सीपीईसी की छवि बचाने में नाकाम रहेगी चीन-पाकिस्तान की सूचना पहल सीपीआईसी: रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) की बिगड़ती साख को बहाल करने के लिए बनाई गई नई पहल 'चीन-पाकिस्तान इन्फॉर्मेशन कॉरिडोर' (सीपीआईसी) के सार्वजनिक संदेह को दूर करने में सफल होने की संभावना बेहद कम है। ग्रीस सिटी टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह पहल बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत चल रही अन्य परियोजनाओं पर भी नए सवाल खड़े कर सकती है।
सीपीआईसी का असली मकसद क्या है
रिपोर्ट में कहा गया है कि सीपीआईसी को आधिकारिक तौर पर दोनों देशों के बीच मीडिया सहयोग, सूचनाओं के आदान-प्रदान, कारोबारी साझेदारी, थिंक टैंक के बीच संवाद और सांस्कृतिक संबंध मजबूत करने वाली पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसे तथ्य-जांच और जनसंपर्क के एक तंत्र के रूप में भी पेश किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, सीपीआईसी का वास्तविक उद्देश्य सीपीईसी का बचाव करना है — एक ऐसी परियोजना जो अधूरे वादों, अविकसित बुनियादी ढाँचे और वित्तीय स्थिरता को लेकर लगातार आलोचनाओं के घेरे में है।
पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने इस पहल की घोषणा करते हुए कहा, 'अगर सीपीईसी इसका शरीर और साझा भविष्य है, तो सीपीआईसी इसकी आवाज होगा। अगर सीपीईसी हमारी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ता है, तो सीपीआईसी हमारी समझ को जोड़ेगा।'
सीपीईसी की ज़मीनी हकीकत
रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि सीपीईसी के तहत कुछ राजमार्गों का निर्माण हुआ है, लेकिन रेलवे का बुनियादी ढाँचा अब भी काफी हद तक अविकसित बना हुआ है। सीपीईसी की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना माने जाने वाले ग्वादर बंदरगाह को भी संचालन में गंभीर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 तक सीपीईसी की बिजली परियोजनाओं का बकाया भुगतान बढ़कर 423 अरब पाकिस्तानी रुपये हो गया था, जिसके चलते पाकिस्तान के आम नागरिकों को बिजली बिलों पर कर्ज सेवा अधिभार चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऊर्जा सुरक्षा बेहतर करने का वादा पूरा होने के बजाय आम जनता में संदेह और अविश्वास का कारण बन गया है।
चीन का कर्ज और पाकिस्तान की मुश्किलें
रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान पर चीन का कुल कर्ज 29.2 अरब डॉलर है, जो उसके कुल बाहरी कर्ज का करीब एक-तिहाई है। इसके साथ ही सीपीईसी के तहत शुरू की गई बुनियादी ढाँचा और बिजली परियोजनाओं की पर्याप्त राजस्व उत्पन्न करने की क्षमता पर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग पाकिस्तान की ओर से कर्ज चुकाने में लगातार हो रही देरी पर नाराजगी जता चुका है। चीन ने कई मौकों पर कर्ज के पुनर्गठन से इनकार किया है और बकाया भुगतान बढ़ने के बावजूद अनुबंधों पर दोबारा बातचीत करने को लेकर अनिच्छा दिखाई है।
यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान का क्षेत्रीय ट्रांजिट हब बनने का सपना अब भी अधूरा है और आम नागरिकों में यह धारणा बलवती हो रही है कि सीपीईसी का लाभ देश के कुछ खास और प्रभावशाली वर्गों तक ही सीमित रहा है।
बीआरआई पर व्यापक असर
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि सीपीईसी की नाकामी से चीन की उन व्यापक योजनाओं को झटका लग सकता है, जिनके ज़रिए वह बीआरआई के माध्यम से दूसरे देशों में अपना कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रभाव बढ़ाना चाहता है।
गौरतलब है कि रिपोर्ट में श्रीलंका का उदाहरण भी दिया गया है — जहाँ कई परियोजनाओं के अव्यावहारिक साबित होने और हंबनटोटा बंदरगाह पर संप्रभु नियंत्रण चीन को सौंपे जाने के बाद, श्रीलंका अब बीआरआई को लेकर स्पष्ट रूप से सतर्क हो गया है। यह एक बड़ा संकेत है कि बीआरआई की विश्वसनीयता की लड़ाई अब केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रही।
आगे क्या होगा
रिपोर्ट के विश्लेषण के अनुसार, सीपीआईसी जैसी सूचना-केंद्रित पहल उस समय तक जनता का भरोसा नहीं जीत सकती, जब तक सीपीईसी की ज़मीनी परियोजनाएँ वास्तविक और मापनीय परिणाम नहीं देतीं। आलोचकों का कहना है कि छवि सुधार के प्रयास तब तक खोखले साबित होंगे, जब तक कर्ज के बोझ और अधूरे वादों की मूल समस्याओं का समाधान नहीं होता।