सोनम वांगचुक का केंद्र पर वादाखिलाफी का आरोप, 22 अक्टूबर की MHA बैठक नहीं हुई; लद्दाख राज्य दर्जे की मांग दोहराई
सारांश
मुख्य बातें
लद्दाख के著名 सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 22 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि गृह मंत्रालय (MHA) के साथ इसी तारीख के लिए तय की गई बैठक बिना किसी सूचना के रद्द कर दी गई। वांगचुक के अनुसार, 15 अक्टूबर को हुई पिछली बातचीत में स्वयं अधिकारियों ने 22 अक्टूबर को दोबारा मिलने का प्रस्ताव रखा था और लद्दाखी प्रतिनिधियों को नई दिल्ली आने के लिए कहा था। यह मामला महज एक रद्द बैठक तक सीमित नहीं है — यह 2019 से लद्दाख की जनता से किए गए संवैधानिक वादों की पूर्ति न होने का ताज़ा अध्याय है।
बैठक रद्द होने का घटनाक्रम
वांगचुक ने बताया कि 15 अक्टूबर की बातचीत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। जब वार्ता आगे नहीं बढ़ी तो उन्होंने अगले ही दिन बैठक का सुझाव दिया, परंतु अधिकारियों ने अपनी अन्य प्रतिबद्धताओं का हवाला देकर 22 अक्टूबर की तारीख तय की। इसी आधार पर वांगचुक और अन्य लद्दाखी नेताओं ने यात्रा की योजना बनाई और टिकट बुक कराए। दिल्ली पहुँचने पर उन्हें बताया गया कि बैठक के बारे में किसी को जानकारी नहीं है। उन्होंने इसके बाद इस मामले को सार्वजनिक रूप से उठाने का निर्णय लिया।
मुख्य मांगें और संवैधानिक आधार
वांगचुक ने लद्दाख के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग दोहराई। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि संसाधन और राजस्व सीमाओं के कारण यह संभव न हो, तो कम से कम विधानसभा सहित केंद्र शासित प्रदेश और छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा उपाय मिलने चाहिए। उनके अनुसार, 22 मई को इस विकल्प पर सहमति बनी थी, लेकिन अब सरकार उससे भी पीछे हटकर सीमित शक्तियों वाली परिषदों की बात कर रही है। उन्होंने इसे लद्दाख की जनता के साथ अन्याय करार दिया।
अरुणाचल प्रदेश की तुलना और UN का हवाला
वांगचुक ने तर्क दिया कि अरुणाचल प्रदेश को संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र होने के बावजूद पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया था और तब यह माना गया था कि रणनीतिक सीमा क्षेत्र में लोकतांत्रिक व्यवस्था ज़रूरी है। उनका सवाल था कि यही तर्क लद्दाख पर क्यों लागू नहीं होता। इसके अतिरिक्त उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के आदिवासी लोगों के अधिकारों से संबंधित घोषणापत्र का उल्लेख किया, जिस पर भारत ने 2007 में हस्ताक्षर किए थे, और कहा कि लद्दाख की जनजातीय आबादी को इसके तहत अपना भविष्य तय करने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र तक ले जाने पर विचार का भी संकेत दिया।
उपराज्यपाल के फैसलों पर सवाल
वांगचुक ने उपराज्यपाल के स्तर पर नए जिलों और जिला परिषदों से संबंधित एकतरफा निर्णयों पर भी आपत्ति जताई। उनके अनुसार, प्रस्तावित परिषदों की शक्तियाँ पहले की परिषदों से भी कम हैं और भूमि तथा रोजगार जैसे महत्त्वपूर्ण मामलों में इन परिषदों का अधिकार सीमित रखा जा रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब विधानसभा की मांग अभी भी लंबित है और स्थानीय परामर्श के बिना चुनावों की तैयारी की जा रही है।
आगे क्या होगा
वांगचुक ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह लद्दाख की मांगों को गंभीरता से ले और लोगों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाए। उन्होंने देशवासियों से भी अपील की कि वे लद्दाख की परिस्थितियों को समझें। गौरतलब है कि 2019 में जम्मू-कश्मीर के विभाजन के बाद से लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बिना विधानसभा के चल रहा है, और राज्य दर्जे की माँग तब से लगातार उठती रही है। अब वार्ता की यह विफलता आंदोलन को नए मोड़ पर ला सकती है।