12 अक्टूबर 2026
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सिंघवी का आरोप: प्रदर्शनकारियों की हिरासत पूरी तरह गैर-कानूनी, शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार छीना

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सिंघवी का आरोप: प्रदर्शनकारियों की हिरासत पूरी तरह गैर-कानूनी, शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार छीना

सारांश

कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रदर्शनकारियों की हिरासत को गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक बताते हुए कहा कि यह गांधीवादी विरोध के बुनियादी अधिकार का हनन है। साथ ही टाटा ट्रस्ट मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और मतदान प्रक्रिया पर भी उन्होंने तीखे सवाल उठाए।

मुख्य बातें

कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने 11 अक्टूबर 2026 को प्रदर्शनकारियों की हिरासत को 'पूरी तरह गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक' करार दिया।
उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई पूर्व-निरोधात्मक है और गांधीवादी शांतिपूर्ण विरोध के मौलिक अधिकार का हनन करती है।
सिंघवी ने इसे एक 'व्यापक अभियान' का हिस्सा बताया, जिसका उद्देश्य लोकतंत्र की नींव पर पड़ने वाले असर की ओर ध्यान दिलाना है।
सर्वोच्च न्यायालय के अनुच्छेद 121 संबंधी निर्णय का हवाला देते हुए उन्होंने टाटा ट्रस्ट में मतदान प्रक्रिया और सक्रिय अध्यक्ष के निर्णायक मत की भूमिका पर सवाल उठाए।
उनके अनुसार, छह टाटा ट्रस्टों में से दो कंपनियाँ हैं और दोनों का मत न मिलने पर कोई भी निर्णय आगे नहीं बढ़ सकता।

कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने 11 अक्टूबर 2026 को प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की कार्रवाई को 'पूरी तरह गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक' करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और गांधीवादी तरीके से विरोध करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और विशेष सुरक्षा उपायों की आड़ में इसे नहीं कुचला जा सकता। सिंघवी के अनुसार, यह हिरासत निवारक प्रकृति की थी जबकि प्रदर्शनकारियों ने कोई अपराध नहीं किया था।

हिरासत पर सीधा हमला

एक कार्यक्रम के दौरान सिंघवी ने कहा, 'यह पूरी तरह से गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक है। उनका कुछ भी गलत करने का सवाल नहीं है। यह पहले से ही रोकथाम के लिए है। यह गांधीवादी तरीके से शांति से विरोध करने के बुनियादी अधिकार का पूरी तरह से हनन है। आप बहुत खास सुरक्षा उपायों के नाम पर ऐसा नहीं कर सकते।'

यह बयान ऐसे समय में आया है जब नागरिक स्वतंत्रता और पूर्व-निरोधात्मक हिरासत के इस्तेमाल को लेकर संवैधानिक विमर्श देशभर में तेज़ हो रहा है। गौरतलब है कि पूर्व-निरोधात्मक हिरासत की वैधता पर भारतीय न्यायपालिका भी कई मामलों में विस्तृत दिशानिर्देश दे चुकी है।

लोकतंत्र और न्यायपालिका पर टिप्पणी

सिंघवी ने कहा कि उनके अनुसार यह कार्रवाई एक व्यापक अभियान का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य 'राज्य के सभी अंगों के प्रमुखों' का ध्यान लोकतंत्र की नींव पर पड़ने वाले असर की ओर दिलाना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय को इसमें शामिल करने का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है — बल्कि यह न्यायपालिका को एक आवश्यक संस्था के रूप में देखने और उसके समक्ष एक विशेष दृष्टिकोण रखने की कोशिश है।

टाटा ट्रस्ट और अनुच्छेद 121 पर विश्लेषण

इसी कार्यक्रम में सिंघवी ने सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 121 उत्पीड़नकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि कंपनियों में निवेशक अपने हितों की रक्षा के लिए 'सकारात्मक मत' का प्रावधान रखते हैं, जो वास्तव में निषेधाधिकार का ही एक रूप है — अर्थात किसी भी निर्णय के लिए उनका मत अनिवार्य होता है।

