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सोनम वांगचुक बोले — गृह मंत्रालय फिर वादे से पीछे हटा, लद्दाख के लोग दुखी हैं

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सोनम वांगचुक बोले — गृह मंत्रालय फिर वादे से पीछे हटा, लद्दाख के लोग दुखी हैं

सारांश

सोनम वांगचुक का आरोप — 15 अक्टूबर की लेह वार्ता विफल रही, 22 अक्टूबर की दिल्ली बैठक भी टली। छठी अनुसूची और विधानसभा के वादे पर केंद्र सरकार बार-बार पीछे हट रही है, और लद्दाख की जनता गहरी निराशा में है।

मुख्य बातें

सोनम वांगचुक ने 22 अक्टूबर 2026 को एक्स पर वीडियो जारी कर गृह मंत्रालय पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया।
15 अक्टूबर को लेह में हुई बातचीत विफल रही थी; 22 अक्टूबर की दिल्ली बैठक भी कथित तौर पर टाली गई।
मुख्य माँगें: छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और लद्दाख में विधानसभा का गठन।
10 अक्टूबर को वांगचुक ने दिल्ली प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर चिंता जताई थी।
वांगचुक ने लद्दाख भवन में पत्रकारों से मिलकर जनता की व्यथा सार्वजनिक करने की बात कही।

सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 22 अक्टूबर 2026 को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर वीडियो पोस्ट कर बताया कि गृह मंत्रालय के साथ नई दिल्ली में होने वाली बातचीत एक बार फिर टाली जा रही है, और इसके लिए केंद्र सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वे लद्दाख भवन पहुँचकर पत्रकारों के सामने लद्दाख की जनता की पीड़ा रखेंगे।

मुख्य घटनाक्रम

वांगचुक ने अपने वीडियो में स्पष्ट किया कि 15 अक्टूबर को लेह में हुई पिछली बातचीत पूरी तरह विफल रही थी। उन्होंने कहा, 'उस बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला क्योंकि केंद्र सरकार अपने वादों से पीछे हट गई।' इसके बाद तय हुआ था कि 22 अक्टूबर को दिल्ली में फिर से बैठक होगी, किंतु उन्हें अब बताया गया है कि यह बैठक भी शायद नहीं होगी।

वांगचुक ने कहा कि उन्होंने इसी बातचीत के आधार पर अपनी यात्रा की टिकट कराई थी और दिल्ली में अन्य बैठकें भी तय की थीं। उनके अनुसार, यह सिलसिला नया नहीं है — केंद्र सरकार बार-बार अपने वादों से मुकर रही है।

किन वादों पर उठे सवाल

वांगचुक ने दो प्रमुख मुद्दों का ज़िक्र किया — छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत संवैधानिक सुरक्षा का वादा और लद्दाख में विधानसभा गठन का आश्वासन। उनका कहना है कि ये दोनों माँगें लद्दाख की जनता की सांविधानिक पहचान और स्वशासन से जुड़ी हैं, जिन पर केंद्र का रुख अस्पष्ट बना हुआ है।

यह ऐसे समय में आया है जब 5 अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर से लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद से वहाँ के स्थानीय निवासी राज्य का दर्जा और विधायी प्रतिनिधित्व की माँग करते आ रहे हैं।

पिछली पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 10 अक्टूबर को वांगचुक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर गहरी चिंता जताई थी। कथित तौर पर उन्होंने आरोप लगाया था कि देश के सबसे बड़े लोकतंत्र में 'अघोषित आपातकाल' जैसी स्थिति बन रही है।

यह कोई पहली बार नहीं है जब वांगचुक किसी आंदोलन के जरिए लद्दाख के मुद्दे को राष्ट्रीय पटल पर लाने की कोशिश कर रहे हों। वे पहले भी अनशन और पदयात्रा जैसे विरोध के तरीके अपना चुके हैं।

