समीर का खुलासा: क्यों हर नया प्लेबैक सिंगर अरिजीत सिंह जैसा क्यों सुनाई देता है?
सारांश
मुख्य बातें
गीतकार समीर ने अपने पॉडकास्ट 'समीर का सफरनामा' में हिंदी फिल्म संगीत की बदलती पहचान पर एक तीखी टिप्पणी की थी, जिसका एक पुराना क्लिप अब सोशल मीडिया पर फिर से चर्चा में है। इस क्लिप में वे मशहूर प्लेबैक सिंगर जावेद अली के साथ बातचीत करते हुए यह सवाल उठाते हैं कि आज के दौर में अधिकांश गायक एक ही जैसे क्यों सुनाई देते हैं। उनके इस बयान ने संगीत प्रेमियों के बीच एक गहरी बहस छेड़ दी है।
समीर ने क्या कहा
क्लिप में गीतकार समीर कहते हैं, 'हिंदी फिल्म संगीत के दिग्गजों का अपना एक अलग रंग और अंदाज होता था। उस दौर के संगीतकारों, लेखकों और गायकों में एक खास बात हुआ करती थी, जो आज लगभग खत्म हो गई है।' उन्होंने सीधे तौर पर कहा, 'आजकल तो ऐसा लगता है जैसे हर कोई अरिजीत सिंह की तरह गा रहा हो।'
जावेद अली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'जब आप जैसे गायक गाते हैं, तो कुछ नयापन महसूस होता है, एक अलग तरह की आवाज और सुकून मिलता है। वरना, आज तो हर कोई एक जैसा ही लग रहा है। गाने की आवाज (साउंड) भी एक जैसी ही लगती है; आप कोई भी गाना सुन लें, सब एक जैसे ही सुनाई देते हैं।'
फिल्म निर्माण की लगन पर सवाल
समीर ने केवल आवाजों की एकरूपता तक बात सीमित नहीं रखी — उन्होंने संगीत के प्रति समर्पण भाव में आई गिरावट पर भी चिंता जताई। उनके शब्दों में, 'एक जैसी आवाज, एक जैसा साउंड। गाना या फिल्म बनाने के पीछे जो लगन और विश्वास होता था, वह कहीं खो गया है।' उन्होंने कहा कि आज का माहौल ऐसा है जहाँ 'हर कोई बस एक प्रपोजल तैयार कर रहा है, कोई फिल्म नहीं बना रहा।' उनके अनुसार, फिल्म बनाना एक सामूहिक कला है, फिर भी यह एक बहुत ही व्यक्तिगत अनुभव होता है — और इस दोहरे स्वभाव को आज की पीढ़ी नजरअंदाज कर रही है।
लता जी और किशोर दा की याद
गीतकार समीर ने पुराने दौर की रिकॉर्डिंग संस्कृति को याद करते हुए कहा कि उस समय सभी कलाकार साथ बैठते थे, 'जैम' करते थे, आपस में मिलते-जुलते थे और गाने पर गहन चर्चा होती थी। उन्होंने कहा, 'मैंने लता जी और किशोर दा को रिकॉर्डिंग के दौरान देखा है। वे गाने पर काम करते हुए खूब मजे करते थे, जैम करते थे और गाने के बारे में आपस में चर्चा करते थे।' इसके विपरीत, आज का चलन यह है कि गायक को बुलाया जाता है, वह गाना गाता है और चला जाता है — रचनात्मक संवाद की कोई जगह नहीं बचती।
संगीत जगत पर असर
यह ऐसे समय में सामने आया है जब हिंदी फिल्म संगीत में स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और एल्गोरिदम-आधारित श्रोता पसंद का दबाव लगातार बढ़ रहा है। आलोचकों का कहना है कि इस दबाव में निर्माता और संगीत निर्देशक सुरक्षित, 'ट्रेंडिंग' साउंड की ओर झुकते हैं, जो विविधता को कमज़ोर करता है। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में यह बहस कई मंचों पर उठ चुकी है, परंतु एक वरिष्ठ और अनुभवी गीतकार की ओर से इस तरह का प्रत्यक्ष बयान इसे नई प्रासंगिकता देता है।
आगे की राह
समीर के इस पुराने बयान का फिर से वायरल होना यह दर्शाता है कि संगीत की पहचान और विविधता को लेकर श्रोताओं में बेचैनी बनी हुई है। यह देखने वाली बात होगी कि क्या इंडस्ट्री के नए कलाकार और निर्माता इस आलोचना को रचनात्मक प्रेरणा के रूप में लेते हैं, या बाज़ार के सुरक्षित फॉर्मूले पर ही निर्भर रहते हैं।