उन्होंने छह टाटा ट्रस्टों का उदाहरण देते हुए कहा कि इनमें से दो कंपनियाँ हैं और बहुमत के लिए दोनों का मत आवश्यक है। उनके अनुसार, यदि केवल एक संस्था मतदान करे और दूसरी न करे, तो लिखित नियमों के अनुसार वह मत किसी विषय को आगे नहीं बढ़ा सकता।

निर्णायक मत पर विवाद

सिंघवी ने एक 'उल्लेखनीय' बिंदु की ओर ध्यान दिलाया — यदि मतदान अवरुद्ध हो जाए, तो निर्णय सक्रिय अध्यक्ष के निर्णायक मत से होता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति उस ट्रस्ट का हिस्सा नहीं है और मतदान समूह का भी हिस्सा नहीं है, उसकी इस प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए — और यही मूल समस्या है।

आगे क्या

कांग्रेस की ओर से प्रदर्शनकारियों की हिरासत को न्यायिक चुनौती देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सिंघवी के बयान से यह संकेत मिलता है कि पार्टी इस मुद्दे को संसद और अदालत — दोनों मंचों पर उठाने की तैयारी में है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसमें एक संरचनात्मक कमज़ोरी है — वे जिस 'प्रदर्शन' और 'हिरासत' की बात कर रहे हैं, उसका संदर्भ स्पष्ट नहीं किया गया। बिना उस संदर्भ के यह बयान कानूनी आधार से अधिक राजनीतिक स्थापना बन जाता है। दूसरा, एक ही कार्यक्रम में नागरिक स्वतंत्रता और टाटा ट्रस्ट की जटिल कॉर्पोरेट गवर्नेंस पहेली को एक साथ रखना — मीडिया के लिए असल संदेश को धुंधला कर देता है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस द्वंद्व को नज़रअंदाज़ करती है।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रदर्शनकारियों की हिरासत को गैर-कानूनी क्यों बताया?
सिंघवी के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने कोई अपराध नहीं किया था और उनकी हिरासत पूर्व-निरोधात्मक थी, जो संविधान में दिए गए शांतिपूर्ण विरोध के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि विशेष सुरक्षा उपायों की आड़ में इस अधिकार को नहीं छीना जा सकता।
शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भारतीय संविधान में कहाँ से मिलता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का अधिकार देता है। सिंघवी के अनुसार, किसी भी नागरिक को गांधीवादी और अहिंसक तरीके से विरोध करने से रोकना इस अधिकार का सीधा हनन है।
टाटा ट्रस्ट और अनुच्छेद 121 पर सिंघवी का क्या कहना था?
सिंघवी ने सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय का हवाला दिया जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद 121 उत्पीड़नकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि छह टाटा ट्रस्टों में से दो कंपनियाँ हैं और यदि दोनों का मत न मिले तो कोई विषय आगे नहीं बढ़ सकता, और ऐसी स्थिति में सक्रिय अध्यक्ष के निर्णायक मत की भूमिका विवादास्पद है।
कांग्रेस इस मुद्दे को आगे कैसे उठाएगी?
सिंघवी के बयान से संकेत मिलता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को एक व्यापक अभियान के तहत संसद और न्यायपालिका — दोनों मंचों पर उठाने की तैयारी में है। उनके अनुसार, न्यायपालिका के समक्ष यह विशेष दृष्टिकोण रखना किसी राजनीतिक मंशा से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मज़बूत करने की नीयत से है।
पूर्व-निरोधात्मक हिरासत क्या होती है और यह क्यों विवादास्पद है?
पूर्व-निरोधात्मक हिरासत वह कार्रवाई है जिसमें किसी व्यक्ति को अपराध करने से पहले ही हिरासत में ले लिया जाता है। यह कानूनी रूप से विवादास्पद है क्योंकि यह 'निर्दोष साबित होने तक निर्दोष' के सिद्धांत के विरुद्ध जाती है और इसके दुरुपयोग की आशंका रहती है।
राष्ट्र प्रेस
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