एआई मानवता के अहंकार को चौथी बड़ी चुनौती: स्वामी सर्वप्रियानंद का NDTV समिट में बड़ा बयान
सारांश
मुख्य बातें
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मानवता की अपने बारे में परंपरागत सोच को तोड़ने वाली चौथी बड़ी चुनौती बन सकती है — यह विचार न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी के प्रमुख स्वामी सर्वप्रियानंद ने 22 अक्टूबर 2026 को एनडीटीवी वर्ल्ड समिट 2026, नई दिल्ली में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि तेज़ी से विकसित होती मशीनों के युग में मनुष्यों को फिर से यह प्रश्न पूछना होगा कि उन्हें वास्तव में विशिष्ट क्या बनाता है।
मुख्य वक्तव्य
स्वामी सर्वप्रियानंद ने कहा, 'हम सोचते थे कि रचनात्मक बुद्धिमत्ता केवल हमारे पास है। अब हम देखते हैं कि एआई महानतम मानव मस्तिष्क की तरह काम कर सकता है, बल्कि उससे बेहतर भी कर सकता है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रश्न पर उनका उत्तर 'हाँ भी है और नहीं भी' — एआई के साथ एक व्यक्ति की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उसमें इंसानों जैसी आध्यात्मिक जागरूकता या चेतना मौजूद है।
फ्रायड से जोड़ा सूत्र
मनोविश्लेषक सिगमंड फ्रायड के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान बार-बार मानवता की केंद्रीयता और श्रेष्ठता की धारणा को चुनौती देता रहा है। उनके अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस दिशा में चौथी बड़ी चुनौती हो सकती है। गौरतलब है कि फ्रायड ने तीन पहले की चुनौतियों — कोपर्निकस, डार्विन और स्वयं फ्रायड के मनोविश्लेषण — को मानवीय अहंकार पर आघात के रूप में वर्णित किया था।
एंथ्रोपिक शोधकर्ताओं से संवाद
स्वामी सर्वप्रियानंद ने बताया कि वे हाल ही में एआई कंपनी एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं के साथ चेतना से जुड़े प्रश्नों पर विस्तृत चर्चा कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल करने के बावजूद अनेक शोधकर्ता अपनी विकसित की जा रही तकनीकों के संभावित प्रभावों को लेकर गहरी चिंता में हैं।
पर्सोना ड्रिफ्ट: एक उभरती चिंता
समिट में उन्होंने 'पर्सोना ड्रिफ्ट' की अवधारणा पर भी प्रकाश डाला — एक ऐसी स्थिति जिसमें किसी विशेष भूमिका या व्यवहारगत ढाँचे को अपनाने के दौरान एआई प्रणाली के तर्क करने के पैटर्न और जवाब देने के तरीके में बदलाव आ सकता है। उन्होंने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण शोध-क्षेत्र बनता जा रहा है।
मानवता के सामने प्रश्न
स्वामी सर्वप्रियानंद के अनुसार, जैसे-जैसे एआई प्रणालियाँ अधिक विकसित और संवाद करने में सक्षम होती जाएंगी, समाज उनके साथ व्यक्तिगत संबंधों जैसा व्यवहार करने लगेगा — हालाँकि चेतना को लेकर बुनियादी प्रश्न अभी भी अनसुलझे हैं। उन्होंने कहा, 'हमें खुद से पूछना होगा कि ऐसी कौन-सी चीज़ है जो हमें दूसरों से अलग और विशिष्ट बनाती है और हमें अपनी ऊर्जा कहाँ लगानी चाहिए।' यह ऐसे समय में आया है जब दुनियाभर में एआई के नैतिक एवं दार्शनिक पहलुओं पर बहस तेज़ हो रही है।