यश चोपड़ा की 12वीं पुण्यतिथि: शाहरुख को दिया जुनूनी आशिक का रूप, बदल दी हिंदी सिनेमा की रोमांस-परिभाषा
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के 'किंग ऑफ रोमांस' यश चोपड़ा की आज 21 अक्टूबर 2024 को 12वीं पुण्यतिथि है। 27 सितंबर 1932 को लाहौर में जन्मे यश राज चोपड़ा ने हिंदी पर्दे पर प्रेम-कहानियों को एक नई भाषा दी — ऐसी भाषा जिसमें बर्फ से ढकी वादियाँ, रेशमी साड़ियाँ और भीतर तक हिला देने वाले गीत थे। उनका निधन 21 अक्टूबर 2012 को हुआ था।
फिल्ममेकिंग की नींव और शुरुआती सफर
यश चोपड़ा ने अपने बड़े भाई बी.आर. चोपड़ा के सहायक के रूप में फिल्म-निर्माण की बारीकियाँ सीखीं। कैमरे के पीछे रहकर कहानी को दृश्यों में ढालने और कलाकारों से बेहतरीन प्रदर्शन निकालने की कला उन्होंने इसी दौर में आत्मसात की। 1959 में फिल्म 'धूल का फूल' से उन्होंने निर्देशन में कदम रखा।
इसके बाद 'धर्मपुत्र' और 1965 में आई बहु-स्टारर फिल्म 'वक्त' ने उन्हें एक गंभीर और परिपक्व निर्देशक के रूप में स्थापित किया। 'इत्तेफाक' और 'आदमी और इंसान' जैसी फिल्मों ने भी दर्शकों की सराहना बटोरी। गौरतलब है कि यह वह दौर था जब हिंदी सिनेमा में ड्रामा और सामाजिक सरोकार हावी थे — यश चोपड़ा ने दोनों को एक साथ साधा।
यश राज फिल्म्स और 'दीवार' से 'डर' तक का सफर
1973 में यश चोपड़ा ने अपना स्वतंत्र प्रोडक्शन हाउस यश राज फिल्म्स स्थापित किया। उसी वर्ष आई 'दाग' ने नए सफर की शुरुआत की। इसके बाद 'दीवार', 'कभी-कभी', 'त्रिशूल' और 'काला पत्थर' जैसी फिल्मों ने उनकी पहचान और गहरी की।
'दीवार' में अमिताभ बच्चन का 'एंग्री यंग मैन' किरदार दर्शकों के बीच आज भी अमर है। यह ऐसे समय में आया जब भारतीय समाज में बेरोज़गारी और व्यवस्था के प्रति आक्रोश चरम पर था — यश चोपड़ा ने उस पीड़ा को सेल्युलॉइड पर उतार दिया।
'डर' और शाहरुख खान को मिली अलग पहचान
1993 में रिलीज़ हुई 'डर' यश चोपड़ा के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में शाहरुख खान ने राहुल मेहरा का किरदार निभाया — एक ऐसा युवक जिसका प्रेम धीरे-धीरे खतरनाक जुनून में बदल जाता है। वह किरण यानी जूही चावला को पाने के लिए उनका पीछा करता है और उन्हें परेशान करता है।
उस समय शाहरुख खान को इस तरह के नकारात्मक किरदार में प्रस्तुत करना एक साहसी प्रयोग था। यश चोपड़ा ने उनके प्यार में डर और जुनून — दोनों को एक साथ बुना। फिल्म में सनी देओल भी अहम भूमिका में थे। 'डर' को दर्शकों ने खूब सराहा और इसे बेस्ट पॉपुलर फिल्म प्रोवाइडिंग होलसम एंटरटेनमेंट का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।
रोमांस की पुनर्परिभाषा: 'दिल तो पागल है' से 'जब तक है जान' तक
'डर' के बाद यश चोपड़ा ने 'दिल तो पागल है', 'वीर-जारा' और 'जब तक है जान' जैसी फिल्मों के ज़रिए रोमांस के अलग-अलग रंग पर्दे पर उकेरे। हर फिल्म में उन्होंने प्रेम को एक नए कोण से देखा — कभी त्याग में, कभी इंतज़ार में, कभी उम्र की सीमाओं को तोड़ते हुए।
अपने 80वें जन्मदिन पर 2012 में उन्होंने घोषणा की थी कि 'जब तक है जान' उनकी निर्देशन की आखिरी फिल्म होगी। इस फिल्म में शाहरुख खान, कटरीना कैफ और अनुष्का शर्मा मुख्य भूमिकाओं में थे। 13 नवंबर 2012 को यह फिल्म रिलीज़ हुई — उनके निधन के तीन सप्ताह बाद।
सम्मान और विरासत
हिंदी सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए यश चोपड़ा को 2001 के लिए दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जाने के एक दशक बाद भी यश राज फिल्म्स भारत के सबसे प्रभावशाली प्रोडक्शन हाउसों में से एक है — यह उनकी सबसे टिकाऊ विरासत है। आज उनकी पुण्यतिथि पर हिंदी सिनेमा एक ऐसे फिल्मकार को याद करता है जिसने प्रेम को महज़ भावना नहीं, एक दर्शन बना दिया।