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उषा खन्ना: 17 साल की उम्र में संगीत देकर तोड़े पुरुष-प्रधान इंडस्ट्री के मिथक

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उषा खन्ना: 17 साल की उम्र में संगीत देकर तोड़े पुरुष-प्रधान इंडस्ट्री के मिथक

सारांश

महज 17 साल की उम्र में बॉलीवुड के पुरुष-प्रधान संगीत जगत में कदम रखने वाली उषा खन्ना की कहानी सिर्फ प्रतिभा की नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह से लड़कर खुद को साबित करने की है — एक ऐसी विरासत जो आज भी प्रेरणा देती है।

मुख्य बातें

उषा खन्ना का जन्म 7 अक्टूबर 1941 को ग्वालियर में हुआ; पिता मनोहर खन्ना गीतकार थे।
महज 17 वर्ष की उम्र में फिल्म 'दिल देके देखो' का संगीत निर्देशन किया — बॉलीवुड इतिहास में उल्लेखनीय उपलब्धि।
नैय्यर से मुलाकात के बाद उन्हें पहला बड़ा अवसर मिला।
कम उम्र और महिला होने के कारण उनकी प्रतिभा पर सवाल उठाए गए; लोगों ने अनुमान लगाया कि पीछे कोई पुरुष संगीतकार है।
फिल्म के गीत लोकप्रिय हुए और उन्होंने 'सौतन' , 'आप तो ऐसे ना थे' सहित दर्जनों फिल्मों में संगीत दिया।

हिंदी सिनेमा की पहली प्रमुख महिला संगीतकारों में से एक उषा खन्ना ने महज 17 वर्ष की आयु में फिल्म 'दिल देके देखो' का संगीत निर्देशन कर उस दौर की परंपराओं को चुनौती दी, जब म्यूजिक डायरेक्शन को लगभग पूरी तरह पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। उनकी इस उपलब्धि पर संदेह करने वालों की कमी नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपने काम से हर सवाल का जवाब दिया।

संगीत से भरा बचपन और शुरुआती सफर

7 अक्टूबर 1941 को ग्वालियर में जन्मीं उषा खन्ना के घर में संगीत की जड़ें गहरी थीं। उनके पिता मनोहर खन्ना गीतकार थे, जिसके चलते घर का माहौल सुरों से सराबोर रहता था। उषा ने बचपन से ही विधिवत संगीत प्रशिक्षण लिया और धीरे-धीरे स्वयं धुनें रचने लगीं।

उनकी प्रतिभा की चर्चा उस दौर के जाने-माने संगीतकार ओ.पी. नैय्यर तक पहुँची। उषा ने उनसे भेंट की और अपनी बनाई धुनें सुनाईं। इसी मुलाकात ने उनके करियर की दिशा तय की और उन्हें 'दिल देके देखो' में संगीत देने का अवसर मिला।

संदेह और पूर्वाग्रह का सामना

यह अवसर जितना ऐतिहासिक था, उतनी ही कठिन थी उसकी राह। फिल्म की पूरी म्यूजिक टीम में अधिकांश लोग उम्र और अनुभव दोनों में उनसे कहीं आगे थे। जब उषा ने फिल्म का संगीत तैयार किया, तो तमाम लोगों को भरोसा ही नहीं हुआ कि इतनी कम उम्र की एक लड़की इतनी बड़ी फिल्म का संगीत निर्देशन कर सकती है।

कहा जाने लगा कि शायद पर्दे के पीछे कोई और संगीतकार काम कर रहा है। उनकी प्रतिभा को स्वीकार करने की बजाय लोग उनकी सफलता के पीछे किसी पुरुष का नाम तलाशते रहे — यह उस युग की सोच का प्रतिबिंब था।

काम से दिया जवाब

उषा खन्ना ने इन सवालों को अपनी रफ्तार पर हावी नहीं होने दिया। 'दिल देके देखो' के गीत दर्शकों के बीच खूब लोकप्रिय हुए। 'दिल देके देखो जी', 'हम और तुम और ये समां', 'बड़े हैं दिल के काले' और 'प्यार की कसम' जैसे गानों ने फिल्म के संगीत को एक अलग पहचान दिलाई और आलोचकों को खामोश कर दिया।

