तेज प्रताप यादव ने नीतीश कुमार पर शराबबंदी की विफलता को लेकर किया हमला
सारांश
Key Takeaways
- तेज प्रताप यादव की शराबबंदी नीति की आलोचना।
- मोतिहारी में हुई त्रासदी में 11 लोगों की मौत।
- नीतीश कुमार पर हमले का राजनीतिक प्रभाव।
- अवैध शराब की व्यापक बिक्री की चिंता।
- शराबबंदी नीति के प्रभावी कार्यान्वयन पर सवाल।
पटना, 8 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। जनशक्ति जनता दल (जेजेडी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने बिहार में शराबबंदी नीति की कड़ी आलोचना की। उनका कहना है कि यह प्रतिबंध, जो लगभग एक दशक से लागू है, पूरी तरह से विफल साबित हुआ है।
यह टिप्पणी मोतिहारी में हाल में हुई नकली शराब त्रासदी के संदर्भ में आई है, जिसमें 11 लोगों की जान चली गई और इसने शराबबंदी के प्रभावी कार्यान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
तेज प्रताप ने आरोप लगाया कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में शराब खुलेआम बिक रही है।
उन्होंने कहा कि शराबबंदी के संबंध में बहुत से दावे किए गए, लेकिन वास्तविकता यह है कि शराब हर चौराहे, गली और मोहल्ले में उपलब्ध है। लोग हर जगह इसका सेवन कर रहे हैं, तो फिर यह प्रतिबंध कहाँ है?
उन्होंने आगे बताया कि अवैध शराब की व्यापक उपलब्धता ने इस नीति को जमीनी स्तर पर बेअसर कर दिया है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निशाने पर लेते हुए तेज प्रताप ने कहा कि शराबबंदी की विफलता उनके दिल्ली जाने के राजनीतिक कदम का एक कारण बन सकती है।
उन्होंने कहा कि शराबबंदी विफल हो गई है, इसीलिए नीतीश कुमार इस्तीफा देकर दिल्ली जा रहे हैं।
जहरीली शराब की घटनाओं का जिक्र करते हुए तेज प्रताप ने बताया कि बिहार में अवैध रूप से नकली शराब का निर्माण और बिक्री जारी है।
उन्होंने कहा कि जहरीली शराब को मिट्टी के बर्तनों में भरकर जमीन में छिपाया जा रहा है, और पुलिस भी इसे ढूंढने में असमर्थ है। लोग इसका सेवन कर रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं।
शराबबंदी के प्रति अपने पूर्व समर्थन के बारे में पूछे जाने पर, तेज प्रताप ने इसे पुरानी बात बताकर खारिज कर दिया।
उन्होंने कहा कि यह पहले की बात थी। आज की वास्तविकता अलग है, शराब हर जगह आसानी से मिल रही है।
इन टिप्पणियों से बिहार की शराबबंदी नीति को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है, खासकर जब प्रवर्तन संबंधी चुनौतियों और हाल की दुखद घटनाओं का मुद्दा चर्चा में है।
पूर्वी चंपारण जिले में 1 अप्रैल की शाम को जहरीली शराब पीने से यह त्रासदी शुरू हुई। ग्रामीणों की तबीयत 2 अप्रैल से बिगड़ने लगी और उन्हें विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया।
अब तक 11 लोगों की मौत हो चुकी है और 15 से अधिक लोग अस्पतालों में जीवन-मरण की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस त्रासदी में छह पीड़ितों की आँखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई है।