क्या 'कॉमन मैन' के 'हीरो' आरके लक्ष्मण ने आम आदमी का दिल छुआ?
सारांश
Key Takeaways
- आरके लक्ष्मण की कला ने आम आदमी की आवाज को सशक्त बनाया।
- उनके कार्टून में समाज के विभिन्न मुद्दों का प्रतिनिधित्व है।
- उन्होंने कॉमन मैन के माध्यम से लोकतंत्र में जनता की भूमिका को उजागर किया।
- आरके लक्ष्मण को पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
- उनकी रचनाएँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं।
नई दिल्ली, 25 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 26 जनवरी, केवल एक तारीख नहीं, बल्कि हमारे देश की आजादी और लोकतंत्र का प्रतीक है। इसी दिन हमें अपना संविधान मिला था, जिसे हर साल हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। लेकिन 2015 में इस दिन भारत ने एक अद्भुत कलाकार को खो दिया, जिसने अपनी कला के जरिए आम आदमी की आवाज को दुनिया तक पहुँचाया और सत्ता से सवाल पूछने में भी नहीं हिचके।
हम बात कर रहे हैं आरके लक्ष्मण की, जिन्हें 'कॉमन मैन' का 'हीरो' कहा गया। आरके लक्ष्मण ने अपनी रचनाओं से न केवल हमें हंसाया, बल्कि हमें सोचने पर भी मजबूर किया। उनके कार्टून में सत्ता की गलतियाँ, आम आदमी की समस्याएँ और समाज के विविध मुद्दे हमेशा व्यंग्यात्मक तरीके से प्रस्तुत होते थे। उनका सबसे प्रसिद्ध पात्र ‘द कॉमन मैन’ था, एक साधारण आदमी जो चुपचाप राजनीति और सामाजिक स्थिति को देखता है, लेकिन उसकी आँखों में हर बार सवाल और निराशा नजर आती है।
आरके लक्ष्मण का जन्म 24 अक्टूबर 1921 को मैसूर में हुआ। बचपन से ही कला और हास्य में उनकी रुचि थी। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई में पत्रकारिता की शुरुआत की। उन्होंने स्थानीय समाचार पत्रों से शुरुआत की और अपनी प्रतिभा से द फ्री प्रेस जर्नल और बाद में द टाइम्स ऑफ इंडिया में स्थान बनाया। यही मंच था जिसने उन्हें देश और विदेश में पहचान दिलाई।
उनकी कार्टूनिंग शैली सरल थी, लेकिन संदेश गहरा और प्रभावशाली था। हंसी-मजाक के बीच वे कभी सत्ता और नेताओं को चुनौती देते, तो कभी आम आदमी के दर्द को उजागर करते।
आरके लक्ष्मण को 1973 में पद्म भूषण और 2005 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी कला को सराहा गया और 1984 में उन्हें रेमन मैग्सेस पुरस्कार मिला, जिसे एशिया का नोबेल कहा जाता है।
उनकी रचनाएँ केवल अखबारों में प्रकाशित चित्र नहीं थीं, बल्कि आम आदमी की दास्तान थीं। उन्होंने कॉमन मैन के माध्यम से यह प्रदर्शित किया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज कितनी महत्वपूर्ण होती है। उनके चित्रों में सादगी, ह्यूमर और व्यंग्य का ऐसा मिश्रण था कि कोई भी पाठक बिना रुके उन्हें देखता और सोचता रहता।
आरके लक्ष्मण का निधन 26 जनवरी 2015 को हुआ। 94 वर्ष की आयु में उन्होंने हमें अलविदा कहा, लेकिन कॉमन मैन आज भी हमारे बीच जीवित है। पुणे में उनकी याद में एक आर्ट गैलरी बनाई गई है, जहाँ उनके बनाए गए कार्टून संग्रहित हैं। यह गैलरी आज भी उनकी कला और संदेश को जन-जन तक पहुँचाती है।