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सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली पुलिस को आदेश: बैरिकेड्स हटाएं, इंटरनेट बहाल करें; सीजेपी प्रदर्शन मामले में विशेष सुनवाई

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सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली पुलिस को आदेश: बैरिकेड्स हटाएं, इंटरनेट बहाल करें; सीजेपी प्रदर्शन मामले में विशेष सुनवाई

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने रविवार की विशेष सुनवाई में दिल्ली पुलिस को बैरिकेड्स हटाने, इंटरनेट बहाल करने और अवैध हिरासत रोकने के कड़े निर्देश दिए। सीजेपी प्रदर्शन के दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उपजे इस विवाद ने नागरिक अधिकारों और पुलिस शक्ति के बीच की रेखा को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 11 अक्टूबर 2026 को रविवार की विशेष सुनवाई में दिल्ली पुलिस को बैरिकेड्स हटाने और इंटरनेट सेवाएं बहाल करने का आदेश दिया।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी.
मोहना की बेंच ने मेट्रो, रेल और यातायात सेवाएं सामान्य रखने का निर्देश दिया।
10 अक्टूबर 2026 को सीईसी ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध प्रदर्शन के दौरान विपक्षी नेताओं सहित कई लोगों को हिरासत में लिया गया था।
अदालत ने कहा कि धारा 163 की सीमा से परे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई न हो और अवैध हिरासत पूर्णतः बंद हो।
अदालत ने अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया और अधिकारियों से हलफनामा व अनुपालन रिपोर्ट माँगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने 11 अक्टूबर 2026 को रविवार की विशेष सुनवाई में दिल्ली पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए कि राजधानी में लगाए गए बैरिकेड्स तत्काल हटाए जाएं और इंटरनेट सेवाएं बिना रुकावट बहाल की जाएं। यह आदेश सिटीज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा लगाई गई पाबंदियों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाज़ा तब खटखटाया जब शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे लोगों और विपक्षी दलों के कई वरिष्ठ नेताओं को हिरासत में लिया। हिरासत में लिए गए लोगों में पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल बताए जाते हैं। पुलिस ने बड़े पैमाने पर बैरिकेड्स लगाए और कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं भी प्रभावित हुईं, जिसके बाद यह विवाद न्यायालय तक पहुँचा।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य आदेश

जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहें, जब तक कि कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति में प्रतिबंध की अनिवार्यता न हो। इसके अलावा, कानून के अनुसार इंटरनेट सेवाओं को बाधित न किया जाए और नागरिकों व वाहनों की आवाजाही यातायात नियमों के अनुरूप सुनिश्चित की जाए।

बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि बैरिकेड्स लगाने के निर्णय की तत्काल समीक्षा की जाए और सुप्रीम कोर्ट के आसपास के क्षेत्र में धारा 163 लागू करने से संबंधित बोर्ड हटाए जाएं, ताकि किसी भी न्यायालय तक आम नागरिकों की पहुँच में बाधा न आए।

हिरासत और नागरिक अधिकारों पर टिप्पणी

अदालत ने अधिकारियों को कड़े शब्दों में कहा कि अवैध हिरासत पूर्णतः अस्वीकार्य है और किसी को भी केवल कानून के दायरे में ही हिरासत में लिया जा सकता है। बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि धारा 163 की सीमा से परे शांतिपूर्ण और निहत्थे तरीके से एकत्र हुए लोगों के विरुद्ध कोई कार्रवाई न की जाए। यह टिप्पणी संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त शांतिपूर्ण सभा के मौलिक अधिकार की रक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

अवमानना नोटिस और अनुपालन रिपोर्ट

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अवमानना याचिका में आरोपी पक्षों को नोटिस जारी किया। अधिकारियों को हलफनामा दाखिल करने और ऊपर उल्लिखित आदेशों का अनुपालन दर्शाने वाली रिपोर्ट जमा करने का निर्देश भी दिया गया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आज उठाई गई अन्य गैर-सूचीबद्ध याचिकाओं को अवमानना कार्यवाही के साथ जोड़ा जाएगा।

आगे क्या होगा

यह मामला अब अवमानना कार्यवाही के रूप में आगे बढ़ेगा और अधिकारियों को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय का रविवार को विशेष सुनवाई करना अपने आप में इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करता है। आलोचकों का कहना है कि इंटरनेट पर प्रतिबंध और बड़े पैमाने पर हिरासत जैसे कदम लोकतांत्रिक प्रदर्शन के अधिकार पर अंकुश लगाने की कोशिश है, जबकि अधिकारियों का पक्ष है कि ये कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए थे।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि मौलिक अधिकारों पर सीधे हमले के रूप में देखा। इंटरनेट शटडाउन और बड़े पैमाने पर हिरासत का संयोजन एक ऐसा पैटर्न है जो पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में देखा गया है — और जिसे अदालतें बार-बार असंवैधानिक ठहराती रही हैं। असली सवाल यह है कि अवमानना नोटिस के बावजूद अनुपालन की निगरानी कितनी प्रभावी होगी, क्योंकि अतीत में अदालती आदेशों के बाद भी प्रशासनिक ढील बनी रही है। यह मामला चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर उठ रहे सवालों और नागरिक समाज की आवाज़ को दबाने की कथित कोशिशों, दोनों को एक साथ उजागर करता है।
RashtraPress
11 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को क्या निर्देश दिए?
सर्वोच्च न्यायालय ने 11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस को बैरिकेड्स हटाने, इंटरनेट सेवाएं बहाल करने, मेट्रो-रेल सामान्य रखने और अवैध हिरासत बंद करने के आदेश दिए। अदालत ने यह भी कहा कि धारा 163 की सीमा के परे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई न हो।
सीजेपी प्रदर्शन क्यों हो रहा था और किसे हिरासत में लिया गया?
सिटीज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) और विपक्षी दलों के समर्थक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे थे। 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों और विपक्षी दलों के कई वरिष्ठ नेताओं को, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल बताए जाते हैं, हिरासत में लिया।
अवमानना याचिका किसके खिलाफ दायर की गई और अब क्या होगा?
अवमानना याचिका उन अधिकारियों के विरुद्ध है जिन पर अदालती आदेशों की अवहेलना का आरोप है। सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और अधिकारियों से हलफनामा तथा अनुपालन रिपोर्ट जमा करने को कहा है।
क्या सुप्रीम कोर्ट के आसपास धारा 163 लागू करना वैध था?
अदालत ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई और सुप्रीम कोर्ट परिसर के आसपास धारा 163 से संबंधित बोर्ड तत्काल हटाने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायालय तक आम नागरिकों की पहुँच में किसी भी प्रकार की बाधा स्वीकार्य नहीं है।
इंटरनेट बंद करने पर भारत में कानूनी स्थिति क्या है?
सर्वोच्च न्यायालय अनुराधा भसीन मामले (2020) में यह स्थापित कर चुका है कि इंटरनेट पर अनिश्चितकालीन प्रतिबंध मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और इसे कानूनी प्रक्रिया के तहत ही लगाया जा सकता है। 11 अक्टूबर 2026 के आदेश में अदालत ने इसी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि इंटरनेट सेवाएं कानून के अनुसार बिना रुकावट जारी रहें।
राष्ट्र प्रेस
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