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क्या उत्तराखंड में बाढ़ संकट पर हाईकोर्ट ने सख्त निर्णय लिया?

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क्या उत्तराखंड में बाढ़ संकट पर हाईकोर्ट ने सख्त निर्णय लिया?

सारांश

नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड राज्य में बाढ़ संकट को गंभीरता से लिया है। नदियों के बढ़ते जलस्तर और किसानों की भूमि कटाव पर चिंता जताते हुए, कोर्ट ने विस्तृत एक्शन प्लान की मांग की है। क्या यह कदम बाढ़ से प्रभावित लोगों के लिए राहत लाएगा?

मुख्य बातें

हाईकोर्ट ने विस्तृत एक्शन प्लान की मांग की है।
अवैध खनन नदियों के संतुलन को बिगाड़ रहा है।
ड्रेजिंग केवल सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाएगी।
किसानों की फसलें बाढ़ के कारण प्रभावित हो रही हैं।
नदियों की ड्रेजिंग में समय पर कार्रवाई आवश्यक है।

नैनीताल, १५ सितंबर (राष्ट्र प्रेस)। उत्तराखंड में मानसून के दौरान नदियों के विकराल रूप धारण करने और किसानों की भूमि कटाव की घटनाओं पर नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने जिम्मेदार विभाग से विस्तृत एक्शन प्लान की रिपोर्ट मांगी है।

मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने प्रदेश के सचिव सिंचाई, सचिव खनन, प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखंड तथा एमडी वन विकास निगम को नोटिस जारी करते हुए रिवर ड्रेजिंग और अवैध खनन रोकने के लिए विस्तृत एक्शन प्लान तैयार कर १७ सितंबर को कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि बिना समय पर ड्रेजिंग के नदियां उफान पर आ जाती हैं, जिससे गांवों में बाढ़ जैसे हालात बनते हैं और किसानों की फसलें नष्ट हो जाती हैं।

यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता भुवन पोखरिया की जनहित याचिका पर उठा है। पोखरिया ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत की कि उत्तराखंड की नदियां बरसात में खतरनाक हो जाती हैं। नदियों के किनारे ड्रेजिंग (मलवा हटाने) की कमी के कारण जलस्तर अचानक बढ़ जाता है, जिससे नदी किनारे बसे गांव डूब जाते हैं। किसानों की जमीनें कटाव का शिकार हो रही हैं, जबकि नदी किनारे रहने वाले लोग जान-माल के नुकसान का सामना कर रहे हैं। पोखरिया ने कहा, "सरकार की लापरवाही से हर साल सैकड़ों परिवार प्रभावित होते हैं। अवैध खनन नदियों के तल को खोखला कर रहा है, जो बाढ़ को और घातक बना देता है।"

इससे पहले २०२३-२४ में हाईकोर्ट ने ही राज्य सरकार को मानसूनी नदियों से मलबा हटाने के लिए रिवर ड्रेजिंग नीति लागू करने के निर्देश दिए थे। लेकिन दो साल बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। याचिकाकर्ता ने इसकी शिकायत दोबारा दर्ज कराई, जिस पर कोर्ट ने तत्काल संज्ञान लिया। आरोप है कि अवैध खनन से नदियों का संतुलन बिगड़ रहा है। हाल के वर्षों में ऊधम सिंह नगर, देहरादून और हरिद्वार जैसे जिलों में खनन माफिया ने मशीनों का दुरुपयोग कर नदियों को क्षतिग्रस्त किया है, जिससे पुल टूटे और सड़कें धंस गईं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ड्रेजिंग केवल सरकारी एजेंसियां करेंगी, निजी मशीनों का इस्तेमाल प्रतिबंधित रहेगा। अगली सुनवाई १७ सितंबर को होगी, जहां सरकार को प्लान के साथ रिपोर्ट देनी होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

उत्तराखंड में बाढ़ संकट एक गंभीर समस्या है जो न केवल किसानों को प्रभावित कर रही है बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी खतरे में डाल रही है। हाईकोर्ट का सक्रिय रुख इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता है।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उत्तराखंड में बाढ़ संकट का मुख्य कारण क्या है?
उत्तराखंड में बाढ़ संकट का मुख्य कारण नदियों की अव्यवस्थित ड्रेजिंग और अवैध खनन है।
हाईकोर्ट ने किस प्रकार की कार्रवाई की है?
हाईकोर्ट ने जिम्मेदार विभागों से विस्तृत एक्शन प्लान की रिपोर्ट मांगी है।
बाढ़ से प्रभावित किसानों के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
कोर्ट ने ड्रेजिंग और अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
क्या निजी कंपनियों को ड्रेजिंग का काम करने की अनुमति है?
नहीं, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल सरकारी एजेंसियां ही ड्रेजिंग करेंगी।
अगली सुनवाई कब होगी?
अगली सुनवाई १७ सितंबर को होगी।
राष्ट्र प्रेस
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