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मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करना असंवैधानिक — सीईसी से मुलाकात के बाद बोले सिंघवी

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मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करना असंवैधानिक — सीईसी से मुलाकात के बाद बोले सिंघवी

सारांश

कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने पर पार्टी सीधे चुनाव आयोग के दरवाज़े पहुँची। सिंघवी का तर्क है कि जिस आपराधिक मामले का हवाला दिया गया, वह कानूनी रूप से अस्तित्व में ही नहीं था — मजिस्ट्रेट ने संज्ञान तक नहीं लिया। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक बराबरी का सवाल बन गया है।

मुख्य बातें

कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने 10 जून को मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात कर मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करने के फैसले को चुनौती दी।
अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर का आदेश कानूनी रूप से निराधार है — जिस आपराधिक मामले का उल्लेख किया गया, उसमें मजिस्ट्रेट ने अभी तक संज्ञान तक नहीं लिया।
चुनाव आयोग के कानून के अनुसार खुलासा केवल उन मामलों में अनिवार्य है जिनमें दो वर्ष से अधिक की सज़ा हो और चार्जेस फ्रेम हो चुके हों।
कांग्रेस ने कहा कि इस मामले में आगे अभी तीन चरण — संज्ञान, जाँच, चार्जशीट — बाकी हैं।
प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से तत्काल आरओ का आदेश निरस्त करने का अनुरोध किया।

कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के विरोध में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार, 10 जून को नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों से मुलाकात की। बैठक के बाद कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह फैसला संविधान और उसके मूल सिद्धांतों के सर्वथा विरुद्ध है।

प्रतिनिधिमंडल की संरचना और मुलाकात का उद्देश्य

कांग्रेस के इस प्रतिनिधिमंडल में अभिषेक मनु सिंघवी, विवेक तन्खा, रणदीप सिंह सुरजेवाला, जयराम रमेश, दीपा दासमुंशी, भूपेश बघेल और स्वयं मीनाक्षी नटराजन शामिल थे। प्रतिनिधिमंडल ने भारत निर्वाचन आयोग के समक्ष विस्तृत तथ्य और आंकड़े रखे तथा रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) के आदेश को कानूनी रूप से निराधार बताया।

नामांकन रद्द करने का आधार क्यों है गलत

सिंघवी ने स्पष्ट किया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने जिस आधार पर नामांकन रद्द किया, वह आधार कानून में अस्तित्व में ही नहीं है। उनके अनुसार, मीनाक्षी नटराजन के विरुद्ध कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था — अदालत से केवल एक नोटिस आया था, जिसमें उनसे यह बताने को कहा गया था कि मजिस्ट्रेट मामले का संज्ञान लें या नहीं।

सिंघवी ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग के कानून के अनुसार उम्मीदवार को केवल उन्हीं मामलों का खुलासा करना होता है जिनमें अपराध सिद्ध होने पर दो वर्ष से अधिक की सज़ा का प्रावधान हो और चार्जेस फ्रेम हो चुके हों। उन्होंने बताया कि इस मामले में मजिस्ट्रेट ने अभी तक संज्ञान तक नहीं लिया है, जबकि आगे अभी तीन और चरण — संज्ञान, जाँच और चार्जशीट — बाकी हैं। बावजूद इसके, आरओ ने मान लिया कि एक आपराधिक मामला लंबित है।

संवैधानिक सिद्धांतों पर चोट का आरोप

सिंघवी ने कहा, 'राज्यसभा के लिए चुने गए व्यक्ति को शुरुआत में ही हटाया नहीं जा सकता — यह संविधान और उसके सिद्धांतों के खिलाफ है। इससे बराबरी का मौका नहीं मिलता।' उन्होंने आगे कहा कि किसी को दौड़ शुरू होने से पहले ही बाहर कर देना लोकतंत्र की नींव पर सीधी चोट है और संविधान के मूल ढाँचे को विकृत करता है।

