13 अक्टूबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को तलब किया, महिला पत्रकारों पर कथित हमले का मामला

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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को तलब किया, महिला पत्रकारों पर कथित हमले का मामला

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को तलब किया है — आरोप है कि 10-11 अक्टूबर को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कवर कर रहीं महिला पत्रकारों के साथ मारपीट की गई और कोर्ट के अपने आदेश की अवहेलना हुई। गुरुवार की सुनवाई में पुलिस को जवाब देना होगा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 13 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी को गुरुवार की सुनवाई में तलब किया।
10 और 11 अक्टूबर को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कवर कर रहीं महिला पत्रकारों के साथ कथित तौर पर मारपीट और हिरासत की शिकायतें सामने आईं।
'नेटवर्क ऑफ वुमन इन मीडिया, इंडिया' की याचिका पर CJI सूर्य कांत , जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी.
मोहना की पीठ सुनवाई कर रही है।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अलग अवमानना याचिका का उल्लेख किया — आरोप है कि पुलिस ने 10 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट आदेश का उल्लंघन किया।
कोर्ट पहले ही आदेश दे चुका था कि BNSS धारा 163 से बाहर के क्षेत्रों में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों को बिना कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में न लिया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को तलब करते हुए उन गंभीर आरोपों पर स्पष्टीकरण माँगा, जिनमें कहा गया है कि नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की कवरेज कर रहीं महिला पत्रकारों के साथ पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर मारपीट की। कोर्ट ने आदेश दिया कि संबंधित अधिकारी गुरुवार की सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहें।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 10 और 11 अक्टूबर 2026 को हुई उन घटनाओं से जुड़ा है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों के साथ कथित तौर पर बदसलूकी की गई, उन्हें हिरासत में लिया गया और उनके पेशेवर कार्य में बाधा डाली गई। इन आरोपों को 'नेटवर्क ऑफ वुमन इन मीडिया, इंडिया' ने अपनी याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखा।

कोर्ट की सुनवाई और टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने उक्त याचिका का उल्लेख किया, जिसमें विरोध प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों, विशेषकर महिला पत्रकारों की सुरक्षा की माँग की गई थी। पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह चाहती है कि कोई वरिष्ठ अधिकारी अदालत में उपस्थित रहे और इस विषय में जानकारी दे।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भी एक अलग अदालत अवमानना याचिका का संदर्भ दिया। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय के 10 अक्टूबर 2026 के आदेश का उल्लंघन करते हुए पत्रकारों के साथ मारपीट की।

10 अक्टूबर का सुप्रीम कोर्ट आदेश

गौरतलब है कि जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 10 अक्टूबर को ही अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि वकील, पत्रकार और अन्य पेशेवर बिना किसी बाधा के अपना काम कर सकें। यह आदेश प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पूर्व लगाई गई पाबंदियों से जुड़ी अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया था।

उसी आदेश में कोर्ट ने यह भी कहा था कि मेट्रो और रेलवे सेवाएँ सामान्य रूप से चलती रहें, इंटरनेट सेवाएँ बाधित न हों और लोगों की आवाजाही पर अनावश्यक रोक न लगाई जाए। इसके अलावा कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू क्षेत्रों के बाहर हो रहे शांतिपूर्ण और निहत्थे जमावड़ों में कानूनी प्रक्रिया के बिना किसी को हिरासत में नहीं लिया जाए।

आम जनता और प्रेस स्वतंत्रता पर असर

यह मामला इस मायने में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल महिला पत्रकारों की सुरक्षा बल्कि अदालती आदेशों के पालन और प्रेस स्वतंत्रता के व्यापक सवाल से भी जुड़ा है। आलोचकों का कहना है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पत्रकारों के साथ इस प्रकार का व्यवहार होता है, तो यह लोकतंत्र में जवाबदेही की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी, जिसमें दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य की गई है। अवमानना याचिका पर भी इसी सुनवाई में विचार किए जाने की संभावना है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस कोर्ट के समक्ष अपने बचाव में क्या तर्क प्रस्तुत करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो कहीं अधिक गंभीर है। यदि पुलिस ने वाकई 10 अक्टूबर के आदेश का उल्लंघन किया, तो यह संस्थागत जवाबदेही की विफलता को दर्शाता है, न कि मात्र अनुशासन का मसला। मुख्यधारा की कवरेज इसे 'प्रेस फ्रीडम' की घटना की तरह पेश कर रही है, लेकिन असल सवाल यह है कि क्या कोर्ट अब अवमानना की कार्यवाही को उसके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाएगा — या यह एक और तलब-और-माफी का चक्र बनकर रह जाएगा जो भविष्य में किसी को नहीं रोकता।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को क्यों तलब किया?
सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को इसलिए तलब किया क्योंकि 10-11 अक्टूबर 2026 को विरोध प्रदर्शन कवर कर रहीं महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट और हिरासत की शिकायतें सामने आईं। इसके अलावा आरोप है कि पुलिस ने कोर्ट के 10 अक्टूबर के आदेश का भी उल्लंघन किया।
यह मामला किस विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है?
यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 10 और 11 अक्टूबर 2026 को हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा है। इन प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों, विशेषकर महिला पत्रकारों के साथ कथित तौर पर बदसलूकी की गई।
सुप्रीम कोर्ट का 10 अक्टूबर का आदेश क्या था?
जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 10 अक्टूबर को आदेश दिया था कि वकील, पत्रकार और अन्य पेशेवर बिना बाधा काम कर सकें। साथ ही निर्देश था कि मेट्रो-रेलवे सेवाएँ सामान्य रहें, इंटरनेट न काटा जाए और BNSS धारा 163 से बाहर के शांतिपूर्ण जमावड़ों में बिना कानूनी प्रक्रिया हिरासत न हो।
'नेटवर्क ऑफ वुमन इन मीडिया, इंडिया' की याचिका में क्या माँग की गई है?
इस संगठन की याचिका में विरोध प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों — विशेषकर महिला पत्रकारों — की सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग की गई है। याचिका को वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने CJI सूर्य कांत की पीठ के समक्ष उल्लेखित किया।
इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय में अगली सुनवाई गुरुवार को होगी, जिसमें दिल्ली पुलिस का वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहेगा और आरोपों पर स्पष्टीकरण देगा। अवमानना याचिका पर भी इसी सुनवाई में विचार होने की संभावना है।
राष्ट्र प्रेस
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