क्या सज्जन कुमार के खिलाफ कोई सबूत नहीं था? फैसले के लिए कोर्ट का धन्यवाद: अधिवक्ता अनिल कुमार शर्मा

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क्या सज्जन कुमार के खिलाफ कोई सबूत नहीं था? फैसले के लिए कोर्ट का धन्यवाद: अधिवक्ता अनिल कुमार शर्मा

सारांश

दिल्ली कोर्ट ने सज्जन कुमार को 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामले में बरी कर दिया। उनके वकील ने कहा कि कोई ठोस सबूत नहीं था। यह फैसला उनके लिए न्यायपालिका की ओर से एक बड़ी राहत है। जानिए इस मामले के पीछे की सच्चाई और कोर्ट की टिप्पणियां क्या हैं।

Key Takeaways

  • सज्जन कुमार को बरी करने का फैसला न्यायपालिका पर आधारित है।
  • कोई ठोस सबूत न होने के कारण उन्हें बरी किया गया।
  • गवाहों ने 38 साल पहले सज्जन कुमार का नाम नहीं लिया।
  • इस मामले ने न्याय के प्रति लोगों की उम्मीदों को प्रभावित किया है।
  • सुप्रीम कोर्ट में सज्जन कुमार की सजा के खिलाफ अपील लंबित है।

नई दिल्ली, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली कोर्ट ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान राजधानी में जनकपुरी और विकासपुरी इलाकों में भड़की हिंसा से संबंधित एक मामले में पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को बरी कर दिया है।

पूर्व सांसद सज्जन कुमार के वकील अनिल कुमार शर्मा ने मीडिया से संवाद करते हुए कहा, "कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है क्योंकि विकासपुरी और जनकपुरी मामलों में उनके खिलाफ कोई भी आरोप साबित नहीं हो सका। इन गवाहों में से किसी ने भी 38 साल पहले सज्जन कुमार का नाम नहीं लिया था, एक बार भी नहीं। कोई नया सबूत नहीं है, कोई नया बयान नहीं है, कोई नई कहानी नहीं है। वे उन्हें निशाना बनाने की अपनी कोशिश में नाकाम रहे। हम उन्हें बरी करने के लिए न्यायपालिका का धन्यवाद करते हैं।"

उन्होंने बताया कि सज्जन कुमार के खिलाफ दो दिनों में दो मामले दर्ज किए गए थे। इन पर 302 का केस पहले ही नहीं बना था। हमारा प्रयास सच सामने लाना था। इन्होंने जितने भी गवाह लाए थे, उन सभी की गवाही हो चुकी थी, जिसके चलते इनके पास कोई सही साक्ष्य नहीं था और कोर्ट ने पूर्व सांसद सज्जन कुमार को बरी कर दिया।

राऊज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज दिग्विजय सिंह ने एक आदेश सुनाते हुए 78 साल के सज्जन कुमार को बरी कर दिया। यह मामला 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख बॉडीगार्ड्स द्वारा हत्या के बाद भड़के दंगों के दौरान हुई हिंसा के आरोपों से जुड़ा था।

दशकों बाद जस्टिस जीपी माथुर कमेटी की सिफारिश पर 114 मामलों को फिर से खोलने के लिए एसआईटी बनाई गई थी।

अगस्त 2023 में ट्रायल कोर्ट ने औपचारिक रूप से सज्जन कुमार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की अलग-अलग धाराओं के तहत आरोप तय किए, लेकिन एसआईटी की ओर से पहले लगाई गई धारा 302 के तहत हत्या का आरोप हटाने का निर्णय लिया गया।

इस मामले में ट्रायल पिछले साल 23 सितंबर को समाप्त हो गया था, जिसके बाद कोर्ट ने 22 दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

9 नवंबर, 2023 को कोर्ट ने पीड़ित मनजीत कौर का बयान दर्ज किया था, जिन्होंने कहा था कि उन्होंने भीड़ के सदस्यों से सुना था कि हिंसा के दौरान सज्जन कुमार मौजूद थे, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने उन्हें मौके पर खुद नहीं देखा था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में उनके खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि उन्होंने 'राजनीतिक संरक्षण' के कारण दशकों तक न्याय से बचने की कोशिश की और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस सजा के खिलाफ उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

Point of View

जो यह दर्शाता है कि न्याय का आधार साक्ष्य और तथ्यों पर होना चाहिए। समाज में न्याय की उम्मीद को बनाए रखना आवश्यक है, और यह फैसला उस दिशा में एक कदम है।
NationPress
22/01/2026

Frequently Asked Questions

सज्जन कुमार को क्यों बरी किया गया?
सज्जन कुमार को बरी किया गया क्योंकि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था और गवाहों ने उनके खिलाफ कोई बयान नहीं दिया।
क्या सज्जन कुमार पर पहले भी आरोप लगे थे?
हाँ, सज्जन कुमार पर 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप लगे थे।
दिल्ली कोर्ट का फैसला क्या दर्शाता है?
दिल्ली कोर्ट का फैसला यह दर्शाता है कि न्याय की प्रक्रिया में साक्ष्य का होना आवश्यक है।
क्या सज्जन कुमार की सजा के खिलाफ अपील है?
हाँ, सज्जन कुमार की उम्रकैद की सजा के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
क्या इस मामले में कोई नया सबूत आया था?
नहीं, इस मामले में कोई नया सबूत या गवाह का बयान नहीं आया।
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