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क्या सुभाष घई ने फिल्मों में आने वाले बदलाव को लेकर अपनी राय रखी?

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क्या सुभाष घई ने फिल्मों में आने वाले बदलाव को लेकर अपनी राय रखी?

सारांश

सुभाष घई, जो कि सिनेमा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नाम हैं, ने हाल ही में अपने अनुभव और दृष्टिकोण को साझा किया। उन्होंने फिल्ममेकिंग, शिक्षा और वर्तमान समय के ट्रेंड्स पर चर्चा की। उनकी विचारधाराएं सिनेमा की बदलती दुनिया को समझने में मदद करती हैं।

मुख्य बातें

सुभाष घई का अनुभव सिनेमा और शिक्षा में महत्वपूर्ण है।
फिल्ममेकिंग और टीचिंग का आपसी संबंध है।
व्हिसलेवुड फिल्म स्कूल ने युवा टैलेंट को मार्गदर्शन दिया है।
हर ३० साल में नए क्रिएटर्स सामने आते हैं।
सिनेमा का बदलता ट्रेंड समाज की आवाज है।

मुंबई, २४ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। सुभाष घई एक ऐसे फिल्मकार हैं, जिनकी फिल्मों में ग्लैमर, ड्रामा और कहानी का बेहतरीन मेल देखने को मिलता है। वे अक्सर अपनी फिल्मों के माध्यम से लोगों के लिए खास मैसेज भी लेकर आते हैं। निर्देशक ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में सिनेमा, शिक्षा और आज के ट्रेंड्स पर अपनी राय रखी।

सुभाष ने बताया कि फिल्ममेकिंग और टीचिंग एक दूसरे को कैसे बेहतर बनाते हैं। साथ ही उन्होंने रीमेक गानों के चलन और बॉक्स ऑफिस पर एक्शन फिल्मों की धूम पर भी बात की।

घई ने कहा कि उनके पास सिनेमा में ५० साल और शिक्षा के क्षेत्र में २५ साल का अनुभव है। उन्होंने कहा, "५५ साल पहले मैं पुणे के एफटीआईआई में स्टूडेंट था। वहां एक्टिंग कोर्स किया और विश्व सिनेमा को गहराई से समझा। फिर, वहां से निकलकर तीन साल एक्टर के तौर पर काम किया, और बाद में राइटर, डायरेक्टर, और फिर प्रोड्यूसर बन गए।"

उन्होंने कुल १८-१९ फिल्में बनाईं। इनमें से १४-१५ हिट रहीं और ४-५ फ्लॉप हुईं। बाद में वे अपनी कंपनी को आईपीओ में ले गए, डिस्ट्रीब्यूटर बने, एग्जिबिटर (थिएटर ओनर) बने और फिर व्हिसलेवुड नाम का फिल्म स्कूल शुरू किया।

व्हिसलेवुड खोलने की वजह बताते हुए घई ने कहा, "बॉम्बे आने के बाद कई स्टूडेंट भटक जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता है कि स्टूडियो कहां हैं, किससे मिलना है, और टैलेंट कैसे दिखाना है। इसलिए हमने यह स्कूल बनाया। बच्चे यहां २-३ साल रहें, एक्सपर्ट्स से जुड़ें, प्रैक्टिस करें, और फिर इंडस्ट्री में एंट्री लें।"

आजकल क्लासिक गानों और पुरानी फिल्मों के री-क्रिएशन का ट्रेंड चल रहा है। इस पर घई ने कहा कि हर क्रिएटिव काम अपने समय के हिसाब से अच्छा होता है। मोजार्ट-बीथोवेन से लेकर फाल्के, विशाल भारद्वाज, के.एल. सैगल, महबूब खान, गुरु दत्त, बिमल रॉय, विजय आनंद, मनोज कुमार और प्रकाश मेहरा तक हर दौर में नए क्रिएटर्स आए। हर ३० साल बाद नए डायरेक्टर और राइटर आते हैं।

उन्होंने कहा, "सिनेमा समाज का आईना है। लोग बदलते हैं, समय बदलता है, मुद्दे बदलते हैं, तो ड्रामा, एक्सप्रेशन और कहानी का तरीका भी बदलेगा। ८०-९० के दशक का नैरेटिव आज का नहीं रहा। डिजिटल युग में ओटीटी, वेब सीरीज और टीवी जैसे कई प्लेटफॉर्म आ गए हैं। अब क्रिएटर्स को छोटी-बड़ी हर तरह की कहानियां बताने का मौका मिल रहा है।"

घई ने आगे एक्शन फिल्मों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, "देखिए, हर २०-३० साल बाद ट्रेंड बदल जाता है। ७० के दशक में अमिताभ बच्चन के साथ एक्शन का बड़ा दौर आया। ६० के दशक में पारिवारिक और सामाजिक फिल्में ज्यादा थीं। ९० के दशक में रोमांटिक प्रेम कहानियां छाईं। लोग एक स्टाइल से बोर हो जाते हैं और नया कुछ देखना चाहते हैं, इसलिए एक्शन का यह दौर भी समय के साथ आया है।"

संपादकीय दृष्टिकोण

सिनेमा समाज की वास्तविकता को दर्शाने का एक जरिया है, और यही इसे और भी सार्थक बनाता है।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या सुभाष घई ने कभी फिल्में बनाई हैं?
जी हां, सुभाष घई ने १८-१९ फिल्में बनाई हैं, जिनमें से १४-१५ हिट रही हैं।
व्हिसलेवुड फिल्म स्कूल क्यों खोला गया?
घई ने कहा कि कई स्टूडेंट बॉम्बे आने के बाद भटक जाते हैं, इसलिए उन्होंने यह स्कूल खोला ताकि वे सही मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें।
सुभाष घई का सिनेमा के प्रति क्या दृष्टिकोण है?
उनका मानना है कि सिनेमा समाज का आईना है और इसे समय के अनुसार बदलना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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