सिंघवी का आरोप: प्रदर्शनकारियों की हिरासत पूरी तरह गैर-कानूनी, शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार छीना
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने 11 अक्टूबर 2026 को प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की कार्रवाई को 'पूरी तरह गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक' करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और गांधीवादी तरीके से विरोध करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और विशेष सुरक्षा उपायों की आड़ में इसे नहीं कुचला जा सकता। सिंघवी के अनुसार, यह हिरासत निवारक प्रकृति की थी जबकि प्रदर्शनकारियों ने कोई अपराध नहीं किया था।
हिरासत पर सीधा हमला
एक कार्यक्रम के दौरान सिंघवी ने कहा, 'यह पूरी तरह से गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक है। उनका कुछ भी गलत करने का सवाल नहीं है। यह पहले से ही रोकथाम के लिए है। यह गांधीवादी तरीके से शांति से विरोध करने के बुनियादी अधिकार का पूरी तरह से हनन है। आप बहुत खास सुरक्षा उपायों के नाम पर ऐसा नहीं कर सकते।'
यह बयान ऐसे समय में आया है जब नागरिक स्वतंत्रता और पूर्व-निरोधात्मक हिरासत के इस्तेमाल को लेकर संवैधानिक विमर्श देशभर में तेज़ हो रहा है। गौरतलब है कि पूर्व-निरोधात्मक हिरासत की वैधता पर भारतीय न्यायपालिका भी कई मामलों में विस्तृत दिशानिर्देश दे चुकी है।
लोकतंत्र और न्यायपालिका पर टिप्पणी
सिंघवी ने कहा कि उनके अनुसार यह कार्रवाई एक व्यापक अभियान का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य 'राज्य के सभी अंगों के प्रमुखों' का ध्यान लोकतंत्र की नींव पर पड़ने वाले असर की ओर दिलाना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय को इसमें शामिल करने का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है — बल्कि यह न्यायपालिका को एक आवश्यक संस्था के रूप में देखने और उसके समक्ष एक विशेष दृष्टिकोण रखने की कोशिश है।
टाटा ट्रस्ट और अनुच्छेद 121 पर विश्लेषण
इसी कार्यक्रम में सिंघवी ने सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 121 उत्पीड़नकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि कंपनियों में निवेशक अपने हितों की रक्षा के लिए 'सकारात्मक मत' का प्रावधान रखते हैं, जो वास्तव में निषेधाधिकार का ही एक रूप है — अर्थात किसी भी निर्णय के लिए उनका मत अनिवार्य होता है।
उन्होंने छह टाटा ट्रस्टों का उदाहरण देते हुए कहा कि इनमें से दो कंपनियाँ हैं और बहुमत के लिए दोनों का मत आवश्यक है। उनके अनुसार, यदि केवल एक संस्था मतदान करे और दूसरी न करे, तो लिखित नियमों के अनुसार वह मत किसी विषय को आगे नहीं बढ़ा सकता।
निर्णायक मत पर विवाद
सिंघवी ने एक 'उल्लेखनीय' बिंदु की ओर ध्यान दिलाया — यदि मतदान अवरुद्ध हो जाए, तो निर्णय सक्रिय अध्यक्ष के निर्णायक मत से होता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति उस ट्रस्ट का हिस्सा नहीं है और मतदान समूह का भी हिस्सा नहीं है, उसकी इस प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए — और यही मूल समस्या है।
आगे क्या
कांग्रेस की ओर से प्रदर्शनकारियों की हिरासत को न्यायिक चुनौती देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सिंघवी के बयान से यह संकेत मिलता है कि पार्टी इस मुद्दे को संसद और अदालत — दोनों मंचों पर उठाने की तैयारी में है।