विस्तृत फिल्मोग्राफी और संगीत की विविधता

उषा खन्ना ने इसके बाद हिंदी सिनेमा को दशकों तक अपनी धुनें देती रहीं। 'सौतन', 'दादा', 'साजन बिना सुहागन', 'आप तो ऐसे ना थे', 'बिन फेरे हम तेरे', 'शबनम', 'बादल', 'हनीमून', 'दो खिलाड़ी', 'गोपीचंद जासूस', 'आंख मिचोली', 'साजन की सहेली', 'अब क्या होगा', 'लाल बंगला', 'एक सपेरा एक लुटेरा' और 'दिल परदेसी हो गया' समेत अनेक फिल्मों में उन्होंने संगीत दिया।

उनके संगीत में रोमांस, विरह, दर्द और जीवन के विभिन्न रंग एक साथ सुनाई देते हैं — यही विविधता उन्हें अपने समकालीनों से अलग करती है। 7 अक्टूबर 2025 को उनके 84वें जन्मदिन की पूर्व संध्या पर उनका यह सफर आज भी उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है, जो किसी भी रचनात्मक क्षेत्र में अपनी जगह बनाने की कोशिश में हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस संस्थागत पूर्वाग्रह की भी है जो आज भी रचनात्मक क्षेत्रों में कहीं न कहीं मौजूद है। यह सोच कि किसी महिला की उपलब्धि के पीछे ज़रूर कोई पुरुष होगा — उस दौर तक सीमित नहीं थी। गौरतलब है कि हिंदी सिनेमा के सात दशकों में भी पूर्णकालिक महिला संगीत निर्देशकों की संख्या अँगुलियों पर गिनी जा सकती है, जो बताता है कि उषा खन्ना ने जो राह खोली, उस पर चलने वाले अभी भी बहुत कम हैं।
RashtraPress
6 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उषा खन्ना कौन हैं और वे क्यों प्रसिद्ध हैं?
उषा खन्ना हिंदी सिनेमा की अग्रणी महिला संगीत निर्देशकों में से एक हैं, जिन्होंने 17 वर्ष की आयु में 'दिल देके देखो' (1959) का संगीत देकर इतिहास रचा। उन्होंने 'सौतन', 'आप तो ऐसे ना थे' समेत दर्जनों फिल्मों में अपनी धुनें दीं।
उषा खन्ना का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उषा खन्ना का जन्म 7 अक्टूबर 1941 को ग्वालियर में हुआ था। उनके पिता मनोहर खन्ना गीतकार थे, जिसके कारण घर में संगीत का वातावरण बचपन से बना रहा।
उषा खन्ना को 'दिल देके देखो' में संगीत देने का मौका कैसे मिला?
उनकी प्रतिभा की चर्चा उस दौर के प्रसिद्ध संगीतकार ओ.पी. नैय्यर तक पहुँची। उषा ने उनसे मुलाकात कर अपनी बनाई धुनें सुनाईं, जिसके बाद उन्हें फिल्म 'दिल देके देखो' में संगीत निर्देशन का अवसर मिला।
उषा खन्ना की प्रतिभा पर सवाल क्यों उठाए गए थे?
उनकी कम उम्र (17 वर्ष) और महिला होने के कारण कई लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि वे स्वयं इतनी बड़ी फिल्म का संगीत तैयार कर सकती हैं। लोग यह मानने लगे कि पर्दे के पीछे कोई पुरुष संगीतकार काम कर रहा होगा।
उषा खन्ना ने किन प्रमुख फिल्मों में संगीत दिया?
'दिल देके देखो' के अलावा उन्होंने 'सौतन', 'दादा', 'साजन बिना सुहागन', 'आप तो ऐसे ना थे', 'बिन फेरे हम तेरे', 'शबनम', 'बादल', 'हनीमून', 'दो खिलाड़ी', 'गोपीचंद जासूस', 'दिल परदेसी हो गया' समेत अनेक फिल्मों में संगीत निर्देशन किया।
राष्ट्र प्रेस
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