26 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

उपराष्ट्रपति ने तमिल नववर्ष पर कहा: 'यह पर्व नहीं, बल्कि पूर्वजों की ज्ञान का उत्सव'

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
उपराष्ट्रपति ने तमिल नववर्ष पर कहा: 'यह पर्व नहीं, बल्कि पूर्वजों की ज्ञान का उत्सव'

सारांश

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने तमिल नववर्ष को पारंपरिक उत्सव से आगे बढ़कर पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव बताया। इस अवसर पर कृषि से लेकर सांस्कृतिक एकता की महत्ता को उजागर किया गया।

मुख्य बातें

तमिल नववर्ष एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव है।
यह पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव है।
कृषि की तैयारियों का समय है।
यह उत्सव भारत की एकता का प्रतीक है।
उपराष्ट्रपति ने इसकी वैज्ञानिक अवधारणाओं पर जोर दिया।

नई दिल्ली, 14 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने तमिल समुदाय के लोगों को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि चिथिराई का पहला दिन न केवल तमिलों के लिए, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लोगों के लिए एक नई और सकारात्मक शुरुआत का प्रतीक है।

उपराष्ट्रपति ने बताया कि तमिल नववर्ष केवल एक पारंपरिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव है। यह परंपरा, परिवार, आध्यात्मिकता और जीवन के विभिन्न पहलुओं को जोड़ने वाला पर्व है। यह नई आशाओं के साथ, पुराने अनुभवों से सीख लेकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। हमें गर्व के साथ इस पर्व का उत्सव मनाना चाहिए, जो तमिल संस्कृति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि चिथिराई महीना कृषि की तैयारियों की शुरुआत का समय है। किसान इस दौरान भूमि को तैयार करने का कार्य करते हैं। मेहनत को उन्नति का मार्ग मानने वाले हमारे लोग इस श्रम की शुरुआत को उत्सव के रूप में मनाते हैं। पूरे देश में इस प्रकार के उत्सव भारत की एकता और समरसता का प्रतीक बनते हैं।

उन्होंने बताया कि उत्तर भारत में, पंजाब में लोग बैसाखी को फसल उत्सव के रूप में मनाते हैं। दक्षिण में, केरल में, विषु मनाया जाता है, जहाँ 'कनी' देखने की परंपरा महत्वपूर्ण होती है। असम में बिहू और पश्चिम बंगाल में पोहेला बोइशाख बड़े उत्साह से मनाए जाते हैं। इसी प्रकार, मणिपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में भी इस दिन को नववर्ष के रूप में मनाया जाता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि उत्तराखंड के हरिद्वार में इस दिन देशभर से लोग गंगा में स्नान करने के लिए एकत्रित होते हैं। तेलुगु भाषी लोग हाल ही में उगादि के रूप में अपना नववर्ष मना चुके हैं, जबकि मराठी और कोंकणी लोग गुड़ी पड़वा मनाते हैं। हम उस प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं जो सदियों से अस्तित्व में है। हमारे पूर्वजों का वैज्ञानिक ज्ञान इस बात को दर्शाता है कि उन्हें विश्व और उसके संचालन का गहरा ज्ञान था।

उन्होंने कहा कि पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर लगाने में लगभग 365.25 दिन लगते हैं। इसी गणना के आधार पर हमारा नववर्ष निर्धारित होता है। इसलिए तमिल पंचांग का समय निर्धारण सटीक और संतुलित है। हालाँकि हमें वैश्विक कैलेंडर का पालन करना आवश्यक है, लेकिन हमें अपने तमिल कैलेंडर को भी याद रखना चाहिए। यह परंपरा हमारी विशेषता है, जिसमें कुल 60 वर्षों के नाम होते हैं, जिनमें वर्तमान 'पराभव' वर्ष चालीसवां है।

उपराष्ट्रपति ने यह भी कहा कि एस्ट्रोनॉमी शब्द ग्रीक भाषा से आया है, जिसका अर्थ है 'नक्षत्रों के नियमों का अध्ययन करने वाला विज्ञान'। हमारे पूर्वज इसे 'खगोल विज्ञान' कहते थे। हजारों साल पहले ही उन्होंने यह समझ लिया था कि पृथ्वी गोल है और ग्रहों की गति का अध्ययन किया था।

उन्होंने कहा कि संगम साहित्य में ग्रहों और नक्षत्रों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। उदाहरण के लिए, कवि कपिलर ने पुरनानूरु में शनि ग्रह को 'काले रंग का' बताया है। हमारे पूर्वजों को ग्रहों के मानव जीवन पर प्रभाव का गहरा ज्ञान था। ऐसे गणना करने वालों को 'कनियन' कहा जाता था। कवि कनियन पूंगुंद्रनार का नाम इसी परंपरा से जुड़ा है। तोलकाप्पियार ने ऐसे ज्ञानी व्यक्तियों को 'अरिवर' कहा है। प्राचीन काल से विवाह जैसे शुभ कार्य शुभ समय देखकर किए जाते थे, जैसा कि अगनानूरु में वर्णित है। यह परंपरा आज भी जारी है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि पंचांग के पांच अंग होते हैं: 'वार, तिथि, करण, नक्षत्र और योग'। इनके आधार पर वर्षा, खेती और समृद्धि के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। हमारे पूर्वज सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति के आधार पर समय की गणना करते थे। आज आधुनिक उपकरणों से ग्रहण की गणना की जाती है, लेकिन हमारे पूर्वजों ने इसे सदियों पहले ही सटीक रूप से निर्धारित कर लिया था। क्या हमारे पूर्वजों का ज्ञान हमारी धरोहर नहीं है? इसलिए हमें इसे संरक्षित करना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि दक्षिण-पूर्व एशिया में तमिलों की बड़ी संख्या और ऐतिहासिक संबंधों के कारण श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर और मॉरीशस में भी तमिल नववर्ष धूमधाम से मनाया जाता है। यह उत्सव हमारी सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है और यह भी दिखाता है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से नववर्ष मनाया जाता है, जो हमारी एकता का प्रतीक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो तमिल नववर्ष को न केवल एक उत्सव के रूप में देखते हैं, बल्कि इसे हमारे पूर्वजों की वैज्ञानिक सोच और परंपरा से जोड़ते हैं। यह दृष्टिकोण हमें हमारी सांस्कृतिक धरोहर को समझने में मदद करता है।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिल नववर्ष का महत्व क्या है?
तमिल नववर्ष, जिसे चिथिराई के नाम से भी जाना जाता है, हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता और कृषि के महत्व का उत्सव है।
तमिल नववर्ष कब मनाया जाता है?
तमिल नववर्ष हर वर्ष 14 अप्रैल को मनाया जाता है।
दक्षिण भारत में अन्य नववर्ष उत्सव कौन से हैं?
दक्षिण भारत में उगादि (तेलुगु), गुड़ी पड़वा (मराठी) और विषु (केरल) जैसे नववर्ष उत्सव मनाए जाते हैं।
क्या तमिल नववर्ष सिर्फ तमिल समुदाय के लिए है?
नहीं, यह उत्सव केवल तमिल समुदाय के लिए नहीं है, बल्कि यह विश्वभर के लोगों के लिए एक नई शुरुआत का प्रतीक है।
इस दिन की कृषि महत्वता क्या है?
इस दिन किसान भूमि तैयार करने का कार्य शुरू करते हैं, जो कृषि के लिए महत्वपूर्ण है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 महीने पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 4 महीने पहले
  6. 7 महीने पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 10 महीने पहले