15 सितंबर 2026
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यूपीआई पर एमडीआर विवाद: राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल का आरोप — अमेरिकी लॉबी के दबाव में बदली नीति

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यूपीआई पर एमडीआर विवाद: राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल का आरोप — अमेरिकी लॉबी के दबाव में बदली नीति

सारांश

यूपीआई एमडीआर विवाद सियासी रंग ले चुका है। राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल ने मोदी सरकार पर अमेरिकी पेमेंट लॉबी के दबाव में भारत की शून्य-एमडीआर नीति बदलने का आरोप लगाया — यह विवाद करोड़ों यूपीआई उपयोगकर्ताओं और छोटे व्यापारियों के हितों से सीधे जुड़ा है।

मुख्य बातें

कांग्रेस ने 15 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार पर यूपीआई एमडीआर मामले में अमेरिकी लॉबी के दबाव में झुकने का आरोप लगाया।
राहुल गांधी ने कहा कि ₹2,000 से ऊपर के मर्चेंट यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लगाने का रास्ता खोला जा रहा है, जो कुल यूपीआई मूल्य का 65 प्रतिशत है।
केसी वेणुगोपाल ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि एमडीआर का बोझ आम नागरिकों पर नहीं, बड़ी वित्तीय कंपनियों पर डाला जाना चाहिए।
भारत में अभी यूपीआई पर शून्य एमडीआर नीति लागू है; इसे बदलने की चर्चा को विपक्ष डिजिटल इंडिया के खिलाफ बता रहा है।
केंद्र सरकार की ओर से एमडीआर पर अभी तक कोई आधिकारिक नीतिगत घोषणा नहीं हुई है।

नई दिल्ली, 15 सितंबर 2026 — यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की चर्चा ने राजनीतिक रंग ले लिया है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि यह निर्णय अमेरिकी पेमेंट कंपनियों के दबाव में लिया जा रहा है और इससे आम जनता की जेब पर सीधा बोझ पड़ेगा। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर सरकार को कठघरे में खड़ा किया।

वेणुगोपाल का हमला: 'अमेरिकी लॉबी के दबाव में फैसला'

केसी वेणुगोपाल ने एक्स पर लिखा, 'अमेरिकी लॉबी के दबाव में एमडीआर लागू करना पूरी तरह से आम लोगों के खिलाफ कदम है। आम नागरिक को क्यों परेशान किया जा रहा है? एमडीआर का बोझ उन लोगों पर क्यों डाला जा रहा है जो अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं, जबकि इसका खर्च बड़ी-बड़ी वित्तीय कंपनियों को उठाना चाहिए?'

उन्होंने यह भी कहा, 'हमें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए जो वैश्विक दबावों के सामने डटकर खड़ा हो सके, खासकर तब जब उनकी मांगें गरीब और मध्यम वर्गीय भारतीयों के हितों के खिलाफ हों; न कि ऐसा प्रधानमंत्री जो पूरी तरह से समझौता कर चुका हो।' यह बयान स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता पर सीधा व्यक्तिगत प्रहार था।

राहुल गांधी का आरोप: '₹2,000 से ऊपर के लेन-देन पर लगेगा शुल्क'

राहुल गांधी ने एक्स पर आरोप लगाया कि 'मोदी सरकार ने चुपचाप यूपीआई पर फीस लगाने का रास्ता खोल दिया है। अब ₹2,000 से ऊपर के मर्चेंट यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर लगाया जा सकता है।' उन्होंने आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि यह लेन-देन संख्या में भले ही केवल 5 प्रतिशत हों, किंतु यूपीआई के कुल लेन-देन मूल्य का लगभग 65 प्रतिशत इन्हीं ट्रांजैक्शंस में निहित है।

गांधी ने तर्क दिया कि सरकार भले ही कह रही हो कि ग्राहक से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, परंतु दुकानदार पर लगने वाली यह फीस अंततः वस्तुओं की कीमतों में जुड़कर उपभोक्ता की जेब से ही वसूल होगी। यह ऐसे समय में आया है जब महँगाई से पहले से जूझ रहे मध्यम वर्ग पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव की चिंता पहले से व्याप्त है।

मुख्य घटनाक्रम: क्या है एमडीआर विवाद?

