क्या राम कथा धर्म और करुणा के शाश्वत मूल्यों का प्रसार करती है: उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन?
सारांश
Key Takeaways
- राम कथा का उद्देश्य नैतिकता और करुणा का प्रसार करना है।
- यह पवित्र महाकाव्य केवल कथा नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है।
- मोरारी बापू की राम कथा का वैश्विक महत्व है।
- भगवान राम के आदर्शों को आत्मसात करने से आध्यात्मिक परिवर्तन संभव है।
- ऐसे आयोजनों से सामाजिक सद्भाव को बल मिलता है।
नई दिल्ली, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शनिवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में मोरारी बापू द्वारा आयोजित नौ दिवसीय राम कथा के उद्घाटन समारोह में भाग लिया। सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने राम कथा को भारत की सभ्यतागत परंपराओं में गहराई से निहित नैतिकता, करुणा, बंधुत्व और मानवता के शाश्वत मूल्यों के प्रसार का एक गहन और जीवंत माध्यम बताया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि राम कथा केवल एक पवित्र महाकाव्य का वर्णन मात्र नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत दर्शन है जो व्यक्तियों को गरिमा, अनुशासन, भक्ति और करुणा के साथ जीवन जीने का मार्गदर्शन करता है। प्रभु श्री राम के जीवन और आदर्शों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ये आदर्श धर्म के लिए मार्गदर्शक प्रकाश का काम करते हैं, जिसे उन्होंने जीवन जीने का सही तरीका बताया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि दशकों से मोरारी बापू ने राम कथा की पवित्र परंपरा को भारत और विश्व भर में फैलाया है, जिससे मानवीय चेतना जागृत हुई है और प्रेम, सेवा और धर्म के सार्वभौमिक मूल्यों को सुदृढ़ किया गया है। उन्होंने यह जानकर गहरी प्रशंसा व्यक्त की कि यह प्रस्तुति मोरारी बापू की 971वीं राम कथा है।
25 नवंबर 2025 को अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर में हुए ऐतिहासिक ध्वजारोहण समारोह का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह अवसर लाखों भक्तों की आस्था, धैर्य और सदियों पुरानी भक्ति की पुष्टि का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि चुनौतियां चाहे कितनी भी आएं, धर्म कभी नष्ट नहीं हो सकता और अंततः सत्य और धर्म की ही जीत होती है। उन्होंने आगे कहा कि भगवान श्री राम केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि भारत की आत्मा में भी निवास करते हैं।
रामायण परंपरा की सार्वभौमिकता पर प्रकाश डालते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रभु श्री राम का जीवन और आदर्श वाल्मीकि की संस्कृत रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस से लेकर कंबन की तमिल रामायणम और भारत तथा विश्व भर में कई अन्य अनुवादों तक, विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में व्यक्त होते हैं। उन्होंने कहा कि भाषाएं भले ही भिन्न हों, धर्म का सार एक ही रहता है, जो साझा मूल्यों के माध्यम से विविध परंपराओं को एकजुट करता है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के प्राचीन धर्मग्रंथ विश्व शांति, सहअस्तित्व, सद्भाव और संतुलन पर विशेष बल देते हैं और इन्हें शाश्वत एवं सार्वभौमिक सिद्धांत बताते हैं। उन्होंने रामचरितमानस, भगवद् गीता, आदि पुराण और जैन आगम जैसे ग्रंथों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये गहन आध्यात्मिक एवं दार्शनिक ज्ञान के स्रोत हैं जो मानवता का मार्गदर्शन करते रहते हैं।
उपराष्ट्रपति ने भक्तों से नौ दिनों की राम कथा में केवल श्रोता बनकर नहीं, बल्कि साधक बनकर शामिल होने का आह्वान करते हुए कहा कि भगवान राम के आदर्शों का एक छोटा सा अंश भी दैनिक आचरण में आत्मसात करने से सच्चा आध्यात्मिक परिवर्तन हो सकता है। उन्होंने इस आध्यात्मिक सभा को संभव बनाने में शामिल आयोजकों, स्वयंसेवकों और सभी लोगों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन व्यक्तिगत आस्था के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक निरंतरता को भी मजबूत करते हैं।
इस कार्यक्रम में भारत के पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद, अहिंसा विश्व भारती और विश्व शांति केंद्र के संस्थापक आचार्य लोकेश और अन्य विशिष्ट अतिथि भी उपस्थित थे।