यह ऐसे समय में आया है जब राज्यसभा चुनावों में नामांकन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। गौरतलब है कि चुनाव आयोग इससे पहले हरियाणा और गुजरात के मामलों में आरओ के फैसलों में हस्तक्षेप कर चुका है।

चुनाव आयोग से तत्काल कार्रवाई की माँग

प्रतिनिधिमंडल ने भारत निर्वाचन आयोग से अनुरोध किया कि वह अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए आरओ के आदेश को तत्काल रद्द करे। सिंघवी ने कहा कि नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि से पहले काफी समय है और आयोग के पास यह फैसला पलटने का पूरा अधिकार है। उन्होंने इस आदेश को 'पूरी तरह गलत, स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी और बिना किसी कानूनी आधार वाला' बताते हुए इसे तुरंत निरस्त करने की माँग की।

अब सबकी निगाहें भारत निर्वाचन आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं — क्या आयोग आरओ के विवादित आदेश को पलटेगा, यह आने वाले घंटों में स्पष्ट होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो आरओ ने एक ऐसे आधार पर नामांकन रद्द किया जो कानूनी रूप से अस्तित्व में था ही नहीं — यह गंभीर प्रक्रियागत चूक है। चुनाव आयोग का हरियाणा और गुजरात में हस्तक्षेप का पूर्व उदाहरण यह दर्शाता है कि वह निष्क्रिय नहीं है; अब परीक्षा यह है कि क्या वह राजनीतिक दबाव से परे, कानूनी तर्क के आधार पर फैसला करेगा। लोकतंत्र में चुनावी समानता का सिद्धांत तभी अर्थपूर्ण है जब नामांकन की पात्रता स्पष्ट, पारदर्शी और कानूनसम्मत मानकों पर तय हो।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन क्यों रद्द किया गया?
रिटर्निंग ऑफिसर ने एक कथित आपराधिक मामले के आधार पर नामांकन रद्द किया। कांग्रेस का कहना है कि उस मामले में मजिस्ट्रेट ने अभी तक संज्ञान भी नहीं लिया था, इसलिए कानूनी रूप से कोई आपराधिक मामला लंबित था ही नहीं।
अभिषेक मनु सिंघवी ने चुनाव आयोग से क्या माँग की?
सिंघवी ने भारत निर्वाचन आयोग से तत्काल रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश को निरस्त करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि आयोग के पास पूरा अधिकार क्षेत्र है और वह पहले भी हरियाणा और गुजरात में ऐसे हस्तक्षेप कर चुका है।
चुनाव कानून के तहत राज्यसभा उम्मीदवार को किन मामलों का खुलासा करना होता है?
चुनाव आयोग के कानून के अनुसार उम्मीदवार को केवल उन मामलों का खुलासा करना होता है जिनमें अपराध सिद्ध होने पर दो वर्ष से अधिक की सज़ा हो और चार्जेस फ्रेम हो चुके हों। महज़ अदालती नोटिस या संज्ञान-पूर्व स्थिति इस दायरे में नहीं आती।
क्या चुनाव आयोग रिटर्निंग ऑफिसर का फैसला पलट सकता है?
हाँ, कांग्रेस के अनुसार चुनाव आयोग के पास आरओ के आदेश को रिवर्स करने या निरस्त करने का पूरा अधिकार क्षेत्र है। आयोग इससे पहले हरियाणा और गुजरात के मामलों में भी हस्तक्षेप कर चुका है।
कांग्रेस के किन नेताओं ने चुनाव आयोग से मुलाकात की?
10 जून को चुनाव आयोग से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में अभिषेक मनु सिंघवी, विवेक तन्खा, रणदीप सिंह सुरजेवाला, जयराम रमेश, दीपा दासमुंशी, भूपेश बघेल और मीनाक्षी नटराजन स्वयं शामिल थीं।
राष्ट्र प्रेस
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