत्र में बीपीओ यूनिट्स खोलने और इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने तक, उन्होंने डिजिटल क्रांति को आम जन से जोड़ा। 2018 में, ब्रिटेन की एक एनजीओ ने उन्हें दुनिया के डिजिटल गवर्नमेंट के शीर्ष 20 नेताओं में शामिल किया।
न केवल अदालत और संसद में, बल्कि अखबारों और मंचों पर भी उनके विचार गूंजते हैं।