लद्दाख की जनता पर असर

वांगचुक ने कहा, 'यहाँ के लोग काफी दुखी हैं।' लद्दाख में छठी अनुसूची की अनुपस्थिति का सीधा अर्थ यह है कि स्थानीय जनजातीय समुदायों को भूमि, संस्कृति और रोजगार के मामले में वह सांविधानिक ढाल नहीं मिलती जो देश के अन्य जनजातीय बहुल क्षेत्रों को मिली है।

विशेषज्ञों के अनुसार, लद्दाख का भूगोल और सामरिक महत्व उसे एक असाधारण क्षेत्र बनाता है, जहाँ शासन-संरचना की कमी स्थानीय विकास और पहचान दोनों को प्रभावित करती है।

आगे क्या होगा

वांगचुक ने संकेत दिया कि वे लद्दाख भवन में पत्रकारों से मिलकर जनता की माँगें सार्वजनिक करेंगे और उम्मीद जताई कि सरकार जल्द बातचीत के लिए आगे आएगी। यह देखना होगा कि क्या मीडिया और जन-दबाव के बाद गृह मंत्रालय नई तारीख निर्धारित करता है या मामला और लंबा खिंचता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी पुनरावृत्ति एक गहरी संस्थागत समस्या की ओर इशारा करती है — केंद्र सरकार के साथ बातचीत की कोई विश्वसनीय रूपरेखा नहीं है। 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होने के बाद लद्दाख को 'विशेष दर्जे' के जो मौखिक आश्वासन मिले, वे अब तक लिखित प्रतिबद्धता नहीं बन पाए। छठी अनुसूची और विधानसभा की माँगें तकनीकी नहीं, सांविधानिक हैं — और इन्हें बार-बार टालना उस क्षेत्र को राजनीतिक रूप से अनाथ छोड़ने जैसा है जो देश की सामरिक सीमाओं पर सबसे पहले खड़ा है। मुख्यधारा की मीडिया कवरेज जो चूकती है वह यह है कि यह केवल एक कार्यकर्ता का आंदोलन नहीं, बल्कि एक पूरे क्षेत्र की शासन-शून्यता की पुकार है।
RashtraPress
22 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सोनम वांगचुक गृह मंत्रालय से क्या माँग रहे हैं?
वांगचुक मुख्य रूप से दो माँगें रख रहे हैं — लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत जनजातीय संवैधानिक सुरक्षा और लद्दाख में एक निर्वाचित विधानसभा का गठन। ये माँगें 2019 में लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से लंबित हैं।
15 अक्टूबर की लेह वार्ता क्यों विफल हुई?
वांगचुक के अनुसार, 15 अक्टूबर को लेह में हुई बातचीत इसलिए विफल रही क्योंकि केंद्र सरकार अपने पहले किए वादों से पीछे हट गई। बातचीत का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला और मामला अनिर्णीत रहा।
22 अक्टूबर को दिल्ली में क्या होने वाला था?
लेह वार्ता की विफलता के बाद 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में गृह मंत्रालय के साथ एक नई बैठक तय की गई थी। वांगचुक के अनुसार, उन्हें बाद में बताया गया कि यह बैठक भी शायद नहीं होगी।
10 अक्टूबर को वांगचुक का दिल्ली में क्या विरोध था?
10 अक्टूबर को वांगचुक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर चिंता जताई थी। उन्होंने कथित तौर पर इसे 'अघोषित आपातकाल' जैसी स्थिति बताया था।
लद्दाख में छठी अनुसूची क्यों ज़रूरी मानी जाती है?
भारत के संविधान की छठी अनुसूची जनजातीय बहुल क्षेत्रों को भूमि, संस्कृति और स्वशासन पर विशेष सांविधानिक सुरक्षा देती है। लद्दाख के स्थानीय निवासी चाहते हैं कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद भी उन्हें यह सुरक्षा मिले ताकि बाहरी खरीद-फरोख्त और सांस्कृतिक क्षरण से उनकी पहचान बची रहे।
राष्ट्र प्रेस
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