क्या बीएचयू प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल ने पद्मश्री को 38 साल की मेहनत का नतीजा बताया?

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क्या बीएचयू प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल ने पद्मश्री को 38 साल की मेहनत का नतीजा बताया?

सारांश

बीएचयू के प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल ने कालाजार के उपचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी मेहनत के कारण उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। जानें कैसे उन्होंने इस रोग की पहचान और उपचार के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन किए।

Key Takeaways

  • श्याम सुंदर अग्रवाल ने कालाजार के उपचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • उन्होंने लिपिड आधारित लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी की एकल खुराक विकसित की।
  • उनका शोध मल्टी ड्रग थेरेपी पर आधारित है।
  • कालाजार की पहचान को 10 मिनट में करने की तकनीक विकसित की।
  • उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है।

वाराणसी, २५ जनवरी (राष्ट्र प्रेस) - कालाजार के उपचार में ऐतिहासिक योगदान देने वाले बीएचयू के प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल को पद्मश्री सम्मान की घोषणा की गई है। पुरस्कार की घोषणा के बाद प्रोफेसर अग्रवाल ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत करते हुए भारत सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया।

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म सम्मानों में बीएचयू के दो प्रोफेसरों का नाम शामिल है, जिनमें से एक श्याम सुंदर अग्रवाल हैं। प्रो. अग्रवाल ने भारतीय कालाजार उपचार में लिपिड आधारित लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी की एकल खुराक विकसित की, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा मान्यता प्राप्त हुई और इसे भारत के कालाजार नियंत्रण कार्यक्रम में शामिल किया गया।

उन्होंने कालाजार के लिए मल्टी ड्रग थेरेपी का सफल परीक्षण किया, जिसे डब्ल्यूएचओ ने अनुमोदित किया है। पेरेमोमाइसिन और मिल्टेफोसीन के संयोजन का उपयोग आज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर किया जा रहा है। इसके साथ ही मिल्टेफोसीन जैसी प्रभावी दवा के विकास और आरके-39 स्ट्रिप जांच के प्रारंभिक परीक्षण का श्रेय भी उन्हें जाता है।

श्याम सुंदर अग्रवाल ने राष्ट्र प्रेस से कहा, "मैं खुद को यूनिक नहीं मानता, बल्कि एक साधारण इंसान हूं। मैं बिहार, मुजफ्फरपुर से आता हूं, जहां कालाजार का प्रकोप बहुत अधिक था। लाखों मरीज होते थे, और हजारों की मौत होती थी। इन मरीजों के पास पैसे की कमी होती थी, और रोग का पता लगाने में ३-४ सप्ताह लग जाते थे, जो बहुत खर्चीला होता था। ८० के दशक में इस बीमारी का पता लगाने में ४०० से ५०० रुपए लगते थे।

मुझे लगा कि मैं इस क्षेत्र में कुछ कर सकता हूं। इसलिए हमने एक टेस्ट इजाद किया, जिसका मैंने परीक्षण किया। इसके बाद दुनिया में पहली बार हमने दिखाया कि कालाजार और इससे संबंधित बीमारियों की डायग्नोसिस में हफ्तों और महीनों का समय लगने के बजाय अब १० मिनट में होने लगी। यह इस सफलता का पहला कदम था।

कालाजार की बीमारी में उपयोग होने वाली दवाओं की स्थिति बहुत खराब थी। १०० मरीजों का इलाज होता था, तो उनमें से ३५-३६ मरीज ही ठीक होते थे, जिनमें से १२-१५ मरीज मर जाते थे। उस समय बीमारी में प्रयोग होने वाली दवा काम करना बंद कर चुकी थी। उस समय हमने बताया कि सिर्फ एक-तिहाई मरीज ही दवा से ठीक हो रहे हैं। इसके बाद १९९० के आस-पास सरकार ने कालाजार कंट्रोल प्रोग्राम निकाला था, जो सफल नहीं हो पाया। फिर दवा बदली गई और मैं भी उस पर हुई मीटिंग का हिस्सा था।

इसके बाद कालाजार की दवाओं पर कई शोध किए गए। २००२ में एक बड़ा शोध हुआ, जिसे मैंने लीड किया। लगभग ३०० मरीजों पर हुआ शोध ९४ प्रतिशत एक्यूरेट था, लेकिन दवा मुंह से लेने वाली थी। दवा को एक महीने लेना पड़ता था और इसकी भी अपनी कुछ परेशानियां थीं। इस क्षेत्र में मेरा लगभग ३८ साल का अनुभव रहा है।

Point of View

बल्कि यह समाज के लिए भी एक प्रेरणा है। उनका योगदान कालाजार जैसी गंभीर बीमारी के उपचार में महत्वपूर्ण है, जो लाखों लोगों को प्रभावित करती है। यह कहानी हमें यह याद दिलाती है कि विज्ञान और मानवीयता का मिलन कैसे समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
NationPress
11/02/2026

Frequently Asked Questions

श्याम सुंदर अग्रवाल ने किस रोग के उपचार में योगदान दिया?
उन्होंने कालाजार के उपचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
पद्मश्री सम्मान कब घोषित किया गया?
यह पुरस्कार गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित किया गया।
श्याम सुंदर अग्रवाल का शोध किन दवाओं पर आधारित है?
उनका शोध लिपिड आधारित लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी और मल्टी ड्रग थेरेपी पर आधारित है।
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