उषा उत्थुप: जिन्हें 'भारी आवाज' के कारण म्यूजिक क्लास से निकाला, बनीं पद्म भूषण से सम्मानित गायिका
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय संगीत जगत की दिग्गज गायिका उषा उत्थुप की जिंदगी उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है, जिन्हें कभी उनकी खूबी को ही कमज़ोरी बताकर नकार दिया गया। वही गहरी, भारी और दमदार आवाज — जिसकी वजह से उन्हें मुंबई के एक स्कूल की म्यूजिक क्लास से बाहर का रास्ता दिखाया गया था — आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। आज 7 नवंबर 2026 को उनके जन्मदिन की पूर्व संध्या पर, उनकी इस असाधारण यात्रा को जानना और भी प्रासंगिक हो जाता है।
बचपन और संगीत से पहला नाता
उषा उत्थुप का जन्म 8 नवंबर 1947 को मुंबई के एक तमिल परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता को भारतीय शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी संगीत दोनों का शौक था। घर में रेडियो पर अलग-अलग शैलियों के गाने बजते रहते थे, और बालपन से ही उषा इन्हें ध्यान से सुनती थीं। धीरे-धीरे संगीत से उनका अनुराग गहरा होता चला गया।
म्यूजिक क्लास से निष्कासन — और एक अनजाना मोड़
मुंबई के बायकुला स्थित सेंट एग्नेस हाईस्कूल में पढ़ाई के दौरान उषा की आवाज बाकी बच्चों से बिल्कुल भिन्न थी — भारी और गहरी। इसी असामान्यता के चलते उन्हें स्कूल की म्यूजिक क्लास से बाहर कर दिया गया। यह ऐसे समय की बात है जब 'अलग' आवाज को कमज़ोरी माना जाता था। हालाँकि, उनकी संगीत शिक्षिका ने उन्हें गायन के बजाय क्लैपर और ट्रायंगल जैसे वाद्ययंत्र बजाने का अवसर दिया। औपचारिक संगीत शिक्षा न मिलने के बावजूद संगीत से उनका रिश्ता टूटा नहीं — बल्कि और मज़बूत होता गया।
पहला मंच और करियर की शुरुआत
उषा उत्थुप ने महज 9 साल की उम्र में पहली बार सार्वजनिक मंच पर गाना गाया। अपनी बहनों के माध्यम से उनकी मुलाकात मशहूर रेडियो उद्घोषक अमीन सयानी से हुई, जिन्होंने उन्हें रेडियो सीलोन के 'ओवलटीन म्यूजिक आवर' में गाने का मौका दिया। वहाँ उन्होंने 'मॉकिंगबर्ड हिल' गाया। किशोरावस्था में भी कई मंचों पर प्रस्तुतियों का सिलसिला जारी रहा।
उनके करियर की विधिवत शुरुआत 1969 में चेन्नई से हुई, जब उन्होंने नाइन जेम्स नाम के एक नाइट क्लब में गाना शुरू किया। पहली ही प्रस्तुति में दर्शकों ने उन्हें इतना पसंद किया कि क्लब मालिक ने उन्हें एक सप्ताह के लिए अनुबंधित कर लिया। इसके बाद कोलकाता के मशहूर नाइट क्लबों में प्रस्तुतियों का दौर शुरू हुआ, जहाँ उनकी मुलाकात जानी चाको उत्थुप से हुई — जिनसे आगे चलकर उन्होंने विवाह किया।
बॉलीवुड और बहुआयामी संगीत यात्रा
1970 में फिल्म 'बॉम्बे टॉकी' से उन्होंने बॉलीवुड में प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत की। 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' के लिए भी उनकी आवाज़ गूँजी। आगे चलकर उन्होंने आरडी बर्मन और बप्पी लाहिड़ी जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। 'रंभा हो हो हो', 'मेहबूबा मेहबूबा' और 'डार्लिंग' जैसे गानों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। उनकी आवाज़ में पॉप, जैज़, रॉक और भारतीय फिल्मी संगीत — सभी शैलियाँ सहजता से समाहित हो जाती थीं।
गौरतलब है कि उनका प्रभाव भारत की सीमाओं से परे केन्या तक पहुँचा, जहाँ उन्होंने स्थानीय भाषा स्वाहिली में भी गाने गाए — यह उनकी संगीत-विविधता का प्रमाण है।
सम्मान और विरासत
संगीत के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 2011 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। इसके बाद 2024 में उन्हें पद्म भूषण से नवाज़ा गया। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हैं। वह अपनी रंगीन साड़ियों, बड़ी बिंदी, पारंपरिक गहनों और ऊर्जावान स्टेज परफॉर्मेंस के लिए भी उतनी ही प्रसिद्ध हैं जितनी अपनी आवाज़ के लिए। उषा उत्थुप की कहानी इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जो चीज़ किसी को 'अयोग्य' बनाती है, वही एक दिन उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।