चौंकाने वाला खुलासा: फ्लॉप फिल्म के बाद सतीश कौशिक ने सोची थी आत्महत्या, बोनी कपूर ने किया बड़ा खुलासा
सारांश
Key Takeaways
- सतीश कौशिक ने 1993 में फिल्म 'रूप की रानी चोरों का राजा' के फ्लॉप होने के बाद आत्महत्या का विचार किया था।
- फिल्म 16 अप्रैल 1993 को रिलीज हुई थी और यह अपने दौर की सबसे महंगी हिंदी फिल्मों में से एक थी।
- फिल्म में अनिल कपूर और श्रीदेवी मुख्य भूमिका में थे, कहानी जावेद अख्तर ने लिखी थी।
- निर्माता बोनी कपूर ने चैट शो 'जीना इसी का नाम है' में यह चौंकाने वाला खुलासा किया।
- सतीश कौशिक चलती कार से कूदने और होटल की पहली मंजिल से छलांग लगाने तक की बात कर रहे थे।
- मार्च 2023 में सतीश कौशिक के निधन के बाद यह किस्सा और भी भावनात्मक महत्व रखता है।
मुंबई — हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता और निर्देशक सतीश कौशिक एक समय इतने गहरे मानसिक संकट में डूब गए थे कि उन्होंने आत्महत्या तक का विचार कर लिया था। यह दर्दनाक दौर उनकी बहुचर्चित फिल्म 'रूप की रानी चोरों का राजा' के बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नाकाम रहने के बाद आया था। इस चौंकाने वाले खुलासे को खुद निर्माता बोनी कपूर ने एक सेलिब्रिटी चैट शो में सार्वजनिक किया।
करोड़ों की फिल्म और बड़े सितारे, फिर भी मिली करारी हार
'रूप की रानी चोरों का राजा' अपने दौर की सबसे महंगी हिंदी फिल्मों में शुमार थी। इसमें अनिल कपूर और श्रीदेवी मुख्य भूमिका में थे, जबकि अनुपम खेर, जॉनी लीवर और जैकी श्रॉफ जैसे दिग्गज कलाकार भी परदे पर नजर आए थे। फिल्म की कहानी मशहूर लेखक जावेद अख्तर ने लिखी थी। इसका निर्देशन सतीश कौशिक ने किया था और इसे बोनी कपूर ने प्रोड्यूस किया था।
यह फिल्म 16 अप्रैल 1993 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई, लेकिन दर्शकों और आलोचकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। भारी-भरकम बजट और स्टार-स्टडेड कास्ट के बावजूद फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप रही, जिसने पूरी टीम को हिलाकर रख दिया।
सतीश कौशिक का मानसिक टूटना और आत्महत्या का विचार
सेलिब्रिटी चैट शो 'जीना इसी का नाम है' में बोनी कपूर ने बताया कि फिल्म की असफलता के बाद सतीश कौशिक पूरी तरह अंदर से टूट गए थे। वह इतने निराश और हताश हो गए थे कि उन्होंने आत्महत्या तक के बारे में सोच लिया था।
बोनी कपूर ने बताया, ''सतीश चलती कार से कूदने तक के लिए तैयार थे। यही नहीं, होटल पहुंचने के बाद भी वह पहली मंजिल से छलांग लगाने की बात कर रहे थे।'' यह खुलासा बताता है कि फिल्म की विफलता ने सतीश कौशिक को किस कदर मानसिक रूप से तोड़ दिया था।
इसी दौरान सतीश कौशिक ने यह भी स्वीकार किया कि फिल्म के फ्लॉप होने के बाद उन्हें बोनी कपूर से यह पूछने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि टिकट खिड़की पर फिल्म का क्या हाल है।
मुश्किल पल में हास्य ने बचाई जान
हालांकि, सतीश कौशिक ने इस गंभीर वाकये को अपने चिरपरिचित मजाकिया अंदाज में भी बयान किया। उन्होंने बताया कि जब वह होटल की पहली मंजिल पर खड़े थे और नीचे कूदने की सोच रहे थे, तब नीचे खाने का इंतजाम किया गया था।
उनके मन में यह विचार आया कि अगर वह नीचे कूदे और खाने पर जा गिरे, तो लोग समझेंगे कि वह आत्महत्या के लिए नहीं बल्कि खाने के लिए कूदे हैं। इस मजाकिया सोच ने उस कठिन क्षण को हल्का बना दिया और शायद उनकी जान भी बचाई।
बॉलीवुड में फ्लॉप फिल्मों का मानसिक दबाव — एक व्यापक सच्चाई
सतीश कौशिक का यह किस्सा दरअसल हिंदी फिल्म उद्योग की एक बड़ी और अनदेखी सच्चाई को उजागर करता है। बॉलीवुड में सफलता और असफलता के बीच की खाई बेहद पतली है, और एक बड़ी फ्लॉप फिल्म न केवल करियर बल्कि निर्माता-निर्देशक की मानसिक सेहत को भी गहरा नुकसान पहुंचा सकती है।
गौरतलब है कि 1990 के दशक में बड़े बजट की फिल्मों में निवेश करना बेहद जोखिम भरा था, क्योंकि उस दौर में मल्टीप्लेक्स संस्कृति नहीं थी और ओटीटी प्लेटफॉर्म का कोई विकल्प भी मौजूद नहीं था। ऐसे में एक फिल्म की असफलता का पूरा बोझ सीधे निर्माता और निर्देशक पर आ जाता था।
आज के दौर में जब मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात होने लगी है, सतीश कौशिक जैसे दिग्गजों के ऐसे अनुभव यह याद दिलाते हैं कि चमक-दमक के पीछे कितना दर्द छिपा होता है। मार्च 2023 में सतीश कौशिक के निधन के बाद उनसे जुड़े ऐसे किस्से और भी भावनात्मक हो जाते हैं।
फिल्म उद्योग में मानसिक स्वास्थ्य सहायता और काउंसलिंग की जरूरत को लेकर अब धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है, और उम्मीद है कि आने वाले समय में इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।