सीपीईसी की विफलता: $62 अरब का गलियारा अधूरे बुनियादी ढाँचे और बढ़ते कर्ज में फँसा
सारांश
मुख्य बातें
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी), जिसे लगभग एक दशक तक पाकिस्तान की आर्थिक तकदीर बदलने वाली परियोजना के रूप में प्रचारित किया गया, अब अधूरे बुनियादी ढाँचे, बेकाबू कर्ज और ठहरे हुए औद्योगिक विकास की तस्वीर पेश कर रहा है। यूरोपियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, आज 'सीपीईसी 2.0' की ब्रांडिंग किसी नई शुरुआत का संकेत नहीं, बल्कि एक ऐसी परियोजना को राजनीतिक रूप से जीवित रखने का प्रयास है जो अपने मूल रणनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने में विफल रही है।
सीपीईसी का मूल ढाँचा और महत्वाकांक्षाएँ
करीब $62 अरब मूल्य की इस परियोजना में पाकिस्तान भर में राजमार्ग, बिजली संयंत्र, रेल नेटवर्क, बंदरगाह विकास और विशेष आर्थिक क्षेत्र शामिल थे। चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) की यह प्रमुख कड़ी थी, जिसका उद्देश्य पश्चिमी चीन को ग्वादर बंदरगाह के ज़रिये अरब सागर से जोड़ना और पाकिस्तान में औद्योगिक क्रांति लाना था। रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत से ही इस मॉडल में खामियाँ थीं — इसमें दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता की बजाय दृश्यमान बुनियादी ढाँचे को प्राथमिकता दी गई।
कर्ज का जाल और ऊर्जा क्षेत्र की विफलता
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर चीनी वित्तपोषण और निर्माण क्षमता तो हासिल की, लेकिन ऐसा औद्योगिक ढाँचा नहीं बना सका जो दीर्घकालिक आर्थिक लाभ दे सके। चीन-समर्थित कई कोयला और बिजली परियोजनाएँ ऐसे समझौतों के तहत लागू हुईं, जिनमें चीनी कंपनियों को डॉलर में ऊँचा रिटर्न सुनिश्चित किया गया था। जैसे-जैसे पाकिस्तानी मुद्रा कमजोर होती गई, ये समझौते और महँगे साबित होने लगे।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 तक पाकिस्तान के सर्कुलर डेट संकट के कारण चीनी बिजली उत्पादक कंपनियों का $7 अरब से अधिक का भुगतान बकाया हो गया। पाकिस्तान के बिजली क्षेत्र की संरचनात्मक समस्याओं को सुलझाने के बजाय सीपीईसी ने पहले से कमजोर व्यवस्था पर वित्तीय बोझ और बढ़ा दिया। गौरतलब है कि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ बार-बार बातचीत करनी पड़ी और विदेशी मुद्रा भंडार लगातार दबाव में रहा।
ग्वादर बंदरगाह: सपना जो पूरा न हो सका
रिपोर्ट में ग्वादर बंदरगाह की विफलता को सीपीईसी की सबसे प्रतीकात्मक नाकामी बताया गया है। मूल योजना में ग्वादर को दुबई या सिंगापुर की तर्ज पर वैश्विक व्यापार का बड़ा केंद्र बनाना था, लेकिन यह लक्ष्य अधूरा रह गया। रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण और वास्तविक आर्थिक उत्पादकता के बीच की यही खाई सीपीईसी की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई — केवल सड़कें और बंदरगाह विकास नहीं ला सकते, जब तक वे उत्पादक उद्योगों, स्थिर निर्यात और प्रभावी प्रशासन से नहीं जुड़े हों।
बलूचिस्तान में सुरक्षा संकट और स्थानीय असंतोष
सीपीईसी के आसपास की सुरक्षा स्थिति में भी तेजी से गिरावट आई है। रिपोर्ट के अनुसार, विशेष रूप से बलूचिस्तान में चीनी इंजीनियर और कर्मचारी लगातार उग्रवादी हमलों का निशाना बन रहे हैं। बलूचिस्तान के विद्रोही समूह कथित तौर पर इस गलियारे को स्थानीय आबादी को वास्तविक आर्थिक लाभ दिए बिना बाहरी संसाधन दोहन की परियोजना के रूप में देखते हैं, जिससे क्षेत्र में विरोध और सुरक्षा चुनौतियाँ लगातार बढ़ रही हैं।
आगे क्या
'सीपीईसी 2.0' के नाम पर पुनर्जीवित करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार जब तक पाकिस्तान अपने बिजली क्षेत्र की संरचनात्मक समस्याओं को नहीं सुलझाता, औद्योगिक उत्पादकता नहीं बढ़ाता और ग्वादर को वास्तविक व्यापारिक केंद्र नहीं बनाता, तब तक यह गलियारा एक महँगे वादे से ज़्यादा कुछ नहीं बन पाएगा। दोनों देशों के बीच बढ़ती निराशा इस बात का संकेत है कि 'गेमचेंजर' की कहानी को नए सिरे से लिखना होगा।