एआई एंट्री लेवल नौकरियाँ हटाकर प्रबंधन शिक्षा को बड़ी चुनौती दे सकता है: सीईए नागेश्वरन
सारांश
मुख्य बातें
मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने 18 सितंबर 2026 को नोएडा में आयोजित 16वें इंडियन मैनेजमेंट कॉन्क्लेव (आईएमसी 2026) को संबोधित करते हुए चेतावनी दी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) अगले दो से तीन दशकों में प्रबंधन शिक्षा के समक्ष एक मूलभूत संकट खड़ा कर सकता है। उन्होंने कहा कि एआई ठीक उन नियमित और विश्लेषणात्मक कार्यों को स्वचालित कर रहा है, जिनके ज़रिये युवा पेशेवर परंपरागत रूप से कार्यस्थल पर सीखते और अनुभव जुटाते रहे हैं।
एंट्री लेवल नौकरियों पर सबसे गहरा असर
नागेश्वरन ने स्पष्ट किया कि एआई का सबसे बड़ा आघात शुरुआती स्तर की उन नौकरियों पर पड़ सकता है, जो अब तक युवाओं के लिए करियर की पहली पाठशाला रही हैं। उन्होंने कहा, "समस्या यह है कि एआई अब ठीक वही जूनियर स्तर का काम कर रहा है। करियर की सीढ़ी के निचले पायदान काटे जा रहे हैं। जो नियमित कार्य युवाओं को सीखने का मौका देते थे, वही सबसे पहले स्वचालित हो रहे हैं।"
उन्होंने रेखांकित किया कि दशकों से पेशेवर लोग कार्यस्थल पर काम करते हुए धीरे धीरे निर्णय लेने की क्षमता विकसित करते आए हैं। यदि एआई इस सीखने की प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा समाप्त कर देता है, तो भावी पीढ़ियाँ जटिल प्रबंधकीय निर्णय लेने की योग्यता कैसे हासिल करेंगी — यह एक महत्वपूर्ण और अनुत्तरित प्रश्न है।
केवल एआई पाठ्यक्रम जोड़ना पर्याप्त नहीं
नागेश्वरन ने प्रबंधन संस्थानों को सतर्क करते हुए कहा कि पाठ्यक्रम में महज एक दो एआई ऐच्छिक विषय जोड़ देना इस चुनौती का पर्याप्त जवाब नहीं है। उनके शब्दों में, "सिर्फ एक एआई ऐच्छिक विषय जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।" उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यस्थल के लिए छात्रों को तैयार करने हेतु व्यापक संरचनात्मक बदलाव की ज़रूरत होगी, जहाँ मशीनें विश्लेषण और नियमित कार्यों का बड़ा हिस्सा संभाल रही हों।
गौरतलब है कि यह बहस ऐसे समय में तेज़ हुई है जब दुनियाभर के शीर्ष बिज़नेस स्कूल अपने पाठ्यक्रमों में एआई केंद्रित मॉड्यूल जोड़ रहे हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये प्रयास अक्सर सतही होते हैं और बुनियादी समस्या को संबोधित नहीं करते।
निर्णय क्षमता ही असली मुद्दा
सीईए ने ज़ोर दिया कि जैसे जैसे एआई विश्लेषणात्मक कार्यों को अपने अधिकार में लेगा, प्रबंधकों की भूमिका यह तय करने में अधिक निर्णायक हो जाएगी कि कौन से सवाल पूछे जाएँ और एआई के जवाबों पर कितना भरोसा किया जाए। उन्होंने कहा, "एक प्रबंधक का सबसे बड़ा उपकरण स्पष्ट और धैर्यवान दिमाग होता है। यह क्षमता छात्रों के कैंपस में पहुँचने से पहले ही चुनौती के घेरे में है।"
उन्होंने सुझाया कि केस स्टडीज़ और निर्णय आधारित अभ्यासों के माध्यम से छात्रों में यह दक्षता विकसित की जा सकती है। उनका स्पष्ट संदेश था: "सबसे पहले निर्णय लेने की क्षमता सिखाइए, सिर्फ तकनीक नहीं।"
प्रबंधन शिक्षा के लिए 'पूरी समस्या'
नागेश्वरन ने इसे कोई छोटी या आंशिक चुनौती मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा, "यह प्रबंधन शिक्षा के लिए छोटी समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी समस्या हो सकती है।" उनके अनुसार, जिन कौशलों की नकल एआई आसानी से नहीं कर सकता — जैसे नैतिक निर्णय, संदर्भ बोध और मानवीय संवेदनशीलता — उन्हें पारंपरिक कक्षा प्रणाली में सिखाना सबसे कठिन भी है।
उन्होंने एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देते हुए कहा, "एक सदी से हम काम करते हुए, अनुभव प्राप्त करते हुए निर्णय लेने की क्षमता सीखते आए हैं। यदि एआई उस प्रशिक्षण प्रक्रिया को खत्म कर देता है, तो अगली पीढ़ी में निर्णय लेने की क्षमता कैसे विकसित होगी?" यह प्रश्न अगले 20 से 30 वर्षों में भारत की कार्यबल तैयारी की सबसे बड़ी परीक्षा बनने की संभावना है।
आगे की राह
नागेश्वरन की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत के प्रमुख प्रबंधन संस्थान — IIMज़ से लेकर नए युग के बिज़नेस स्कूल — अपनी पाठ्यचर्या की समीक्षा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई युग में प्रासंगिक बने रहने के लिए संस्थानों को केवल तकनीक नहीं, बल्कि मानवीय निर्णय क्षमता और आलोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम के केंद्र में लाना होगा।