गौरतलब है कि भारत में वर्तमान में यूपीआई ट्रांजैक्शन पर शून्य एमडीआर नीति लागू है — यानी व्यापारियों से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता। इसी नीति को भारत की डिजिटल पेमेंट क्रांति का आधार माना जाता है, जिसके चलते यूपीआई दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट नेटवर्क बन चुका है। कांग्रेस का आरोप है कि इस जीरो-एमडीआर नीति को बदलने का दबाव अमेरिकी पेमेंट कंपनियाँ लंबे समय से डाल रही हैं, और सरकार ने अब उसी दिशा में कदम उठाया है।

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताएँ जारी हैं और डिजिटल व्यापार नीतियाँ द्विपक्षीय एजेंडे पर प्रमुखता से हैं।

आम जनता पर असर

यदि एमडीआर लागू होता है तो छोटे व्यापारियों, किराना दुकानदारों और सेवा प्रदाताओं पर सबसे पहले असर पड़ेगा, क्योंकि उन्हें हर बड़े डिजिटल लेन-देन पर एक प्रतिशत से अधिक का शुल्क वहन करना पड़ सकता है। विश्लेषकों के अनुसार यह बोझ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुँचेगा। डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की सरकार की दीर्घकालिक नीति के साथ यह कदम कथित तौर पर अंतर्विरोध में दिखता है।

क्या होगा आगे

केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक नीतिगत घोषणा नहीं की गई है और एमडीआर लागू करने की बात अभी चर्चा के स्तर पर बताई जा रही है। विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया के बाद यह मामला संसद में भी उठाए जाने की संभावना है। उद्योग और उपभोक्ता संगठनों की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनके आर्थिक तर्क को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है — यूपीआई ट्रांजैक्शन के मूल्य का 65 प्रतिशत हिस्सा जिन ट्रांजैक्शंस में है, उन पर शुल्क लगाना अंततः उपभोक्ता कीमतों में प्रतिबिंबित होगा। भारत की शून्य-एमडीआर नीति डिजिटल समावेश की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रही है और यदि इसे बदला जाता है तो सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि किसका फायदा होगा। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सरकार अभी तक 'चर्चा' और 'नीति' के बीच की रेखा क्यों नहीं खींच रही — यही अस्पष्टता विपक्ष को हमले का मौका दे रही है।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूपीआई पर एमडीआर क्या है और यह विवाद क्यों है?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वह शुल्क है जो व्यापारियों से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर लिया जाता है। भारत में अभी यूपीआई पर शून्य एमडीआर नीति लागू है, लेकिन इसे बदलने की चर्चा ने विवाद खड़ा कर दिया है क्योंकि इससे व्यापारियों का खर्च बढ़ेगा जो अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
राहुल गांधी ने यूपीआई एमडीआर पर क्या कहा?
राहुल गांधी ने एक्स पर आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने ₹2,000 से ऊपर के मर्चेंट यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर लगाने का रास्ता खोल दिया है। उन्होंने बताया कि यह ट्रांजैक्शन संख्या में केवल 5 प्रतिशत हैं लेकिन यूपीआई के कुल मूल्य का 65 प्रतिशत इन्हीं में है।
केसी वेणुगोपाल ने एमडीआर पर क्या आरोप लगाए?
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि अमेरिकी लॉबी के दबाव में एमडीआर लागू करना आम लोगों के खिलाफ है और इसका खर्च बड़ी वित्तीय कंपनियों को उठाना चाहिए, न कि आम नागरिकों को।
क्या सरकार ने यूपीआई पर एमडीआर लगाने की आधिकारिक घोषणा की है?
नहीं, अभी तक केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक नीतिगत घोषणा नहीं की गई है। यह मामला अभी चर्चा के स्तर पर है। सरकार ने कहा है कि ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन विपक्ष का तर्क है कि व्यापारियों पर लगने वाली फीस अंततः उपभोक्ता कीमतों में जुड़ेगी।
अमेरिकी पेमेंट कंपनियों का इस मामले से क्या संबंध है?
कांग्रेस का आरोप है कि अमेरिकी पेमेंट कंपनियाँ लंबे समय से भारत की जीरो-एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं और अब सरकार उसी दिशा में नीति बदल रही है। हालाँकि सरकार की ओर से इस आरोप का कोई खंडन या पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
राष्ट्र प्रेस
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