मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, नामांकन रद्द मामले में याचिका खारिज
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 12 जून 2026 को मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उनका नामांकन पत्र रद्द किए जाने को चुनौती दी गई थी। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस चंदूरकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नामांकन रद्द होने के बाद हाईकोर्ट में इलेक्शन पिटीशन ही एकमात्र विधिसम्मत रास्ता है।
मुख्य घटनाक्रम
नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी करते हुए तर्क दिया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने कानून की अनदेखी कर मनमाना फैसला लिया। उन्होंने कहा कि जिस निजी शिकायत के आधार पर नामांकन रद्द किया गया, उसमें अभी तक कोई आरोप तय नहीं हुआ है और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट) के अनुसार आरोप तय होने से पहले नामांकन पत्र में उसकी घोषणा अनिवार्य नहीं है।
सिंघवी ने यह भी बताया कि शिकायत में जो घटना का समय बताया गया है, उस वक्त मीनाक्षी नटराजन तेलंगाना की प्रभारी नहीं थीं — यह उनकी नियुक्ति से तीन साल पहले की बात है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के बजाय इस मामले में उसे समाप्त किया गया।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
जस्टिस मिश्रा ने पूछा कि ऐसा कोई उदाहरण दिखाया जाए जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने संसदीय या विधायी चुनाव में रिटर्निंग ऑफिसर के नामांकन-रद्द आदेश को पलटा हो। उन्होंने दोहराया कि न्यायालय की स्थापित राय है कि एक बार नामांकन रद्द होने पर — सही हो या गलत — इलेक्शन पिटीशन ही एकमात्र उपाय है।
अदालत ने पहले यह भी तय किया कि याचिका मेंटेनेबल है या नहीं, इस पर विचार करने के बाद ही आगे बढ़ा जाएगा — और अंततः याचिका को स्वीकार करने योग्य नहीं पाया।
अन्य पक्षों की दलीलें
विजयी प्रत्याशी महेश केवट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि 2018 के संशोधन के बाद से हर प्रकार के लंबित आपराधिक मामलों — चाहे संज्ञान लिया गया हो या नहीं — की घोषणा अनिवार्य है। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ और अनुच्छेद 32 या 226 के तहत यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि आरपी एक्ट की धारा 100(1सी) के अनुसार यह मामला हाईकोर्ट में इलेक्शन पिटीशन के जरिए सुना जाना चाहिए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 53(3) के तहत जब उम्मीदवारों की संख्या सीटों से कम हो, तो परिणाम तत्काल घोषित करना अनिवार्य है।
सिंघवी का आरोप और चुनाव आयोग पर सवाल
सिंघवी ने कहा कि उन्हें सुनवाई के दिन अदालत में नहीं सुना गया, जिसके परिणामस्वरूप कोई चुनाव नहीं हुआ और दूसरा प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिया गया। उन्होंने इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण मामले का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव में 'लेवल प्लेइंग फील्ड' सुनिश्चित होना संवैधानिक जरूरत है। चुनाव आयोग की चुप्पी को उन्होंने 'निंदनीय' करार दिया।
आगे का रास्ता
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन के पास अब हाईकोर्ट में इलेक्शन पिटीशन दाखिल करने का विकल्प खुला है। यह मामला जन प्रतिनिधित्व कानून की व्याख्या और नामांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता के सवालों को नए सिरे से उठाता है।